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13089 चयनित प्राथमिक शिक्षकों को हाईकोर्ट से झटका:गलत तरीके से 5% बोनस अंक लेने वालों को की सभी रिट अपीलें खारिज
मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल की प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा-2025 में अपात्र अभ्यर्थियों को गलत तरीके से दिए गए 5% बोनस अंकों के मामले में हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश को सही ठहराया है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की खंडपीठ ने प्रभावित अभ्यर्थियों की सभी रिट अपीलें खारिज कर दीं। इसके साथ ही 13,089 प्राथमिक शिक्षकों के पूर्व चयन पर फिर से असर पड़ा है। अब एकलपीठ के निर्देश के अनुसार सत्यापन के बाद नए सिरे से मेरिट सूची तैयार कर नियुक्तियां दी जाएंगी। क्या था मामला नरसिंहपुर निवासी सोनम अगरैया एवं अन्य ने रिट याचिका क्रमांक 12970/2026 के माध्यम से मामला हाईकोर्ट में उठाया था। याचिका में बताया गया कि भर्ती नियम पुस्तिका की कंडिका 7.7 के अनुसार केवल भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) से मान्यता प्राप्त विशेष शिक्षा डिप्लोमा धारक अभ्यर्थियों को ही 5% बोनस अंक दिए जाने थे। आरोप था कि 13,089 पदों की चयन सूची में करीब 14,964 अभ्यर्थियों ने खुद को RCI योग्यता वाली श्रेणी में बताकर बोनस अंक हासिल कर लिए, जबकि RCI के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वास्तव में करीब 5,271 अभ्यर्थी ही मान्य RCI योग्यता रखते थे। इससे वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों की मेरिट प्रभावित होने का मामला सामने आया। ऑनलाइन 'हां' के आधार पर दे दिए बोनस अंक एकलपीठ ने 6 मई 2026 को जस्टिस विशाल धगट के समक्ष हुई सुनवाई के बाद पाया था कि मंडल ने ऑनलाइन आवेदन में अभ्यर्थी द्वारा 'हां' विकल्प चुनने के आधार पर ही बोनस अंक दे दिए, जबकि उस समय दस्तावेजों का सत्यापन नहीं किया गया था। कोर्ट ने कहा था कि अभ्यर्थियों को अपनी जानकारी सुधारने के पर्याप्त अवसर दिए गए थे। ऐसे में परिणाम घोषित होने के बाद यह कहना कि गलत विकल्प गलती से चुन लिया गया था और अब बोनस अंक हटा दिए जाएं, स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि इससे गलत जानकारी देने वालों को लाभ मिलेगा और ईमानदारी से आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को नुकसान होगा। एकलपीठ ने दिए थे ये निर्देश एकलपीठ ने राज्य शासन को चयन सूची कर्मचारी चयन मंडल को वापस भेजने और मंडल को उन सभी अभ्यर्थियों के लिए 15 दिन की अतिरिक्त विंडो खोलने का निर्देश दिया था, जिन्होंने RCI डिप्लोमा के लिए 'हां' विकल्प चुना था। इस विंडो में अभ्यर्थियों को अपना RCI से मान्यता प्राप्त विशेष डीएलएड डिप्लोमा अपलोड करना था। इसके बाद मंडल को प्रमाण-पत्रों का सत्यापन करना था। जिन अभ्यर्थियों ने प्रमाण-पत्र अपलोड नहीं किया, उनके आवेदन निरस्त कर तीन महीने के भीतर संशोधित मेरिट सूची तैयार कर नियुक्ति देने के निर्देश दिए गए थे। इस आदेश को प्रभावित अभ्यर्थियों ने डबल बेंच में रिट अपील दायर कर चुनौती दी थी। अपीलार्थियों ने कहा- 'हां' गलती से हुआ डबल बेंच में अपीलार्थियों की ओर से तर्क दिया गया कि उनके पास वास्तव में RCI डिप्लोमा नहीं है और ऑनलाइन आवेदन में 'हां' का विकल्प भूलवश चुन लिया गया था। उनका कहना था कि वे बोनस अंक की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि बोनस अंक हटाकर उनके वास्तविक अंकों के आधार पर चयन प्रक्रिया में शामिल किया जाए। कुछ अपीलार्थियों ने खुद को दिव्यांग श्रेणी का बताते हुए कोर्ट से सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का अनुरोध भी किया। कोर्ट ने कहा- सुधार के तीन मौके मिले थे खंडपीठ ने पाया कि भर्ती नियमों के तहत अभ्यर्थियों को अपनी जानकारी सुधारने के लिए तीन अलग-अलग अवसर दिए गए थे। इसके बावजूद अपीलार्थियों ने इन अवसरों के दौरान अपनी जानकारी में सुधार नहीं किया। 'मेरिट में आ रहे हैं, इसलिए अब गलती बता रहे' खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि परिणाम घोषित होने के बाद जब कुछ अभ्यर्थियों को पता चला कि बोनस अंक हटाए जाने के बाद भी वे मेरिट में आ सकते हैं, तभी उन्होंने आवेदन में 'हां' का विकल्प गलती से चुनने की बात कही और सुधार की मांग की। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जानबूझकर गलत जानकारी देकर बोनस अंक प्राप्त करना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। सर्वमान्य विधिक सिद्धांत के अनुसार धोखाधड़ी के आधार पर प्राप्त लाभ को बाद में वैध अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता। हजारों अभ्यर्थियों की मेरिट प्रभावित होती कोर्ट ने यह भी माना कि इस स्तर पर पूरी प्रक्रिया को फिर से खोलने से हजारों अभ्यर्थियों की अंतर-वरीयता (inter se seniority/merit position) प्रभावित होगी। इससे उन अभ्यर्थियों के अधिकारों पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा, जिन्होंने आवेदन में सही जानकारी दी और उसी आधार पर चयन प्राप्त किया। खंडपीठ ने महेश कुमार बाथम बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम सहित सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि धोखाधड़ी से प्राप्त लाभ के आधार पर बाद में समानता के सिद्धांत के तहत राहत नहीं मांगी जा सकती। सभी रिट अपीलें खारिज खंडपीठ ने पाया कि एकलपीठ के 6 मई 2026 के आदेश में तथ्य या कानून की कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए प्रभावित अभ्यर्थियों की ओर से दायर सभी रिट अपीलों को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया गया। अब भर्ती प्रक्रिया में एकलपीठ के निर्देश के अनुसार RCI प्रमाण-पत्रों का सत्यापन किया जाएगा। अपात्र अभ्यर्थियों के आवेदन निरस्त किए जाएंगे और इसके बाद संशोधित मेरिट सूची के आधार पर नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। मूल याचिका में याचिकाकर्ताओं तथा रिट अपीलों में उत्तरदाताओं की ओर से अधिवक्ता आलोक वागरेचा और अधिवक्ता विशाल बघेल ने पैरवी की।