Tuesday, 18 August 2026
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जब गोमो पहुंचकर गायब हो गए नेताजी! झारखंड की धरती से शुरू हुई थी अंग्रेजों को चकमा देने की कहानी

INT News18 August 2026 at 04:42 pm

रांची: देश आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर रहा है. नेताजी की जिंदगी से जुड़े कई किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, लेकिन झारखंड का गोमो उनकी उस ऐतिहासिक यात्रा का अहम पड़ाव है, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को लंबे समय तक उलझाए रखा. यही वह जगह थी, जहां पहुंचने के बाद नेताजी ने ट्रेन पकड़ी और अंग्रेजों की निगरानी से दूर निकलने की अपनी यात्रा आगे बढ़ाई.

नजरबंदी से निकलकर पहुंचे थे गोमो

साल 1941में ब्रिटिश सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नजरबंद कर रखा था. लेकिन नेताजी ने अंग्रेजों को चकमा देने की योजना बनाई. जनवरी 1941 में वह अपने कोलकाता स्थित एल्गिन रोड के घर से गुप्त रूप से निकल गए. भेष बदलकर निकले नेताजी को उनके भतीजे शिशिर कुमार बोस कार से लेकर गोमो पहुंचे. उस समय गोमो रेलवे जंक्शन पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण रेल संपर्क केंद्र था.

यहीं से नेताजी ने ट्रेन पकड़ी और अपनी गुप्त यात्रा को आगे बढ़ाया. इसके बाद उनका रास्ता दिल्ली और पेशावर की ओर गया और आगे उन्होंने भारत से बाहर निकलने की योजना को अंजाम दिया.

गोमो से निकलते ही बदल गई कहानी

गोमो पहुंचना नेताजी की योजना का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा था. अंग्रेजी खुफिया एजेंसियां उन्हें तलाश रही थीं, लेकिन तब तक नेताजी अपनी पहचान और हुलिया बदल चुके थे.

गोमो से ट्रेन पकड़ने के बाद उनकी यात्रा भारत की सीमाओं से बाहर निकलने की दिशा में बढ़ी। आगे चलकर वह अफगानिस्तान के रास्ते यूरोप पहुंचे और जर्मनी में आजाद हिंद आंदोलन के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश की.

यानी झारखंड की धरती उनके उस अभियान की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी, जिसका उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना था.

आज भी नेताजी के नाम से जाना जाता है गोमो

नेताजी के गोमो से ऐतिहासिक जुड़ाव की याद आज भी यहां मौजूद है. गोमो रेलवे स्टेशन का नाम अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन, गोमो है. स्टेशन परिसर में नेताजी की प्रतिमा भी स्थापित है.

हर साल नेताजी से जुड़े कार्यक्रमों के दौरान गोमो में उनके इस ऐतिहासिक सफर को याद किया जाता है.

18 अगस्त और नेताजी की मौत का रहस्य

नेताजी की मृत्यु को लेकर आज भी इतिहास में चर्चा और विवाद बना हुआ है. आधिकारिक तौर पर माना जाता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (अब ताइपेई) में विमान दुर्घटना के बाद नेताजी की मृत्यु हुई थी.

हालांकि, उनकी मृत्यु को लेकर लंबे समय से अलग-अलग दावे और सवाल उठते रहे हैं. यही वजह है कि 18 अगस्त का दिन नेताजी की पुण्यतिथि के साथ-साथ उनकी जिंदगी और उनके रहस्यमय अंत की चर्चा का भी दिन बन गया है.

झारखंड के लिए क्यों खास है नेताजी का गोमो कनेक्शन?

नेताजी के जीवन में गोमो महज एक रेलवे स्टेशन नहीं था. यह उनकी उस गुप्त यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव था, जहां से वह ब्रिटिश निगरानी को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़े.

आज जब देश नेताजी को याद कर रहा है, तब झारखंड के लिए यह गर्व की बात है कि गोमो की धरती नेताजी सुभाष चंद्र बोस की उस ऐतिहासिक यात्रा की गवाह रही, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक अलग अध्याय जोड़ दिया.