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3 दिन में 15 बैठकें...पुतिन-जिनपिंग से लेकर ग्लोबल साउथ तक कितनी सफल रही PM मोदी की डिप्लोमेसी?

INT News14 September 2026 at 07:34 am

नई दिल्ली में हुए 18 वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम सिर्फ बहुपक्षीय बैठकों तक सीमित नहीं रहा. इन तीन दिनों में उन्होंने रूस, चीन, ईरान समेत कई देशों के नेताओं के साथ करीब 15 औपचारिक द्विपक्षीय मुलाकात कीं. इन बैठकों में व्यापार, ऊर्जा, रक्षा, सीमा पर शांति, क्षेत्रीय सुरक्षा और ग्लोबल साउथ जैसे मुद्दे प्रमुख रहे. आधिकारिक जानकारी और मीडिया रिपोर्टों से साफ है कि भारत ने ब्रिक्स की मेजबानी को अपने द्विपक्षीय रिश्तों को आगे बढ़ाने के मौके के तौर पर भी इस्तेमाल किया.

पुतिन के साथ व्यापार और रणनीतिक रिश्तों पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी की अहम बैठकों की शुरुआत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मुलाकात से हुई. दोनों नेताओं की 2026 में यह दूसरी आमने-सामने की बैठक थी.

इससे पहले 31 अगस्त को बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान उनकी मुलाकात हुई थी.

नई दिल्ली में हुई बातचीत में दोनों देशों के बीच व्यापार और औद्योगिक सहयोग बढ़ाने पर खास जोर रहा.

भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने के लक्ष्य पर काम जारी रखने की बात कही. रक्षा और ऊर्जा के अलावा परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, रेल और कुशल कामगारों की आवाजाही जैसे क्षेत्रों पर भी चर्चा हुई.

ईरान के साथ चाबहार से आगे पश्चिम एशिया पर नजर

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ पीएम मोदी की बैठक भी काफी अहम रही. यह पेजेश्कियान की राष्ट्रपति बनने के बाद पहली भारत यात्रा थी. दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के साथ पश्चिम एशिया की स्थिति पर बातचीत की.

मोदी ने भारत की पुरानी नीति दोहराते हुए कहा कि विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए. दोनों पक्षों ने क्षेत्र में शांति, समुद्री आवाजाही और व्यापार की सुरक्षा पर भी जोर दिया.

सात साल बाद दिल्ली पहुंचे शी जिनपिंग

ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे ज्यादा चर्चा वाली मुलाकात प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रही. जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत पहुंचे. दोनों नेताओं ने भारत-चीन रिश्तों में आए सुधार को आगे बढ़ाने पर बातचीत की.

ये भी पढ़ें: BRICS समिट में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम मोदी की मुलाकात के बाद क्या बदलेंगे भारत-चीन संबंध?

बैठक में सीमा पर शांति और स्थिरता को रिश्तों की आगे की प्रगति के लिए जरूरी बताया गया. इसके साथ व्यापार, बाजार तक पहुंच, सप्लाई चेन और लोगों के बीच आवाजाही बढ़ाने जैसे मुद्दे भी उठे.

यानी दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार की कोशिश जरूर दिखी, लेकिन सीमा और व्यापार असंतुलन जैसी चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं.

ग्लोबल साउथ पर भारत का फोकस

ब्रिक्स के दौरान मोदी ने इथियोपिया, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम, कजाकिस्तान और कई अफ्रीकी देशों के नेताओं से भी बातचीत की.

मिस्र और दक्षिण अफ्रीका के साथ बातचीत में द्विपक्षीय सहयोग के साथ विकासशील देशों की प्राथमिकताओं पर भी जोर रहा.

यही भारत की ब्रिक्स रणनीति का बड़ा हिस्सा है. नई दिल्ली ब्रिक्स को किसी एक देश या पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में पेश करने के बजाय ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने वाले मंच के तौर पर आगे बढ़ाना चाहती है.

सम्मेलन में वैश्विक संस्थानों में सुधार, बेहतर प्रतिनिधित्व, व्यापार और सप्लाई चेन से जुड़े मुद्दे भी प्रमुख रहे.

तीन दिनों की बैठकों से दुनिया को क्या संदेश?

प्रधानमंत्री मोदी की 15 द्विपक्षीय बैठकों से एक बात साफ है कि भारत ने ब्रिक्स की मेजबानी को सिर्फ सम्मेलन तक सीमित नहीं रखा. रूस के साथ रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते, चीन के साथ सावधानी भरा सुधार, ईरान के साथ क्षेत्रीय संपर्क और पश्चिम एशिया की स्थिति, जबकि अफ्रीका और दूसरे विकासशील देशों के साथ ग्लोबल साउथ, इन सभी मोर्चों पर भारत ने एक साथ संवाद आगे बढ़ाया.

यानी ब्रिक्स 2026 भारत के लिए सिर्फ एक बहुपक्षीय सम्मेलन नहीं, बल्कि कई मोर्चों पर एक साथ कूटनीतिक बातचीत का बड़ा मंच भी बनकर सामने आया.

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