Friday, 7 August 2026
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भोपाल का स्वतंत्रता संग्राम और कल के आईने में आज:रानी लक्ष्मीबाई और भोपाल की बेगम, 1857 में भड़की थी विद्रोह की चिंगारी

INT News7 August 2026 at 08:30 am

यह कहानी है 1857 की। पूरे हिंदुस्तान में आजादी की पहली चिंगारी भड़क चुकी थी। भोपाल रियासत की सैन्य छावनी सीहोर में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की आग सुलग रही थी। 6 अगस्त 1857 को रिसालदार वली शाह और कोठ हवलदार महावीर कोठ के नेतृत्व में सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। अंग्रेजों का यूनियन जैक उतार फेंका गया और उसकी जगह एक ही डंडे पर दो झंडे फहराए गए- हरा ‘निशाने-मोहम्मदी’ और भगवा ‘महावीरी झंडा’। नई क्रांतिकारी सरकार का नाम ‘सिपाही बहादुर सरकार’ रखा गया। सरकार चलाने के लिए ‘महावीर काउंसिल’ बनाई गई। वली शाह सैन्य परिषद के प्रमुख बने, जबकि महावीर को नागरिक प्रशासन और अदालत की जिम्मेदारी सौंपी गई। 12 अगस्त को क्रांतिकारियों ने रिचपाल सिंह के बंगले पर हमला किया। 8 से 13 अगस्त के बीच अंग्रेजों की बैरकों और बंगलों को आग के हवाले कर दिया गया। 19 अगस्त तक कचहरी, सरकारी खजाना और जेल सहित लगभग पूरा सरकारी तंत्र उनके नियंत्रण में आ गया। फिर 22 अगस्त 1857 को क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के पॉलिटिकल एजेंट के आवास पर हमला किया, जेल के दरवाजे तोड़कर कैदियों को आजाद कराया और सरकारी खजाने पर कब्जा कर लिया। इसी दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने नवाब सिकंदर बेगम को दो बार खत लिखकर अंग्रेजों का साथ छोड़कर क्रांतिकारियों का समर्थन करने की अपील की, लेकिन बेगम ने जवाब दिया कि वह अंग्रेजों का साथ देंगी। रानी ने तीसरा संदेश भेजा। उन्होंने लिखा- ‘मैं अपनी मौजूदा मुहिम से निपटकर भोपाल आऊंगी और अपनी तलवार की नोक पर आपको अंग्रेजों की मदद करने से रोकने के लिए मजबूर कर दूंगी।’ सिकंदर बेगम ने भी उतनी ही स्पष्टता से जवाब दिया। लिखा- ‘रियासत भोपाल को फख्र है कि वह हमेशा से बरतानवी हुकूमत की वफादार रही है। अगर आप मोर्चा जमाना चाहती हैं तो आइए, मेरा आतिशी तोपखाना आपका मुकाबला करने के लिए हर वक्त तैयार है।’ 14 जनवरी 1858: भोपाल के इतिहास का सबसे बड़ा रक्तपात मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी 1858 को अंग्रेज जनरल ह्यू रोज अपनी सेना के साथ सीहोर के सेकंडरी बाग पहुंचा। क्रांतिकारियों को घेर लिया गया। कुछ देर में गोलियों की बौछार शुरू हुई और 356 क्रांतिकारी शहीद हो गए। भोपाल के इतिहास में यह सबसे रक्तरंजित सामूहिक हत्याकांड माना जाता है। क्रांति के प्रमुख नेता वली शाह और महावीर कोठ गिरफ्तार कर लिए गए। 2 फरवरी 1858 को दोनों को फांसी दी गई। (स्रोत : शाहनवाज खान लिखित पुस्तक ‘सिपाही बहादुर’। इसे मप्र सरकार के स्वराज संस्थान संचालनालय ने प्रकाशित किया है।)