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12 साल में तीन गुना बढ़ा भारत का रक्षा बजट, फिर चीन से मुकाबला क्यों मुश्किल? ITBP चीफ के बयान से उठे सवाल

INT News24 October 2026 at 08:39 am

India China Border Tension: राजस्थान के अलवर में 22 अक्टूबर को ITBP के एक कार्यक्रम में महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने चीन की सैन्य ताकत का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि चीन भारत का शक्तिशाली पड़ोसी और सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है. उससे लगी सीमा देश के सबसे कठिन मोर्चों में शामिल है. कपूर ने यह भी बताया कि चीन ने अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को आधुनिक बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है. उसकी सेना नए हथियारों और तकनीक से लैस हो रही है. इसलिए पुराने युद्ध के तरीकों पर निर्भर रहकर चीन से पार पाना मुश्किल है.

चीन से लगी सीमा भारत की सबसे कठिन सीमा है और चीन एक शक्तिशाली पड़ोसी के साथ-साथ तथा भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है. उससे मुकाबला करने के लिए बल की क्षमताओं को बढ़ाना जरूरी है. ड्रोन एक बड़ी चुनौती बन गए हैं और अवसर भी. पारंपरिक तरीकों से चीन का मुकाबला करना मुश्किल होगा. उसने अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) का आधुनिकीकरण किया है और उस पर भारी निवेश किया है. लेकिन ड्रोन ऐसी तकनीक हैं, जिनसे छोटा देश भी बड़े देश को कड़ी टक्कर दे सकता है- ITBP महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर

महानिदेशक कपूर ने केवल खतरे की बात नहीं की. उन्होंने इससे निपटने का रास्ता भी बताया. उनका जोर ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक पर था. उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध का उदाहरण दिया. कहा कि अब युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है. ड्रोन जैसी तकनीक के सहारे छोटा देश भी बड़ी सैन्य शक्ति को चुनौती दे सकता है. इसलिए ITBP को भी नई तकनीक के मुताबिक अपनी तैयारी बढ़ानी होगी.

अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन के बीच क्या चल रहा है?

ITBP महानिदेशक ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों में भारतीय और चीनी जवान आमने-सामने आए हैं. कुछ स्थानों पर यह स्थिति अब भी बनी हुई है. यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में तनाव की खबरें पहले भी सामने आ चुकी थीं. सितंबर में दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच बातचीत भी हुई थी. रिपोर्टों के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश के ताकसिंग क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए 6 सितंबर को वाचा-दामाई सीमा बैठक स्थल पर कोर कमांडर स्तर की बातचीत हुई थी. इसके बावजूद ITBP प्रमुख के ताजा बयान से पता चलता है कि कुछ स्थानों पर आमने-सामने की स्थिति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

उनके बयान के अगले दिन यानी 23 अक्टूबर को विदेश मंत्रालय ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी. मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि जब चीनी सैनिक स्थापित गश्ती व्यवस्था से अलग गतिविधियां करते हैं, तो सीमा पर तनाव पैदा होता है. उन्होंने बताया कि भारत और चीन विवाद सुलझाने के लिए सैन्य और कूटनीतिक माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हैं. दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को लेकर गलतफहमी दूर करने के उपायों पर भी बातचीत कर रहे हैं.

यानी एक तरफ बातचीत जारी है, दूसरी तरफ सीमा पर चुनौतियां भी बनी हुई हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इन चुनौतियों के मुकाबले भारत ने पिछले वर्षों में अपनी तैयारी कितनी बढ़ाई है.

ITBP चीफ के बयान से मोदी सरकार के 12 साल पर सवाल क्यों?

नरेंद्र मोदी मई 2014 में प्रधानमंत्री बने थे. अक्टूबर 2026 तक केंद्र में उनके नेतृत्व वाली सरकार को 12 साल से अधिक समय हो चुका है. इस दौरान सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा है. रक्षा बजट बढ़ाने, आधुनिक हथियार खरीदने और सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने पर जोर दिया गया है. लेकिन ITBP प्रमुख का बयान इस बहस को फिर से हवा दे दी है.

सवाल यह है कि जब चीन अपनी सेना को लगातार आधुनिक बना रहा था, तब भारत ने कितनी तेजी से नई तकनीक अपनाई? ऊंचे पहाड़ों पर तैनात जवानों के पास कितने आधुनिक उपकरण पहुंचे? क्या निगरानी और संचार व्यवस्था में जरूरत के मुताबिक सुधार हुआ?

