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मोरल पुलिसिंग के नाम पर लड़कियों से छेड़छाड़ क्यों? जमुई, समस्तीपुर की घटना से समझिए इसके पीछे का मनोविज्ञान

INT News24 September 2026 at 05:22 pm

जमुई में छात्रा से छेड़छाड़ का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि समस्तीपुर से एक युवती के साथ अभद्रता का एक और वीडियो सामने है. बिहार का जमुई हो, समस्तीपुर हो, मधेपुरा हो या देश का कोई दूसरा कोना...ऐसी घटनाएं अब नई नहीं हैं, और तो और इसको लेकर दी जाने वाली दलीलें भी वही रटी-रटाई हैं, मोरल पुलिसिंग!

यानी नए दौर का सोशल मीडिया हो या फिर हमारी कथित परंपरा... एक चीज आज भी कॉमन है, बिन मांगी दी जाने वाली सलाह या रोक-टोक करने का हक. हैरानी की बात यह है कि इस कथित अधिकार के लिए न कोई अनुमति चाहिए, न योग्यता और न ही जवाबदेही. जमुई मामले में तो अपराधी को लेकर जो तर्क दिए जा रहे हैं वो कुछ ऐसा ही है.यानी महज 48 घंटे में हुई समस्तीपुर और जमुई की ये दो घटनाएं ही काफी हैं, यह बताने के लिए यह विषय इतना प्रासंगिक क्यों है?

मगर सवाल सिर्फ विषय के प्रासंगिकता का नहीं है. हमें यह भी समझना होगा कि कैसे समाज लंबे समय से मोरल पुलिसिंग के नाम पर महिलाओं के साथ होने वाले अपराध, खासकर यौन हिंसा को बढ़ावा दे रहा? और इस के पीछे का मनोविज्ञान क्या है?

मोरल पुलिसिंग के पीछे क्या होता है असली मकसद

इस सवाल का जवाब जानने से पहले ये समझना जरूरी है कि मोरल पुलिसिंग है क्या ? देखिए इन्फोग्राफिक

डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर की एसोसिएट प्रोफेसर अदिति नारायणी पासवान कहती हैं, महिलाओं के साथ होने वाली मोरल पुलिसिंग को केवल कुछ लोगों की अचानक की गई हरकत या इक्का-दुक्का घटनाओं के तौर पर नहीं देखा जा सकता.

इसके पीछे समाज की वह सोच है, जिसमें नैतिकता के नाम पर महिलाओं को दबाने, उनके शरीर और उनकी जिंदगी पर फैसले लेने और उनकी आजादी पर रोक लगाने की कोशिश की जाती है.

अदिति कहती हैं कि महिलाओं पर इस तरह की रोक-टोक उनकी सुरक्षा के नाम पर की जाती है. छोटी उम्र की लड़कियों को बताया जाता है कि उन्हें किस समय घर से निकलना चाहिए, कहां जाना चाहिए और किससे दोस्ती करनी चाहिए. कई बार तो उन्हें अपनी पढ़ाई, घूमने-फिरने या दोस्तों से मिलने तक में सावधानी बरतने के लिए कहा जाता है, ताकि वे किसी परेशानी में न पड़ें. लेकिन अगर सुरक्षा के नाम पर हर जिम्मेदारी महिला के ऊपर ही डाल दी जाए तो यह असली सुरक्षा नहीं है.

उनका कहना है कि सुरक्षित माहौल का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि महिलाएं डर के कारण कहीं न जाए या हर समय अपने व्यवहार को लेकर सर्तक रहे.असली सुरक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें कोई महिला बिना डर के सड़क पर चल सके, बस पकड़ सके और सार्वजनिक जगहों पर अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से जी सके.

ऐसी सोच में अगर कोई महिला इन तय की गई सीमाओं को तोड़ती है, तो उसे ही दोषी मान लिया जाता है. इसके बाद कुछ लोग उसे रोकने, बेइज्जत करने या सजा देने को अपना अधिकार समझने लगते हैं और महिलाओं को यह बताया जाता है कि उन्हें कैसे कपड़े पहनने हैं, किससे मिलना है, कहां जाना है और सार्वजनिक जगहों पर कैसे रहना है.

