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B.Ed.-D.Ed. पर दो वेतनवृद्धि का लाभ बरकरार:सरकार की रिव्यू पिटीशन खारिज, हाईकोर्ट बोला-समान वर्ग के शिक्षकों में मनमाना कटऑफ नहीं लगा सकते
जबलपुर हाईकोर्ट ने शिक्षकों को B.Ed.-D.Ed. की योग्यता हासिल करने पर मिलने वाली दो अग्रिम वेतनवृद्धि के मामले में राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच ने कहा कि एक ही वर्ग के कर्मचारियों के बीच बिना ठोस आधार के कट-ऑफ डेट लगाकर उप-वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। प्रशासनिक सर्कुलर के जरिए मूल नियमों के तहत मिलने वाले वैधानिक लाभ से कर्मचारियों को वंचित नहीं किया जा सकता। मामला पन्ना जिले के शिक्षक सुमेर सिंह और भान सिंह से जुड़ा है। दोनों ने B.Ed.-D.Ed. की योग्यता हासिल की थी। हाईकोर्ट ने 16 जून 2025 को उन्हें संबंधित योग्यता पूरी करने पर दो अग्रिम वेतनवृद्धि देने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इसी आदेश पर पुनर्विचार की मांग की थी। सरकार ने 1 मार्च 1999 की कटऑफ का दिया हवाला राज्य सरकार ने रिव्यू पिटीशन में दलील दी कि दोनों शिक्षकों ने आवश्यक शैक्षणिक योग्यता 1 मार्च 1999 के बाद हासिल की थी। इसलिए उन्हें वेतनवृद्धि का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। गुरुवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मूल नियमों और बाद में जारी सर्कुलर की स्थिति पर विचार किया। अदालत के सामने आया कि नियमों के मुताबिक 16 जून 1993 से पहले नियुक्त शिक्षकों को इस लाभ का पात्र माना गया था। इसकी वजह यह थी कि 16 जून 1993 के बाद संबंधित शैक्षणिक योग्यता शिक्षक भर्ती के लिए अनिवार्य कर दी गई थी। बाद में सरकार ने सर्कुलर जारी कर एक अतिरिक्त शर्त जोड़ दी। इसमें कहा गया कि 16 जून 1993 से पहले नियुक्त शिक्षक तभी दो अग्रिम वेतनवृद्धि के पात्र होंगे, जब उन्होंने B.Ed.-D.Ed. की योग्यता 1 मार्च 1999 से पहले हासिल की हो। कोर्ट ने कहा- सर्कुलर से नहीं खत्म कर सकते वैधानिक लाभ जस्टिस विवेक जैन ने कहा कि 16 जून 1993 से पहले नियुक्त सभी शिक्षक एक ही वर्ग में आते हैं। ऐसे में उनके बीच अलग-अलग व्यवहार करने के लिए उचित, तार्किक और उद्देश्यपूर्ण आधार जरूरी है। 1 मार्च 1999 की कटऑफ के जरिए शिक्षकों का उप-वर्गीकरण करने का कोई ठोस औचित्य सरकार पेश नहीं कर सकी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल प्रशासनिक सर्कुलर जारी करके ऐसे कर्मचारियों को वैधानिक लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता, जो मूल नियमों के तहत समान श्रेणी में आते हैं। अदालत को पुनर्विचार का कोई ठोस आधार नहीं मिला। इसके बाद राज्य सरकार की रिव्यू पिटीशन खारिज करते हुए 16 जून 2025 के मूल आदेश को बरकरार रखा गया। शिक्षकों की ओर से अधिवक्ता सुभाष कुमार चतुर्वेदी ने पैरवी की। फैसले में हाईकोर्ट ने यह सिद्धांत दोहराया कि समान परिस्थिति वाले कर्मचारियों के बीच लाभ देने या रोकने के लिए मनमानी कटऑफ या वर्गीकरण नहीं किया जा सकता।