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CEC के बजाय चुनाव आयुक्तों ने EC में गड़बड़ी के लिए कैबिनेट सचिव को लिखे पत्र, जानिए चिट्ठी को लेकर RTI में क्या हुआ खुलासा?

INT News21 October 2026 at 08:30 pm

चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे SIR के चलते देशभर में विवाद हो रहा है. इस मामले ने और ज्यादा तुल तब पकड़ लिया, जब एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के भीतर भी इस मुद्दे पर विवाद है. इस बीच एक और बड़ा खुलासा हुआ है. दरअसल, RTI के जरिए यह जानकारी सामने आई है कि दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को CEC ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखने के बजाय कैबिनेट सचिव को चिट्ठी भेजी थी.

आरटीआई से क्या पता चला?

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, इसकी पुष्टि इस मामले में दायर एक RTI के जवाब से हुई है. हालांकि, चिट्ठी में क्या लिखा गया था और अधिकारियों ने क्या जवाब दिया, यह अभी साफ नहीं हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, आरटीआई के तहत मिले जवाब में बताया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र 30 जुलाई को दर्ज किए गए थे. इसके बाद 5 अगस्त को कैबिनेट सचिव ने इन पत्रों को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DOPT) के अधिकारियों और मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को भेज दिया. यह जानकारी 19 अक्टूबर को दिए गए आरटीआई जवाब में सामने आई. इसके लिए आवेदन 24 सितंबर को किया गया था.

हालांकि, कैबिनेट सचिवालय ने फिलहाल इन पत्रों की कॉपी उपलब्ध नहीं कराई है. कुल 14 पन्नों के दस्तावेज देने के लिए 28 रुपये की फीस मांगी गई है. इनमें दोनों चुनाव आयुक्तों के 10 पन्नों के पत्र, जवाब के दो पन्ने और फाइल पर लिखी गई टिप्पणियों के दो पन्ने शामिल हैं.

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चुनाव आयुक्तों ने चिट्ठी क्यों लिखी?

इस पूरे मामले की शुरुआत 28 जुलाई को जारी एक वर्क-अलॉकेशन ऑर्डर यानी काम के बंटवारे से जुड़े आदेश से हुई थी. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस आदेश पर आपत्ति जताई थी. बताया गया कि उन्होंने इसे नियमों के खिलाफ बताते हुए कैबिनेट सचिव को चिट्ठी लिखी थी. मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि नए आदेश से मतदाता सूची से जुड़े आईटी सिस्टम की निगरानी पर असर पड़ सकता था. दोनों आयुक्तों की आपत्ति यह भी थी कि काम के बंटवारे में यह बदलाव उनकी जानकारी के बिना किया गया था.

हालांकि, दोनों चिट्ठियों की कॉपी अभी सार्वजनिक नहीं हुई है. इसलिए उनमें क्या लिखा गया था, इसकी पूरी तरह पुष्टि नहीं हो सकी है. एक अन्य मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया था कि यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग में तैनात एक वरिष्ठ डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर से जुड़ा था.

चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?

चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जारी प्रेस रिलीज में इस मामले पर अपना पक्ष रखा था. आयोग के मुताबिक, कैबिनेट सचिव को भेजा गया पत्र किसी नीतिगत फैसले या आयोग के आईटी विभाग से संबंधित नहीं था, बल्कि आयोग में प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अधिकारी के कामकाज से जुड़ा था. आयोग ने यह भी कहा था कि संबंधित अधिकारी की ओर से जारी काम के बंटवारे के आदेश को दोनों आयुक्तों के निर्देश के बाद लागू नहीं किया गया. आयोग के अनुसार, आईटी विभाग पर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर की निगरानी भी वास्तव में कभी नहीं हटाई गई थी.

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अब आगे क्या होगा?

फिलहाल आरटीआई जवाब से केवल इतना स्पष्ट हुआ है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पत्र भेजे थे, वे कब दर्ज हुए और उन्हें किन कार्यालयों तक भेजा गया. पत्रों में उठाई गई आपत्तियों और कैबिनेट सचिवालय की प्रतिक्रिया का पूरा विवरण अभी सामने नहीं आया है. पत्रों और फाइल नोटिंग की कॉपी मिलने पर मामले से जुड़ी और जानकारी सामने आ सकती है.