मोरल पुलिसिंग के पीछे क्या होता है मनोविज्ञान

रिनपास के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. अमूल रंजन इस तरह के घटना को लेकर कहते हैं कि कुछ लोगों में समाज-विरोधी लक्षण पाए जाते हैं. ऐसे लोग दूसरों को दर्द या मानसिक परेशानी पहुंचाकर आनंद लेते हैं. इन्हें छेड़खानी करने, रोक-टोक करने, धमकाने और नियम तोड़ने में आनंद आता है.

इसे ‘सेंसेशन सीकिंग बिहेवियर’ कहा जाता है. इसमें व्यक्ति किसी काम के दुष्परिणामों की परवाह किए बिना तत्काल थ्रिल या मजे के लिए ऐसा व्यवहार करता है. जैसे नशीले पदार्थों का सेवन करना या ट्रैफिक रेड लाइट जंप करना

डॉ. सिंह के अनुसार, ऐसे लोग कई बार समाज और पुलिस को चुनौती देकर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि वे जो चाहें कर सकते हैं.

डॉ. सिंह बताते हैं कि इस तरह के व्यवहार अक्सर बचपन या स्कूल के दिनों से दिखाई देने लगती हैं. स्कूल बंक करना, मारपीट करना, घर में छोटी-मोटी चोरी करना या अपशब्द और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करना इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं. समय के साथ यही प्रवृत्ति ‘सोशल पैथोलॉजी’ का रूप ले सकती है.

पहले समाज में ऐसी घटनाओं को लोग आपस में डांट-डपटकर रोक लेते थे, लेकिन अब इसके नए रूप भी सामने आ रहे हैं. जिसमें मोरल पुलिसिंग जैसे व्यवहार शामिल है.

मोरल पुलिसिंग को क्या कानून देता है इजाजत

मोरल पुलिसिंग भारत में किसी एक कानून में परिभाषित अपराध नहीं है. यह अलग-अलग तरह के सामाजिक हस्तक्षेप और कथित नैतिक निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है. इस बहस को समझने के लिए कानून, सामाजिक परंपराओं और अदालतों के फैसलों, तीनों को साथ देखना जरूरी है.

भारत में मोरल पुलिसिंग का इतिहास सिर्फ आज के विवादों तक सीमित नहीं है. इसकी जड़ें पुराने सामाजिक नियमों से लेकर औपनिवेशिक दौर के कानूनों तक जाती हैं.

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क्या है इसका समाधान

मोरल पुलिसिंग के जिक्र के साथ अनुशासन और आजादी के बीच संतुलन का सवाल भी सामने आता है. इसे समझने के लिए हमने बिहार राज्य बाल श्रमिक आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कांत मिश्रा से बात की.

राजीव कांत मिश्र के अनुसार, आज के युवाओं में भटकाव इन समस्याओं का अहम कारक है और इसके पीछे कोई एक वजह नहीं है. परिवार, समाज, आर्थिक स्थिति, मानसिक दबाव और बदलता डिजिटल माहौल इसके कई कारण हैं.

राजीव कहते हैं कि फिल्मों में दिखाई जाने वाली अवास्तविक हिंसा भी युवाओं को सामाजिक संस्कारों से दूर कर रही है. वहीं, शिक्षा व्यवस्था उन्हें डिग्रियां तो दे रही है, लेकिन संस्कार और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए जरूरी व्यावहारिक कौशल नहीं सिखा रही.

मिश्र के मुताबिक, अभिभावक कई बार इस डर से उचित अनुशासन नहीं बना पाते कि बच्चे कोई आत्मघाती या गलत कदम न उठा लें. डिजिटल दौर में परिवार के भीतर बातचीत भी कम हुई है और पूरा परिवार अपने-अपने मोबाइल फोन में सिमट गया है. बच्चों पर बाहरी माहौल का असर भी पड़ रहा है, जिस पर कई बार अभिभावकों का ध्यान नहीं जा पाता.

समाधान के तौर पर मिश्र स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा यानी वोकेशनल ट्रेनिंग शुरू करने की जरूरत बताते हैं. उनका कहना है कि 12वीं से पहले ही वोकेशनल कोर्स शुरू किए जाएं, ताकि छात्र समय रहते व्यावहारिक हुनर सीखें और सकारात्मक गतिविधियों में व्यस्त रहें.

मिश्र के मुताबिक, बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल पर एक निश्चित उम्र तक अभिभावकों और स्कूलों का सख्त नियंत्रण होना चाहिए. युवाओं को सकारात्मक कामों में व्यस्त रखने की जरूरत है. उनका मानना है कि इससे उपद्रव करने या रील्स में समय गंवाने का अवसर कम होगा.