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CJP नेता सौरभ-आशुतोष को दिल्ली HC ने लगाई फटकार, कहा- वो लोग नहीं हैं जेन-जी; जानिए अब आगे क्या होगा?

दिल्ली हाईकोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को न्यायिक हिरासत से राहत देने से फिलहाल इनकार कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि दोनों को पहले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने चल रही सुनवाई के फैसले का इंतजार करना चाहिए. अगर वे उस फैसले से संतुष्ट नहीं होते हैं, फिर अपील करने अदालत में जा सकते हैं. दोनों नेताओं ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने और जमानतदारों से जुड़ी शर्तों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने याचिका वापस लेने की दी अनुमति
बुधवार, 21 अक्टूबर को न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने मामले की सुनवाई की. उन्होंने कहा कि शांति बनाए रखने के लिए भरे गए बांड का बार-बार उल्लंघन करने के आरोपों से जुड़े मामले में सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करना उचित रास्ता नहीं है. कोर्ट ने दोनों नेताओं को अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी. साथ ही स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है. यानी कोर्ट ने यह तय नहीं किया कि दोनों की हिरासत कानूनी है या गैरकानूनी.
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिए गए थे दोनों नेता
सौरव दास और आशुतोष रांका को 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था. आरोप है कि वे बंद गेट को फांदकर उस जगह पहुंचे थे, जिसे निर्धारित विरोध स्थलों की सूची से हटा दिया गया था. इसके बाद 14 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. बाद में 19 अक्टूबर के आदेश के तहत उनकी हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ा दी गई. इसी आदेश को दोनों नेताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
वकील ने जमानतदारों की शर्त पर उठाए सवाल
दोनों नेताओं की ओर से पेश वकील अभिक चिमनी ने दलील दी कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाने का अधिकार नहीं है. उन्होंने कहा कि जरूरी जमानतदार पेश किए जाने के बावजूद दोनों को रिहा नहीं किया गया. याचिका में यह भी दावा किया गया कि जमानतदारों को स्वीकार करने और उनका सत्यापन करने में देरी हुई. वकील ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 140 के तहत जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने का मुद्दा भी उठाया.
कोर्ट ने प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था पर क्या कहा?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि प्रदर्शन की अनुमति लेने का उद्देश्य लोगों को अपनी बात रखने से रोकना नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। उन्होंने यह भी कहा कि जब प्रदर्शनकारी अवरोधक पार करते हैं, तो दूसरे लोगों के निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने की आशंका बढ़ सकती है. कोर्ट ने दोनों नेताओं की भूमिका और उनके उद्देश्य से जुड़े सवालों को भी महत्वपूर्ण बताया. हालांकि, न्यायाधीश ने कहा कि इन मुद्दों पर उचित प्राधिकरण को विचार करना चाहिए. दोनों नेताओं की उम्र 27 और 31 साल बताए जाने पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि वे जेन-जी नहीं हैं.
अब आगे क्या होगा?
अब दोनों नेताओं को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने होने वाली सुनवाई के फैसले का इंतजार करना होगा. यदि वे फैसले से असहमत होते हैं, तो अपील करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं. फिलहाल हाईकोर्ट ने उन्हें तत्काल राहत नहीं दी है, लेकिन हिरासत की वैधता पर अंतिम फैसला भी नहीं सुनाया है.