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पहला ODI क्यों खेला गया था? जानें वनडे क्रिकेट शुरू होने की दिलचस्प कहानी

INT News8 August 2026 at 08:51 am

History of ODI Cricket: वनडे क्रिकेट का 5000वां मैच हाल ही में स्कॉटलैंड और कनाडा के बीच खेला गया, जिसमें स्कॉटलैंड ने जीत हासिल की. 5 जनवरी 1971 को बारिश के कारण एक टेस्ट मैच पूरा नहीं हो सका था. उसकी जगह पहली बार सीमित ओवरों का मैच खेला गया और यहीं से वनडे क्रिकेट की शुरुआत हुई. पिछले 55 सालों में वनडे क्रिकेट ने कई बड़े बदलाव देखे हैं. क्रिकेट में होने वाले कई नए प्रयोग सबसे पहले वनडे में ही किए गए. तीसरे अंपायर, डे-नाइट मैच, सफेद गेंद, पावरप्ले, DRS, DLS और सुपर ओवर जैसे बदलावों की शुरुआत वनडे से हुई. आज वनडे क्रिकेट मैचों की संख्या और लोकप्रियता के मामले में क्रिकेट का एक अहम हिस्सा बन चुका है.

1. रद्द टेस्ट मैच से हुई थी वनडे की शुरुआत

पहला वनडे मुकाबला 5 जनवरी 1971 को मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया था. दरअसल, उस इंग्लैंड दौरे का तीसरा टेस्ट लगातार चार दिन बारिश की भेंट चढ़ गया था. निराश दर्शकों को बिना मैच देखे खाली हाथ लौटने से बचाने के लिए, मैच के आखिरी दिन 40-40 ओवरों का एक सीमित ओवरों का मुकाबला कराया गया. उस समय खिलाड़ी पारंपरिक सफेद कपड़ों में और लाल गेंद से मैदान पर उतरे थे. तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह तात्कालिक जुगाड़ क्रिकेट के सबसे लोकप्रिय फॉर्मेट्स में से एक की नींव साबित होगा.

2. शुरुआती 25 साल तक वनडे का कोई तय फॉर्मेट ही नहीं था

आज 50 ओवरों का वनडे स्टैंडर्ड माना जाता है, लेकिन शुरुआती दौर में ऐसा नहीं था. पहला मैच 40 ओवर का था और उसमें 8 गेंद का एक ओवर फेंका जाता था.

इंग्लैंड अपनी घरेलू सीरीज में 55 ओवर के मैच कराता था.

1975 और 1979 के शुरुआती दोनों वर्ल्ड कप 60-60 ओवरों के खेले गए.

शुरुआत में अलग-अलग देशों में वनडे मैचों के ओवर तय नहीं थे. न्यूजीलैंड में 35 ओवर, वेस्टइंडीज में 45 ओवर और पाकिस्तान में 35, 40 और 50 ओवर के मैच खेले गए. बाद में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक नियम बनाने की जरूरत महसूस हुई. 1978 में वेस्टइंडीज 50 ओवर का मैच कराने वाला पहला देश बना. इसके बाद 1996 के वर्ल्ड कप के बाद दुनियाभर में वनडे के लिए 50 ओवर का फॉर्मेट आधिकारिक तौर पर लागू कर दिया गया.

3. केरी पैकर विवाद ने बदल दी क्रिकेट की सूरत

साल 1977 में ऑस्ट्रेलियाई मीडिया कारोबारी केरी पैकर ने 'वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट' (WSC) की शुरुआत की. उन्होंने दुनिया भर के दिग्गज खिलाड़ियों को अपने साथ जोड़कर एक अलग टूर्नामेंट कराया. इस सीरीज ने क्रिकेट के रंग-ढंग को पूरी तरह बदलकर रख दिया, जिससे खेल में तीन बड़े बदलाव आए:

रंगीन जर्सी: 1978-79 सीजन में पहली बार टीमें अलग-अलग रंगों की जर्सी पहनकर उतरीं (ऑस्ट्रेलिया-पीली, वेस्टइंडीज-गुलाबी और वर्ल्ड-11-नीली).

डे-नाइट मैच: फ्लडलाइट्स की रोशनी में पहली बार डे-नाइट मुकाबले खेले गए.

