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CSP भूमि घोटाला: फरार मारूफ हनफी की अग्रिम जमानत खारिज:कोर्ट ने कहा- अपराध गंभीर; नेहा पच्चीसिया की भी बेल हो चुकी है रद्द
कटनी के बहुचर्चित सीएसपी भूमि सौदेबाजी और पद के दुरुपयोग से जुड़े मामले में एक नया मोड़ आया है। जिला एवं सत्र न्यायालय (कोर्ट क्र. 17, प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश लीला लोधी) ने आरोपी मारूफ अहमद हनफी की अग्रिम जमानत याचिका बुधवार को खारिज कर दी। मारूफ अहमद हनफी की उम्र 75 साल है। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामले की जांच अभी पूरी नहीं हुई है। आरोपी लगातार फरार चल रहे हैं। ऐसे में अगर उन्हें जमानत दी जाती है, तो उनके भागने और गवाहों व सबूतों को प्रभावित करने की आशंका बनी रहेगी। पहले पच्चीसिया और बारापात्रे याचिका हुई थी खारिज इससे पहले, इसी मामले में मुख्य आरोपी सीएसपी नेहा पच्चीसिया और मुख्य फाइनेंसर क्षितिज राज बारापात्रे की जमानत अर्जियां भी कोर्ट खारिज कर चुका है। उम्र और बीमारियों का दिया हवाला सुनवाई के दौरान, मारूफ हनफी के वकील प्रसन्नकांत चतुर्वेदी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 के तहत अपना पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि यह मामला 92 लाख रुपए के बकाया भुगतान का एक सिविल विवाद है। इसे गलत इरादे से आपराधिक रूप दिया जा रहा है। वकील ने बताया कि मारूफ हनफी 75 साल के हैं और कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। बचाव पक्ष के अनुसार, अप्रैल 2026 में हुई रजिस्ट्री के संबंध में एफआईआर 19 अगस्त 2026 को दर्ज की गई। इस देरी से मामले की सच्चाई पर संदेह होता है। मामले में यह भी आरोप है कि मारूफ हनफी सिर्फ एक डमी खरीदार थे। उनके 3 हजार रुपए के खाते में अचानक 15 लाख रुपए आए थे। खाते हुआ था भुगतान सुखलाल मार्को एवं आपत्तिकर्ता के अधिवक्ता अवनीश तिवारी ने केस डायरी व एसआईटी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत कर जमानत का पुरजोर विरोध किया। अभियोजन ने अदालत के समक्ष प्रमुख तथ्य रखा। इसमें वित्तीय जांच में खुलासा हुआ कि 1 जुलाई 2026 को मारूफ हनफी के बैंक खाते में मात्र 3,036 रुपए शेष थे। जबकि रजिस्ट्री के दिन (15 अप्रैल 2026) सीएसपी नेहा पच्चीसिया के करीबी/पार्टनर क्षितिज राज बारापात्रे ने मारूफ के खाते में 15 लाख रुपए ट्रांसफर किए थे। इससे साफ होता है कि मारूफ केवल एक मुखौटा थे। जिस भूमि की सरकारी गाइडलाइन दर 82.46 लाख रुपए थी और जिसका सौदा 1.07 करोड़ रुपए में तय हुआ था, उसे पदीय दबाव बनाकर महज 18.20 लाख रुपए में मारूफ के नाम दर्ज करा लिया गया। पुलिस थाना में दर्ज अपराध क्रमांक 738/2026 में बीएनएस की संगीन धाराओं के अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(C), 12 एवं 13 भी जोड़ी गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला
मामले का फैसला सुनाते हुए अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक दृष्टांत 'मध्य प्रदेश राज्य बनाम प्रदीप शर्मा (2014)' की टिप्पणी का विशेष उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत की शक्तियां असाधारण हैं और इनका उपयोग केवल अपवादस्वरूप उन्हीं स्थितियों में होना चाहिए जहां आरोपी को असत्य रूप से फंसाया गया प्रतीत होता हो। फरार आरोपियों को ऐसी राहत नहीं दी जा सकती।