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SMR से भारत की न्यूक्लियर पावर को मिलेगी नई रफ्तार, समझिए रूस को क्यों मिल सकता है फायदा?

भारत अपने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को तेजी से विस्तार देने की तैयारी में है. सरकार चाहती है कि आने वाले सालों में देश में ज्यादा परमाणु बिजली बने और इसमें विदेशी कंपनियों की तकनीक और निवेश की भी भूमिका हो. इसी बीच डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी ने शांति एक्ट के तहत ड्राफ्ट नियम जारी किए हैं. इन नियमों में विदेशी न्यूक्लियर तकनीक को लेकर कुछ ऐसी शर्तें रखी गई हैं, जिनसे रूस की स्थिति मजबूत हो सकती है.
खासकर स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR के मामले में रूस के पास एक ऐसा अनुभव है, जो कई पश्चिमी देश के कंपनियों के पास अभी नहीं है. हालांकि इसे रूस के लिए अपने आप मिलने वाली डील या गारंटी समझना सही नहीं होगा.
क्या है शांति एक्ट और नया ड्राफ्ट?
शांति का पूरा नाम ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ है.
इसका उद्देश्य भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाना, लाइसेंसिंग व्यवस्था को सरल करना और विदेशी तकनीक के इस्तेमाल के लिए रास्ता बनाना है.
ड्राफ्ट नियमों में न्यूक्लियर पावर प्लांट के निर्माण, मालिकाना हक, संचालन और डीकमीशनिंग के लिए एक कंपोजिट लाइसेंस की व्यवस्था प्रस्तावित है.
डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी ने इन ड्राफ्ट नियमों और रेगुलेशन पर सार्वजनिक सुझाव भी मांगे हैं. यानी अभी यह अंतिम नियम नहीं हैं.
विदेशी न्यूक्लियर तकनीक के लिए क्या शर्त है?
सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान विदेशी न्यूक्लियर तकनीक से जुड़ा है. प्रस्ताव के मुताबिक भारत में इस्तेमाल होने वाली विदेशी तकनीक को उसके मूल देश के रेगुलेटरी सिस्टम से डिजाइन सर्टिफिकेशन या अप्रूवल हासिल होना चाहिए. साथ ही उस तकनीक का भारत के बाहर किसी देश में संचालन हो चुका होना जरूरी होगा.
यहीं पर रूस का संभावित फायदा सामने आता है. इसका मतलब यह नहीं है कि हर रूसी रिएक्टर अपने आप भारत के लिए योग्य हो जाएगा. उसे भी प्रस्तावित सुरक्षा, नियामकीय और राष्ट्रीय हित से जुड़ी शर्तें पूरी करनी होंगी. लेकिन जिस तकनीक का वास्तविक संचालन पहले से साबित है, उसके लिए शुरुआती बाधा अपेक्षाकृत कम हो सकती है.
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SMR को लेकर रूस क्यों हो सकता पहली पसंद
SMR यानी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर आम तौर पर 300 मेगावाट या उससे कम क्षमता वाले रिएक्टर होते हैं. इनका उद्देश्य छोटे आकार और मॉड्यूलर निर्माण के जरिए कम समय में बिजली उत्पादन करना है. इनका इस्तेमाल छोटे ग्रिड, औद्योगिक इकाइयों और दूसरे विशेष ऊर्जा उपयोगों में किया जा सकता है.
SMR का इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने के लिए किया जाता है. बड़े न्यूक्लियर पावर प्लांट की तुलना में SMR छोटे होते हैं और इन्हें जरूरत के हिसाब से अलग-अलग जगहों पर लगाया जाता है.
रूस का सबसे बड़ा उदाहरण अकादमिक लोमोनोसोव है.
यह दुनिया का पहला फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट है और मई 2020 में इसने कमर्शियल ऑपरेशन शुरू किया था.इसमें 35-35 मेगावाट के दो रिएक्टर मॉड्यूल हैं. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी इसे ऑपरेशनल SMR तकनीक के प्रमुख उदाहरण के रूप में दर्ज किया है.
