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अरुणाचल पर चीन के ‘कब्जे’ का सच क्या? 1962 की जंग से आज की LAC तक जानें पूरी कहानी

अरुणाचल प्रदेश में चीन द्वारा धीरे-धीरे कब्जा करने के सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावों को लेकर भारत सरकार ने स्पष्टीकरण दिया है. अरुणाचल प्रदेश में चीन द्वारा धीरे-धीरे कब्जा किए जाने जैसा कोई मामला नहीं है. ऐसे दावे बिना ठोस जानकारी के किए जा रहे हैं और सिर्फ ध्यान आकर्षित करने की कोशिश हो सकते हैं.
चीन अरुणाचल को बताता है दक्षिणी तिब्बत
चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता रहा है. एएनआई न्यूज एजेंसी केअनुसार, साल 1960 की सीमा वार्ता के दौरान चीन ने अरुणाचल प्रदेश के करीब 69,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अपना दावा जताया था. भारत हालांकि अरुणाचल प्रदेश को अपने अभिन्न क्षेत्र के रूप में मानता है.
चीन ने अरुणाचल प्रदेश (जिसे वह 'जांगनान' कहता है) के स्थानों के मानकीकृत चीनी नामों की सूचियाँ चार अलग-अलग वर्षों में जारी की हैं. पहली सूची 2017 में, दूसरी दिसंबर 2021 में, तीसरी अप्रैल 2023 में और इसके बाद 2024–2025 के दौरान भी ऐसे कदम उठाए गए. हालांकि, भारत सरकार इन मनगढ़ंत दावों को लगातार खारिज करती आई है.
1959 में लोंगजू चौकी पर हुआ था हमला
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 1959 में चीन ने लोंगजू में असम राइफल्स की चौकी पर हमला कर उसे अपने कब्जे में ले लिया था. तब से यह इलाका चीन के नियंत्रण में है. यहां चीन की ओर से किए जा रहे बुनियादी ढांचे के विकास के कारण यह क्षेत्र अक्सर चर्चा में रहता है.
1962 के युद्ध में चीन ने चलाया था सैन्य अभियान
सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने कामेंग, सुबनसिरी, सियोम, सियांग और लोहित घाटियों में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाए थे. हालांकि, युद्धविराम के बाद चीनी सेना LAC के उत्तर में वापस चली गई थी.
सीमा पर आमना-सामना होता है तो ऐसे सुलझता है मामला
अरुणाचल प्रदेश की सीमा तिब्बत के साथ महान हिमालय पर्वतमाला के सहारे काफी लंबी है. सीमा का स्पष्ट सीमांकन नहीं होने के कारण कई बार दोनों देशों की गश्ती टुकड़ियों का आमना-सामना हो जाता है. ऐसे मामलों को मौजूदा तंत्र और तय नियमों के जरिए सुलझाया जाता है.
सेना और ITBP पूरी तरह सतर्क
भारतीय सेना और ITBP सीमा पर अपनी पकड़ बनाए रखने के साथ चीनी गतिविधियों पर लगातार नजर रख रहे हैं.अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में नई सड़कों, पुलों और फॉरवर्ड एरिया कनेक्टिविटी के विकास से भारतीय सेना की गश्त (patrolling) और निगरानी क्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. देपसांग और डेमचोक जैसे इलाकों में बुनियादी ढांचे की मजबूती के बाद गश्त बहाल हुई है, और सितंबर 2023 तथा हालिया 2026 की सुरक्षा रिपोर्टों के अनुसार सीमावर्ती चौकियों पर आवाजाही और गश्त के दायरे में लगातार विस्तार हुआ है.
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