समाचार · झारखंड
Tribalpedia: औपनिवेशिक जनजातीय नीतियां... अलगाव से एकीकरण तक, कैसे बदली आदिवासी दुनिया?

ब्रिटिश शासन के विस्तार के साथ भारत के उन इलाकों पर भी औपनिवेशिक नियंत्रण बढ़ा, जहां आदिवासी समुदाय लंबे समय से अपनी सामाजिक व्यवस्था, परंपराओं और संसाधनों के साथ अपेक्षाकृत स्वतंत्र जीवन जी रहे थे.
खासकर पूर्वी भारत और उत्तर-पूर्व के जनजातीय क्षेत्रों में अंग्रेजों के सामने सवाल था- इन इलाकों को अपने प्रशासन में कैसे शामिल किया जाए?
इसका जवाब समय के साथ बदलता गया.
ब्रिटिश नीति मोटे तौर पर अलगाव (Segregation/Isolation), आत्मसात्करण (Assimilation) और फिर प्रशासनिक एकीकरण (Integration) के अलग-अलग चरणों से गुजरी.
Read more: Tribalpedia: आदिवासी कला डिजिटल हुई, लेकिन अधिकार किसका हुआ? Part 2
पहले रास्ता था- अलग रखो
औपनिवेशिक शासन के शुरुआती दौर में कई जनजातीय क्षेत्रों को मुख्यधारा के प्रशासन से अलग रखने की नीति अपनाई गई. विचार यह था कि इन इलाकों को उपमहाद्वीप के बाकी हिस्सों से काफी हद तक अलग रखा जाए.
इसका अर्थ था- कम संपर्क, सीमित संचार और अलग प्रशासनिक व्यवस्था.
उत्तर-पूर्व भारत इसका प्रमुख उदाहरण बना.
बाद में Inner Line Permit जैसी व्यवस्थाओं के जरिए भी कुछ क्षेत्रों में बाहरी लोगों की आवाजाही को नियंत्रित किया गया.
इस नीति का एक परिणाम यह हुआ कि जनजातीय इलाकों और शेष भारत के बीच एक तरह की प्रशासनिक और सामाजिक दूरी बनी रही.
अलगाव का असर केवल प्रशासन तक सीमित नहीं था. इससे कई इलाकों में seclusion यानी अलगाव की भावना और कुछ परिस्थितियों में अलग पहचान की भावना भी मजबूत हुई.
फिर आया आत्मसात्करण का दौर
ब्रिटिश नीति का दूसरा पहलू था Assimilation यानी आत्मसात्करण.
इस दौर में मिशनरियों और ईसाई संस्थाओं की गतिविधियां भी बढ़ीं. दिए गए स्रोत के अनुसार, 1813 में खासी, 1845 में झारखंड के उरांव और 1880 में मध्य प्रदेश के भील क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है.
शिक्षा, धर्म और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से जनजातीय समाज के साथ नए प्रकार का संपर्क स्थापित हुआ.
यह प्रक्रिया केवल धार्मिक परिवर्तन तक सीमित नहीं थी.
औपनिवेशिक प्रशासन के लिए ईसाई बने आदिवासी समुदायों को प्रशासनिक ढांचे में शामिल करना अपेक्षाकृत आसान माना गया. स्रोत में इसकी तुलना Eurasians को प्रशासनिक व्यवस्था में समाहित करने से की गई है.
इस तरह धर्म, शिक्षा और प्रशासन- तीनों एक-दूसरे से जुड़ने लगे.
अलगाव से प्रशासनिक सुधार तक
समय के साथ ब्रिटिश सरकार को यह महसूस हुआ कि केवल अलग रखकर इन क्षेत्रों को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं है.
इसके बाद Integration और Reforms की दिशा में कदम बढ़े.
Government of India Act, 1870 के तहत Scheduled Tracts की अवधारणा सामने आई. इन क्षेत्रों में हिमालयी इलाकों के साथ असम, दार्जिलिंग, कुमाऊं, गढ़वाल और नीलगिरि जैसे क्षेत्र शामिल किए गए.
इसके बाद Scheduled Districts Act, 1874 आया.
आगे चलकर Government of India Act, 1919 में इन क्षेत्रों के लिए Backward Tracts जैसी प्रशासनिक श्रेणियां विकसित हुईं.
फिर Government of India Act, 1935 के तहत व्यवस्था और स्पष्ट हुई.
इसमें जनजातीय क्षेत्रों को Excluded Areas और Partially Excluded Areas जैसी श्रेणियों में बांटा गया.
इसका आदिवासी समाज पर क्या असर पड़ा?
इन नीतियों ने आदिवासी समाज को केवल प्रशासनिक रूप से नहीं बदला, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी प्रभावित किया.
एक तरफ अलगाव ने पारंपरिक संस्थाओं और जीवन-पद्धतियों को कुछ हद तक बाहरी हस्तक्षेप से बचाए रखा, तो दूसरी तरफ इसने मुख्यधारा से दूरी भी पैदा की.
वहीं आत्मसात्करण और प्रशासनिक एकीकरण ने मिशनरी शिक्षा, नए प्रशासनिक ढांचे और बाहरी संस्थाओं के लिए रास्ता खोला.
इसलिए औपनिवेशिक जनजातीय नीति को केवल ‘अलगाव’ या केवल ‘विकास’ की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा.
असल कहानी यह है कि ब्रिटिश शासन ने पहले जनजातीय क्षेत्रों को दूर रखा, फिर उन्हें अपने तरीके से बदलने की कोशिश की और अंततः विशेष प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए उन्हें औपनिवेशिक राज्य में समाहित किया.
यही नीतियां आगे चलकर स्वतंत्र भारत की जनजातीय प्रशासन, अनुसूचित क्षेत्रों और विशेष संवैधानिक सुरक्षा पर होने वाली बहसों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी बनीं.
Read more: भारत छोड़ो आंदोलन -4: जब नेता जेल गए... लेकिन ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन सड़कों पर उतर आया!