कांग्रेस ने भी अरुणाचल प्रदेश में जारी आमने-सामने की स्थिति को लेकर केंद्र सरकार से सवाल पूछे हैं. पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री से सीमा के हालात और भारत की गश्त से जुड़े अधिकारों पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की.

हालांकि, ITBP प्रमुख ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि भारत ने पिछले 12 सालों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए कुछ नहीं किया. उनका जोर इस बात पर था कि चीन की बदलती सैन्य क्षमताओं के मुकाबले पुरानी रणनीति काफी नहीं होगी. ऐसे में सरकार की तैयारियों को समझने के लिए सबसे पहले रक्षा बजट के आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है.

12 साल में कितना बढ़ा भारत का रक्षा बजट?

केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2013-14 में भारत का रक्षा बजट 2.53 लाख करोड़ रुपये था. वित्त वर्ष 2026-27 में यह बढ़कर लगभग 7.85 लाख करोड़ रुपये हो गया. यानी इन दो वित्त वर्षों की तुलना करें तो रक्षा बजट तीन गुने से अधिक हो चुका है.

वित्त वर्ष 2026-27 में रक्षा बलों के लिए पूंजीगत खर्च के तहत लगभग 2.19 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इस मद से नए हथियारों, लड़ाकू विमानों, सैन्य उपकरणों और दूसरे जरूरी संसाधनों की खरीद तथा आधुनिकीकरण से जुड़े काम किए जाते हैं.

12 साल में कितना बढ़ा भारत का रक्षा बजट?

लेकिन यहां एक बात और है. रक्षा मंत्रालय का पूरा बजट नए हथियार खरीदने या चीन सीमा की सुरक्षा पर खर्च नहीं होता. इसमें सैनिकों के वेतन, पेंशन, रखरखाव और दूसरी जरूरतों के लिए भी रकम रखी जाती है. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि वित्त वर्ष 2026-27 के आंकड़े बजट आवंटन के हैं. इन्हें अब तक खर्च हो चुकी रकम नहीं माना जा सकता.

चीन सीमा पर सड़कें, पुल और सुरंगें बनाने में कितना काम हुआ?

चीन से लगी सीमा का बड़ा हिस्सा ऊंचे पहाड़ों और दुर्गम इलाकों में है. कई जगह भारी बर्फबारी होती है. कुछ स्थानों तक पहुंचने के रास्ते बेहद कठिन हैं. ऐसी स्थिति में जवानों के पास आधुनिक हथियार होने के बावजूद उन्हें समय पर जरूरी सामान पहुंचाना आसान नहीं होता.

मान लीजिए, सीमा की किसी चौकी पर अचानक अतिरिक्त जवानों या हथियारों की जरूरत पड़ जाए. अगर वहां तक सड़क अच्छी नहीं है, तो मदद पहुंचने में अधिक समय लग सकता है. इसी चुनौती को देखते हुए सीमा सड़क संगठन (BRO) सड़कें, पुल, सुरंगें और दूसरी सुविधाएं विकसित करता है.

सरकार के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बुनियादी ढांचा परियोजनाएं पूरी की गई हैं. इनमें सैन्य आवाजाही आसान बनाने वाली सड़कें और पुल भी शामिल हैं. वित्त वर्ष 2026-27 में BRO के पूंजीगत खर्च के लिए 7,394 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. यह रकम रणनीतिक महत्व की सड़क, सुरंग, पुल और हवाई पट्टी जैसी परियोजनाओं पर इस्तेमाल की जानी है. इन निर्माण कार्यों से सेना को तो फायदा होता ही है, सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों की आवाजाही भी आसान होती है.

चीन से मुकाबले के लिए ITBP क्या नई तैयारी कर रही है?

ITBP की नई तैयारियों में सबसे ज्यादा जोर ड्रोन तकनीक पर है. महानिदेशक कपूर के मुताबिक, चीन सीमा पर तैनात हर सीमा सुरक्षा बटालियन में ड्रोन प्लाटून बनाई गई है. जवानों को ड्रोन उड़ाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. बल अपने स्तर पर ड्रोन तैयार करने की दिशा में भी काम कर रहा है.

ड्रोन की मदद से ऐसे पहाड़ी इलाकों पर नजर रखी जा सकती है, जहां पैदल गश्त करना कठिन होता है. इससे दूर की गतिविधियों की जानकारी जुटाने में भी मदद मिलती है. लेकिन ड्रोन जितने उपयोगी हैं, उतना ही बड़ा खतरा भी बन सकते हैं. दुश्मन की तरफ से भेजे गए ड्रोन निगरानी या हमले के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इसलिए ITBP एंटी-ड्रोन तकनीक पर भी ध्यान दे रही है.

