Tuesday, 25 August 2026
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बच्ची की हत्या में आरोपी की फांसी उम्रकैद में बदली:हाईकोर्ट बोला-अपराध जघन्य पर ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ नहीं, 7 साल की बच्ची पर किए थे 29 वार

INT News25 August 2026 at 08:31 am

हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने 2022 के चर्चित 7 वर्षीय बच्ची के अपहरण और हत्या के मामले में आरोपी सद्दाम उर्फ वाहिद की फांसी की सजा को बदल दिया है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने हत्या, अपहरण और पॉक्सो एक्ट के तहत उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए बिना किसी रिमिशन के प्राकृतिक जीवन के अंत तक कारावास की सजा सुनाई है। कोर्ट ने माना कि अपराध बेहद जघन्य और क्रूर था, लेकिन आरोपी के मानसिक बीमारी के इतिहास और चिकित्सकीय रिकॉर्ड को देखते हुए यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में नहीं आता। हालांकि, उसकी मानसिक स्थिति और बच्चों व लड़कियों के प्रति हिंसक प्रवृत्ति को देखते हुए समाज में उसकी वापसी को गंभीर खतरा माना गया। घर के बाहर खेल रही बच्ची को उठाकर ले गया था 23 सितंबर 2022 को 7 वर्षीय बच्ची घर के बाहर खेल रही थी। इसी दौरान आरोपी उसे जबरन उठाकर अपने घर ले गया। बच्ची की चीख सुनकर उसकी नानी और आसपास के लोग मौके पर पहुंचे। प्रत्यक्षदर्शियों ने खिड़की से आरोपी को बच्ची पर चाकू से हमला करते देखा। कुछ देर बाद आरोपी खून से सना हुआ बाहर निकला और लोगों को धमकाया। पोस्टमॉर्टम में बच्ची के शरीर पर चाकू और धारदार हथियार के 29 घाव मिले थे। CCTV और DNA से भी जुड़ा आरोपी मामले में CCTV फुटेज और DNA रिपोर्ट को अहम साक्ष्य माना गया। फुटेज में आरोपी बच्ची को गोद में उठाकर अपने घर की ओर ले जाता और कुछ देर बाद खून से लथपथ बाहर आता दिखाई दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि CCTV फुटेज प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों की पुष्टि करता है। DNA जांच में बच्ची के कपड़ों से मिले जैविक नमूनों और आरोपी से जब्त सामग्री के बीच भी मेल पाया गया। मानसिक आयु 9 साल, IQ 56 बचाव पक्ष ने आरोपी की मानसिक स्थिति का हवाला देते हुए फांसी की सजा का विरोध किया। रिकॉर्ड में उसकी 50 प्रतिशत मानसिक दिव्यांगता का उल्लेख था। एक मेडिकल रिपोर्ट में उसकी मानसिक आयु 9 साल और IQ 56 बताया गया। अस्पताल के रिकॉर्ड में बच्चों को नुकसान पहुंचाने, लड़कियों को परेशान करने, आक्रामक व्यवहार और आत्म-क्षति जैसी प्रवृत्तियों का भी उल्लेख था। समाज में वापसी को गंभीर खतरा माना हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड आरोपी के मानसिक विकार और बच्चों व लड़कियों के प्रति हिंसक प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। ऐसी स्थिति में उसका समाज में वापस आना गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। इसलिए फांसी की जगह उसे प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रखने का फैसला किया गया है। उसे सामान्य तौर पर मिलने वाले रिमिशन या सजा में कमी का लाभ नहीं मिलेगा। पुलिस जांच की कमियों पर भी नाराजगी कोर्ट ने मामले की पुलिस जांच में कमियों पर भी नाराजगी जताई। घटनास्थल और बच्ची के शरीर पर लगी चोटों के फोटोग्राफ रिकॉर्ड में पेश नहीं किए गए थे। कोर्ट ने कहा कि यदि मामला केवल DNA साक्ष्यों पर निर्भर होता तो जांच की कमियों का लाभ आरोपी को मिल सकता था। हाईकोर्ट ने भविष्य में गंभीर अपराधों की जांच के दौरान घटनास्थल, खून के धब्बों और मृतक या घायल के शरीर पर लगी चोटों के फोटो केस डायरी और न्यायालय के रिकॉर्ड में अनिवार्य रूप से शामिल करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि इससे जांच अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी होगी।