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि दुनिया में सिर्फ दो ही एसएमआर ऑपरेशनल हैं. चीन का एचटीआर-पीएम भी दिसंबर 2023 में कमर्शियल ऑपरेशन में आया था. इसलिए रूस के पास एसएमआर क्षेत्र में वास्तविक ऑपरेशनल अनुभव है, लेकिन वह अकेला देश नहीं है.
पश्चिमी कंपनियों के लिए क्या है चुनौती ?
अमेरिका और यूरोप की कई कंपनियां SMR तकनीक पर काम कर रही हैं. लेकिन हर डिजाइन के लिए तकनीकी विकास, घरेलू रेगुलेटरी अप्रूवल और कमर्शियल ऑपरेशन का स्तर अलग है.
इसलिए प्रस्तावित भारतीय नियमों का असर कंपनी-दर-कंपनी अलग होगा. जिस डिजाइन का घरेलू रेगुलेटर से अप्रूवल और विदेश में वास्तविक ऑपरेशन दोनों साबित हैं, उसे भारत में प्रवेश के लिहाज से फायदा मिल सकता है.
इसके उलट केवल डिजाइन या परीक्षण के चरण में मौजूद तकनीक को अतिरिक्त सरकारी नियमों के कारण रुकावटों का सामना करना पड़ सकता है.
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भारत-रूस की पुरानी न्यूक्लियर साझेदारी भी अहम
रूस का फायदा केवल SMR तक सीमित नहीं है. भारत और रूस पहले से कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट में साथ काम कर रहे हैं.
कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट में रूस की तकनीक से बने रिएक्टर लगाए गए हैं. इसकी पहली यूनिट ने 2014 में और दूसरी यूनिट ने 2017 में बिजली बनाकर कमर्शियल रूप से काम करना शुरू किया. अब इसी प्रोजेक्ट की यूनिट 3, 4, 5 और 6 को भी रूस के सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है
इससे भारत में रूसी न्यूक्लियर तकनीक, सप्लाई चेन और संचालन का एक मौजूदा आधार मौजूद है.
न्यूक्लियर प्लांट के लिए आर्थिक चुनौती भी है अहम
न्यूक्लियर पावर में सिर्फ रिएक्टर की कीमत महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि जमीन, निर्माण, उपकरण, लाइसेंसिंग, वित्त और लंबे निर्माण समय के कारण भी खर्च कुल लागत को प्रभावित करता है.
वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक नए न्यूक्लियर प्लांट की लेवलाइज्ड कॉस्ट ऑफ इलेक्ट्रिसिटी में कैपिटल कॉस्ट का हिस्सा कम से कम 60 प्रतिशत तक हो सकता है. जो लंबे समय और ब्याज दर बढ़ने से और बढ़ सकता है.
इसलिए रूस के लिए भारत में चुनौती सिर्फ तकनीक बेचने की नहीं होगी. उसे लागत, वित्तीय मॉडल, स्थानीय निर्माण, सुरक्षा मंजूरी और भारत की बढ़ती स्वदेशी क्षमता के साथ मुकाबला भी करनी होगी.
रूस को फायदा है, लेकिन बाजी अभी तय नहीं
शांति एक्ट के ड्राफ्ट नियम रूस के लिए एक संभावित रणनीतिक फायदा जरूर पैदा करते हैं, खासकर उन न्यूक्लियर डिजाइनों में जिनका वास्तविक विदेशी संचालन पहले से साबित है. SMR में अकादमिक लोमोनोसोव का अनुभव और भारत में कुडनकुलम जैसी पुरानी साझेदारी रूस की स्थिति को मजबूत बनाती है.
लेकिन अंतिम तस्वीर अभी सामने नहीं आई है. ड्राफ्ट नियमों पर सुझाव मांगे गए हैं और अंतिम नियमों में बदलाव संभव है. इसके अलावा भारत खुद स्वदेशी छोटे रिएक्टर विकसित कर रहा है और सरकार ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को बड़े स्तर पर बढ़ाने का लक्ष्य रखा है.
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