Friday, 7 August 2026
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17 साल पुराने हत्या केस में दो भाई बरी:जबलपुर हाईकोर्ट ने पुलिस जांच पर उठाए सवाल,कहा-मृतक हस्ताक्षर करता था अंगूठा क्यों लगवाया; FIR किसने लिखी

INT News7 August 2026 at 08:35 am

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दमोह जिले के 17 साल पुराने चर्चित हत्या मामले में गुरुवार को फैसला सुनाते हुए दो सगे भाइयों की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने पाया कि पुलिस जांच में गंभीर खामियां और साक्ष्यों में कई विरोधाभास हैं। कोर्ट ने दोनों आरोपियों को तत्काल रिहा करने के आदेश दिए। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं और ऐसे दोषपूर्ण साक्ष्यों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। 2009 में हुई थी हत्या मामला दमोह जिले के मड़ियादो थाना क्षेत्र का है। 25 अगस्त 2009 की रात करीब 8:45 बजे प्यारेलाल गड़रिया की चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में बालाजी मोहल्ला निवासी तुलसीराम राजपाल और उनके भाई हरप्रसाद को आरोपी बनाया गया था। दमोह जिला एवं सत्र न्यायालय ने 29 जून 2012 को दोनों भाइयों को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। एफआईआर पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस यह तक नहीं बता सकी कि एफआईआर किस पुलिसकर्मी ने लिखी थी। जिस अधिकारी ने एफआईआर तैयार की, उसका बयान भी अदालत में पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने इसे जांच की गंभीर कमी माना। अदालत ने यह भी पाया कि मृतक सामान्य रूप से हस्ताक्षर करता था, लेकिन एफआईआर पर उसके अंगूठे का निशान था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि परिस्थितियां इस आशंका को जन्म देती हैं कि एफआईआर मृतक की मौत के बाद तैयार की गई और उसके अंगूठे का उपयोग किया गया। इससे एफआईआर की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। गवाहों और मेडिकल साक्ष्यों में विरोधाभास हाईकोर्ट ने पाया कि मृतक के परिजनों के बयानों में भी बड़ा विरोधाभास था। बेटे ने कहा कि थाने से निकलते ही पिता की मौत हो गई, जबकि पत्नी ने बताया कि अस्पताल पहुंचने तक वे जीवित थे। दूसरी ओर डॉक्टर की गवाही में कहा गया कि अस्पताल लाते समय ही मृतक की मृत्यु हो चुकी थी। कोर्ट ने यह भी पूछा कि यदि मृतक एफआईआर दर्ज कराते समय जीवित था तो उसे अस्पताल भेजने का अनिवार्य मेडिकल रेफरल रिकॉर्ड पर क्यों नहीं है। अभियोजन इसका संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। चाकू पर नहीं मिला खून, गवाहों के बयान में भी देरी पुलिस द्वारा बरामद किए गए कथित हत्या के चाकू की एफएसएल रिपोर्ट में खून के निशान नहीं मिले। वहीं, मुख्य प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान घटना के 15 से 30 दिन बाद दर्ज किए गए। अभियोजन इस देरी का भी कोई ठोस कारण नहीं बता सका। संदेह से परे अपराध साबित नहीं कर सका अभियोजन खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा। पुलिस जांच में गंभीर त्रुटियां, साक्ष्यों में विरोधाभास और प्रक्रिया संबंधी खामियों के कारण दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने दोनों भाइयों की उम्रकैद की सजा निरस्त करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर तत्काल रिहा करने के आदेश दिए।