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मोदी और गुटेरेस की मुलाकात में UNSC सुधार पर जोर, क्या बदलने वाला है संयुक्त राष्ट्र का सिस्टम?

INT News11 September 2026 at 11:16 pm

PM Modi-Guterres Meet: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकात की. दोनों नेताओं ने बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने, सतत विकास, मानव-केंद्रित AI और अधिक समावेशी वैश्विक व्यवस्था पर चर्चा की. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) समेत बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया गया. ऐसे में सवाल है कि आखिर UNSC में सुधार की मांग क्यों उठ रही है और इसमें भारत की दावेदारी कितनी अहम है?

UN Security Council में सुधार आखिर क्यों जरूरी माना जा रहा है?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े बड़े मुद्दों पर इसकी भूमिका अहम होती है. मौजूदा समय में सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य हैं, जिनमें 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं.

5 स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस. इन पांचों के पास वीटो पावर है, यानी किसी बड़े प्रस्ताव को रोकने की विशेष शक्ति.

समस्या यह है कि सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना काफी हद तक उस दौर को दिखाती है, जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद दुनिया की ताकत का संतुलन अलग था. आज दुनिया की अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और राजनीतिक प्रभाव में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा उसी तरह बना हुआ है.

इसी वजह से लंबे समय से सवाल उठ रहा है कि क्या दुनिया के मौजूदा शक्ति-संतुलन और अलग-अलग क्षेत्रों की आवाज को UNSC में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल रहा है. संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी सुरक्षा परिषद के विस्तार और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व को लेकर अंतर-सरकारी बातचीत लगातार चल रही है. 2026 में भी इस मुद्दे पर चर्चा जारी है.

भारत स्थायी सदस्य क्यों बनना चाहता है?

भारत लंबे समय से UNSC में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है. भारत का तर्क है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल होने के साथ-साथ वह वैश्विक अर्थव्यवस्था, शांति अभियानों और अंतरराष्ट्रीय मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

भारत G4 समूह का भी हिस्सा है. इसमें भारत के अलावा ब्राजील, जर्मनी और जापान शामिल हैं. G4 सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार की वकालत करता है. G4 के प्रस्ताव में नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने की बात कही गई है.

भारत के लिए स्थायी सीट का मतलब सिर्फ प्रतिष्ठा नहीं है. इसका सीधा संबंध वैश्विक फैसलों में उसकी भूमिका से है. स्थायी सदस्य बनने पर भारत को सुरक्षा परिषद की निर्णय प्रक्रिया में लगातार और अधिक प्रभावी भूमिका मिल सकती है.

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दुनिया की बदलती ताकत के हिसाब से प्रतिनिधित्व का सवाल क्यों उठ रहा है?

आज वैश्विक राजनीति सिर्फ यूरोप और पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है. एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की आर्थिक और राजनीतिक भूमिका लगातार बढ़ी है. भारत, ब्राजील, जापान और जर्मनी जैसे देशों के साथ अफ्रीका के प्रतिनिधित्व को लेकर भी सुधार की मांग उठती रही है. संयुक्त राष्ट्र की चर्चाओं में विकासशील देशों और अफ्रीकी देशों के अधिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा लगातार सामने आया है.

यही वजह है कि UNSC सुधार की बहस को सिर्फ “भारत को स्थायी सीट मिले या नहीं” के सवाल तक सीमित नहीं किया जा सकता. असली बहस यह है कि 21वीं सदी की दुनिया में वैश्विक फैसले लेने वाली संस्था में किन देशों और क्षेत्रों की आवाज कितनी होनी चाहिए.

अगर सुधार होता है तो भारत और विकासशील देशों को क्या फायदा होगा?

अगर सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है और भारत जैसे देशों को स्थायी भूमिका मिलती है, तो वैश्विक मुद्दों पर विकासशील देशों की आवाज ज्यादा मजबूत हो सकती है. भारत के लिए इसका मतलब होगा कि युद्ध, वैश्विक सुरक्षा, आतंकवाद, शांति अभियानों और अंतरराष्ट्रीय संकटों से जुड़े बड़े फैसलों में उसकी भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा.

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क्या बदल सकता है?

UNSC सुधार के तहत संभावित बदलावों पर सदस्य देशों के बीच अभी बातचीत जारी है. इनमें परिषद की सदस्य संख्या बढ़ाना, नए स्थायी और अस्थायी सदस्य जोड़ना तथा अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बेहतर करना जैसे प्रस्ताव शामिल हैं. संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रिया में अलग-अलग देशों और समूहों ने इस दिशा में अपने मॉडल भी पेश किए हैं.

इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि UNSC का अंतिम नया ढांचा कैसा होगा. लेकिन मोदी-गुटेरेस की बातचीत ने एक बार फिर उस बड़े सवाल को सामने ला दिया है- क्या 21वीं सदी की दुनिया को अब 1945 के बाद बनी शक्ति व्यवस्था के हिसाब से चलाया जा सकता है?