कपूर ने बताया कि बल को 400 करोड़ रुपये का आधुनिकीकरण फंड मिला है. इसमें लगभग 70 प्रतिशत रकम ड्रोन क्षमता बढ़ाने के लिए निर्धारित की गई है. इसके अलावा केंद्रीय गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 करोड़ रुपये की एक बड़ी आधुनिकीकरण योजना को सैद्धांतिक मंजूरी दी है. इसमें लगभग 1,000 करोड़ रुपये ड्रोन और एंटी-ड्रोन प्रणालियों के लिए प्रस्तावित हैं.

जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इसमें भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे. उस संघर्ष में लोहे की छड़ों और कील लगे डंडों जैसे हथियारों का इस्तेमाल हुआ था. इसी तरह की नजदीकी झड़पों के लिए ITBP ने स्ट्राइक नाम का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किया है. लक्ष्य है कि 2027 के अंत तक बल के सभी जवान यह ट्रेनिंग पूरी कर लें.

इसके साथ शौर्य कमांडो नाम का विशेष दस्ता भी तैयार किया गया है. कपूर के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश में हाल की आमने-सामने की परिस्थितियों के दौरान इन कमांडो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अब इस विशेष बल की क्षमता और तैनाती बढ़ाने की योजना है.

एक और बड़ा बदलाव सीमा चौकियों पर हो रहा है. ITBP भूमिगत बंकर तैयार कर रही है. इसका उद्देश्य संघर्ष की स्थिति में जवानों को अतिरिक्त सुरक्षा देना है. साथ ही अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों में बैरकों और बिजली जैसी जरूरी सुविधाओं को बेहतर बनाया जा रहा है. यानी ITBP की तैयारी अब तीन मोर्चों पर आगे बढ़ रही है. पहला, ड्रोन और नई तकनीक. दूसरा, जवानों की विशेष ट्रेनिंग. और तीसरा, सीमा पर मजबूत सुरक्षा ढांचा. इन तैयारियों से यह भी पता चलता है कि ITBP भविष्य की चुनौतियों के लिए अपने काम करने का तरीका बदल रही है.

क्या चीन का मुकाबला करने के लिए भारत पूरी तरह तैयार है?

ITBP प्रमुख के बयान के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है. लेकिन इसका जवाब केवल एक अधिकारी के बयान या रक्षा बजट के आंकड़ों से नहीं दिया जा सकता. कपूर ने यह नहीं कहा कि भारतीय सेना हर क्षेत्र में चीन से कमजोर है. उन्होंने मुख्य रूप से चीन के सैन्य आधुनिकीकरण और पुराने युद्ध तरीकों की सीमाओं की बात की है.

किसी देश की सैन्य ताकत का आकलन करते समय कई पहलुओं को देखना होता है. इनमें हथियारों की गुणवत्ता, सैनिकों का प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, सीमावर्ती सड़कें, निगरानी प्रणाली और जरूरत पड़ने पर तेजी से कार्रवाई करने की क्षमता शामिल हैं. भारत ने पिछले कुछ सालों में इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया है. वहीं चीन भी अपनी सैन्य क्षमता और तकनीक को लगातार मजबूत कर रहा है.

ऐसे में असली सवाल यह नहीं है कि भारत ने रक्षा क्षेत्र में कितना पैसा लगाया. सवाल यह है कि उस निवेश का कितना फायदा सीमा पर तैनात जवानों तक पहुंचा. कौन-सी नई तकनीक उपलब्ध हो चुकी है और किन सुविधाओं की अभी जरूरत है. अरुणाचल प्रदेश में जारी आमने-सामने की स्थिति इन सवालों को और महत्वपूर्ण बना देती है.

ITBP महानिदेशक के बयान का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सीमा सुरक्षा की तैयारी एक बार पूरी कर लेने वाला काम नहीं है. चीन की सैन्य ताकत और युद्ध की तकनीक बदल रही है, तो भारत को भी अपनी रणनीति लगातार बदलनी होगी. क्योंकि किसी संकट की स्थिति में असली परीक्षा रक्षा बजट के आंकड़ों की नहीं, बल्कि सीमा पर तैनात जवानों की तैयारी, आधुनिक हथियारों और उपलब्ध संसाधनों की होगी.

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