Tuesday, 30 June 2026
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प्रख्यात भाषाविद् एवं साहित्यकार डॉ. गणेश देवी बोले:'भारत की भाषाई विविधता विश्व में अद्वितीय, आज भी 1150 से अधिक भाषाएं जीवित'

INT News30 June 2026 at 09:44 pm

भारत आज भी दुनिया के सबसे समृद्ध भाषाई देशों में शामिल है। देश में 1,150 से अधिक भाषाएं और बोलियां आज भी जीवित हैं, जो हमारी सांस्कृतिक विविधता, ज्ञान परंपरा और सामाजिक इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। यह बात प्रख्यात भाषाविद् एवं साहित्यकार डॉ. गणेश देवी ने मंगलवार को गांधी भवन, भोपाल में आयोजित संगोष्ठी में कही। 'हम, सब ओर' और गांधी भवन की संयुक्त पहल पर आयोजित इस संगोष्ठी में डॉ. देवी ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, लोकज्ञान, जीवन-दृष्टि और सामूहिक स्मृतियों की संवाहक होती है। इसलिए भाषाओं का संरक्षण केवल साहित्यिक दायित्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय जिम्मेदारी भी है। भाषाई इतिहास को विभिन्न कालखंडों में समझा जा सकता है उन्होंने भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक विकास पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत के भाषाई इतिहास को विभिन्न कालखंडों में समझा जा सकता है। उन्होंने संस्कृत के प्रभाव वाले दौर, उसके बाद फारसी के प्रभाव तथा आधुनिक समय में अंग्रेज़ी के प्रभाव वाले काल की चर्चा करते हुए बताया कि इन सभी चरणों ने भारतीय भाषाओं की शब्दावली, अभिव्यक्ति और स्वरूप को प्रभावित किया है। इसके बावजूद भारतीय भाषाओं ने अपनी मौलिकता और सांस्कृतिक पहचान को आज तक सुरक्षित रखा है। डॉ. देवी ने कहा कि भारतीय भाषाओं का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है, जब शिक्षा, प्रशासन, न्याय, विज्ञान और तकनीकी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मातृभाषाओं और भारतीय भाषाओं को सम्मानजनक स्थान मिले। उन्होंने कहा कि भाषाई विविधता लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। किसी भाषा का समाप्त होना केवल शब्दों का लुप्त होना नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक संसार का खत्म हो जाना है। उन्होंने युवाओं से भारतीय भाषाओं और लोकभाषाओं के अध्ययन, दस्तावेजीकरण तथा संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उनका कहना था कि भारत की भाषाई विविधता हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक पूंजी है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों, शोधार्थियों, साहित्यकारों और विद्यार्थियों ने भी भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और भाषा आधारित शोध को समय की आवश्यकता बताया। इस दौरान भाषाई विरासत, लोकभाषाओं के संरक्षण और भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे विषयों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम का संचालन राकेश दीवान ने किया। गांधी भवन के सचिव अंकित मिश्रा ने अतिथियों का सूत की माला पहनाकर स्वागत किया। रघुराज सिंह ने डॉ. गणेश देवी का परिचय प्रस्तुत किया, जबकि अंत में पीयूष बबेले ने आभार व्यक्त किया।