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Xi-Putin एक मंच पर, भारत के सामने BRICS की बड़ी परीक्षा

12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत ऐसे समय हो रही है, जब यह समूह अपने विस्तार, आंतरिक मतभेदों और बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच अपनी उपयोगिता साबित करने की कोशिश कर रहा है. भारत के लिए यह केवल एक बहुपक्षीय सम्मेलन की मेजबानी नहीं, बल्कि अपनी बढ़ती वैश्विक भूमिका को ठोस परिणामों में बदलने की परीक्षा भी है.
सम्मेलन का कूटनीतिक महत्व
इस सम्मेलन का कूटनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि शी जिनपिंग सात वर्षों में पहली बार भारत की यात्रा कर रहे हैं, जबकि व्लादिमीर पुतिन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करेंगे. यह दृश्य अपने आप में भारत की उस विदेश नीति को रेखांकित करता है, जिसमें अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संवाद बनाए रखते हुए रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी जाती है.
लेकिन BRICS को एकजुट समूह मानना आसान होगा, वास्तविकता को समझना कठिन. इसमें लोकतंत्र हैं, राजतंत्र हैं, दल-राज्य हैं और युद्धरत देश भी. पश्चिम एशिया का मौजूदा संघर्ष इस विविधता की सीमा को और स्पष्ट करता है. ऐसे में संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाना कठिन हो सकता है, जबकि व्यापार, विकास वित्त, तकनीक और भुगतान जैसे क्षेत्रों में सीमित या इच्छुक देशों के बीच सहयोग आगे बढ़ाया जा सकता है. भारत की अध्यक्षता के लिए यही व्यावहारिक रास्ता सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है.
आर्थिक मोर्चे पर भी तस्वीर दोहरी है
BRICS के साथ भारत का व्यापार महामारी के बाद तेजी से बढ़ा है, लेकिन इसी अवधि में व्यापार घाटा भी काफी बढ़ा है. इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू चीन से जुड़ी विनिर्माण निर्भरता है, जहां कलपुर्जों और मध्यवर्ती उत्पादों का विकल्प तैयार करना आसान नहीं है. इसलिए BRICS भारत के लिए अवसर भी है और निर्भरता का आईना भी.
यही कारण है कि BRICS की चर्चा केवल अमेरिका बनाम चीन या डॉलर बनाम दूसरी मुद्रा के सवाल तक सीमित करना सही नहीं होगा. साझा BRICS मुद्रा की चर्चा के बीच भारत और ब्राजील ऐसी व्यवस्था के प्रति सावधानी बरतते रहे हैं. डिजिटल भुगतान और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने का विचार अलग है; वह साझा मुद्रा नहीं, भुगतान अवसंरचना का सवाल है.
भारत के पास अपनी कुछ विशिष्ट ताकतें
डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, तत्काल भुगतान और सहमति-आधारित डेटा विनिमय के अनुभव के साथ भारत विकासशील देशों के लिए एक व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है. दूसरी ताकत उसकी कूटनीतिक स्थिति है-भारत QUAD का हिस्सा है, BRICS में भी है, रूस से ऊर्जा संबंध रखता है और पश्चिमी देशों के साथ भी रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है. यह स्थिति पश्चिम-विरोध नहीं, बल्कि बहु-संरेखण और रणनीतिक स्वायत्तता की अभिव्यक्ति है.
जलवायु-वित्त इस रणनीति का सबसे ठोस क्षेत्र बन सकता है
न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से स्थानीय मुद्रा में विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना वैश्विक दक्षिण की उस समस्या को संबोधित कर सकता है, जहां पूंजी की लागत ही विकास की गति तय करती है.
अंततः भारत की BRICS अध्यक्षता का मूल्य किसी प्रभावशाली घोषणापत्र से नहीं, बल्कि उसके बाद बची संस्थागत व्यवस्थाओं से तय होगा. क्या सहयोग अगले अध्यक्ष के कार्यकाल में भी जारी रहेगा? क्या विकास वित्त, भुगतान, तकनीक और प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में वास्तविक लाभ दिखाई देंगे?
भारत के सामने अवसर स्पष्ट है- BRICS को केवल एक बड़ा मंच नहीं, बल्कि उपयोगी संस्थागत साझेदारी में बदलना. इसकी सफलता का पैमाना यही होगा कि नई दिल्ली में कही गई बातें आने वाले वर्षों में कितनी विश्वसनीयता के साथ जमीन पर उतरती हैं.
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