सफेद गेंद का उदय: रात के समय लाल गेंद साफ दिखाई नहीं देती थी, इसलिए पहली बार सफेद गेंद का इस्तेमाल किया गया. 1992 का वर्ल्ड कप पहला ऐसा ICC टूर्नामेंट था जिसमें रंगीन जर्सी, डे-नाइट मैच और सफेद गेंद तीनों का एक साथ प्रयोग हुआ.

4. पावरप्ले लागू करने के पीछे की वजह

1979 में इंग्लैंड के कप्तान माइक ब्रियरली ने एक अनोखा दांव खेलते हुए आखिरी गेंद पर विकेटकीपर समेत सभी 10 फील्डर्स को बाउंड्री लाइन पर खड़ा कर दिया. इससे बल्लेबाज के लिए चौका या छक्का लगाना लगभग असंभव हो गया. इस घटना के बाद खेल की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए फील्डिंग प्रतिबंध (Fielding Restrictions) की जरूरत महसूस हुई.

1992 वर्ल्ड कप में पहली बार फील्डिंग के नियम लागू किए गए.

साल 2005 में औपचारिक रूप से 'पावरप्ले' की शुरुआत हुई, जिसमें समय के साथ (2008, 2011 और 2012 में) कई संशोधन हुए और 2015 से मौजूदा फील्डिंग नियम प्रभाव में आए.

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5. बारिश के नियमों का उतार-चढ़ाव और DLS प्रणाली

शुरुआती दौर में बारिश से प्रभावित मैचों के नियम बेहद उलझे हुए थे और हर देश अपने हिसाब से फैसले लेता था. 1991 के शारजाह कप में खराब रोशनी के दौरान ऐसी अजीब स्थिति बन गई थी कि खिलाड़ियों और अंपायरों तक को नहीं पता था कि मैच का विजेता कौन होगा. इसके बाद ICC ने नियमों को दुरुस्त करना शुरू किया:

1992 में नए नियम आए, लेकिन विवाद थमे नहीं.

अंततः 1997 में डकवर्थ-लुईस (DL) नियम लागू हुआ, जिसे 1999 में आधिकारिक मान्यता मिली. बाद में इसमें स्टीवन स्टर्न के संशोधनों के बाद यह DLS सिस्टम बन गया, जो आज भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का हिस्सा है.

अन्य प्रमुख प्रयोग जो इतिहास बने:

सुपर सब (2005): IPL के 'इम्पैक्ट प्लेयर' की तर्ज पर 2005 में 'सुपर सब' नियम लाया गया, जिसके तहत मैच के दौरान एक अतिरिक्त खिलाड़ी को उतारने की छूट थी. हालांकि, यह प्रयोग एक साल भी नहीं टिक पाया.

टाई मैचों का फैसला: शुरुआत में टाई मैचों का निर्णय विकेटों या रनरेट से होता था. 2011 वर्ल्ड कप से नॉकआउट में सुपर ओवर आया. 2019 के विवादास्पद बाउंड्री काउंट नियम के बाद, 2023 से हर टाई वनडे का फैसला सुपर ओवर से होना अनिवार्य कर दिया गया.

रिवर्स स्विंग और गेंदों का नियम: 2001 तक लाल गेंद पूरी तरह वनडे से बाहर हो चुकी थी. सफेद गेंद के जल्दी खराब होने पर ICC ने एक पारी में दो नई गेंदें इस्तेमाल करने का नियम बनाया, जिससे रिवर्स स्विंग लगभग खत्म हो गई. गेंदबाजों की राहत के लिए 2025 में नियम बदला गया, जिसके तहत 34 ओवर के बाद पुरानी गेंदों में से एक चुनने की छूट दी गई है.

वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी ने बचाई वनडे की लोकप्रियता

2007 में टी-20 वर्ल्ड कप के आगमन और दुनिया भर की टी-20 लीगों के कारण द्विपक्षीय वनडे सीरीज भले ही कम हुई हों, लेकिन वनडे वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी जैसे आईसीसी टूर्नामेंट्स आज भी इस ऐतिहासिक फॉर्मेट की लोकप्रियता और रोमांच को जीवंत बनाए हुए हैं.

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