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Tribalpedia: दीवानी अधिकार से जंगलों तक, इलाहाबाद की संधि ने कैसे बदली आदिवासी दुनिया?

INT News9 August 2026 at 06:00 am

जोहार. आज 9 अगस्त है. विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं.

12 अगस्त 1765 की इलाहाबाद की संधि भारतीय इतिहास में केवल मुगल बादशाह और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ एक समझौता नहीं थी.

इसे उस मोड़ के रूप में देखा जा सकता है, जब कंपनी एक व्यापारिक संस्था से आगे बढ़कर राजस्व और प्रशासनिक शक्ति हासिल करने लगी.

इसका सबसे गहरा असर पूर्वी भारत- बंगाल, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा के बड़े हिस्सों, पर पड़ा और धीरे-धीरे इसका प्रभाव उन आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंचा, जो लंबे समय तक अपेक्षाकृत स्वायत्त रहे थे.

शाह आलम द्वितीय से कंपनी तक पहुंची राजस्व की ताकत

1765 में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय और रॉबर्ट क्लाइव के बीच हुई इलाहाबाद की संधि के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा की दीवानी, यानी राजस्व वसूली का अधिकार मिला.

यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण था.

अब कंपनी के पास व्यापार से होने वाली आमदनी के अलावा एक विशाल भूभाग से नियमित राजस्व जुटाने का अधिकार था. यही राजस्व आगे कंपनी की सेना, प्रशासन और नए क्षेत्रों में विस्तार का आर्थिक आधार बना.

यानी कंपनी ने पहले व्यापार से धन कमाया और फिर उसी धन से सत्ता का विस्तार किया.

झारखंड का बड़ा हिस्सा उस समय अलग प्रशासनिक राज्य के रूप में मौजूद नहीं था. इसलिए आज के झारखंड के कई क्षेत्र बंगाल और बिहार की तत्कालीन प्रशासनिक संरचनाओं के भीतर आते थे. इसका अर्थ यह हुआ कि कंपनी की राजस्व और प्रशासनिक व्यवस्था धीरे-धीरे आदिवासी इलाकों तक पहुंचने लगी.

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बंगाल से शुरू हुआ कंपनी राज, फिर बढ़ता गया दायरा

पूर्वी भारत कंपनी के लिए केवल राजस्व का स्रोत नहीं था. यह आगे के औपनिवेशिक विस्तार का आधार भी बना.

Regulating Act, 1773 के बाद बंगाल प्रेसिडेंसी की राजनीतिक-प्रशासनिक स्थिति और मजबूत हुई. बंगाल अब कंपनी की शक्ति का प्रमुख केंद्र बन चुका था.

इसके बाद सैन्य शक्ति और कूटनीति के जरिए कंपनी ने भारत के दूसरे हिस्सों में भी अपना प्रभाव बढ़ाया.

चौथा एंग्लो-मैसूर युद्ध (1799) और दूसरा एंग्लो-मराठा युद्ध (1803-05) इसी विस्तारवादी दौर की महत्वपूर्ण घटनाएं थीं. लॉर्ड वेलेजली की नीति ने कंपनी की सर्वोच्चता स्थापित करने की प्रक्रिया को और तेज किया.

इस विस्तार का असर केवल राजाओं और बड़ी रियासतों तक सीमित नहीं था.

आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंची नई राजस्व व्यवस्था

पूर्वी भारत के जंगल और पहाड़ी इलाके कंपनी के लिए एक अलग तरह की चुनौती थे.

यहां आदिवासी समुदायों की सामाजिक व्यवस्था, भूमि उपयोग और संसाधनों पर अधिकार स्थानीय परंपराओं से संचालित होते थे. लेकिन कंपनी के लिए भूमि मुख्य रूप से राजस्व का स्रोत थी.

यहीं से टकराव की जमीन तैयार हुई.

Jungle Mahal इसका एक उदाहरण था. 1805 में इससे जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्था के जरिए कंपनी ने जंगल और सीमावर्ती क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की कोशिश की.

बाद में संथाल क्षेत्र में Damin-e-Koh की प्रक्रिया सामने आई. यहां 1824 में सर्वे शुरू हुआ और 1832 में क्षेत्र की औपचारिक घोषणा की गई. इस प्रक्रिया में भूमि, आबादी और राजस्व प्रशासन को अधिक व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने की कोशिश हुई.

लेकिन आदिवासी समाज के लिए जंगल और जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थे.

वे जीवन, संस्कृति और सामुदायिक पहचान का आधार थे.

जमीन से राजस्व तक और राजस्व से नियंत्रण तक

कंपनी की व्यवस्था का मूल तर्क था- भूमि को मापो, अधिकार तय करो और राजस्व वसूलो.

लेकिन आदिवासी इलाकों में जमीन का संबंध अक्सर सामुदायिक परंपराओं और स्थानीय अधिकारों से था. इसलिए जब बाहरी प्रशासन ने जमीन को कागज, सर्वे और राजस्व की इकाई में बदलना शुरू किया, तो पुराने सामाजिक संतुलन पर असर पड़ा.

यही वह लंबी प्रक्रिया थी जिसने आगे चलकर आदिवासी असंतोष की कई परिस्थितियां पैदा कीं.

बाद के प्रशासनिक दौर में विलियम बेंटिक जैसे गवर्नर-जनरल और अधिकारियों तथा सर्वेक्षण-प्रशासन से जुड़े लोगों ने इस व्यापक औपनिवेशिक व्यवस्था को आगे बढ़ाया. J.B. Bard और Tanner जैसे नाम भी इस प्रशासनिक-सर्वेक्षण संदर्भ में सामने आते हैं.

इलाहाबाद की संधि का असली महत्व

इलाहाबाद की संधि को इसलिए केवल 1765 की एक राजनीतिक घटना मानना अधूरा होगा.

इसने कंपनी को राजस्व दिया, राजस्व ने सेना को ताकत दी, सेना ने नए क्षेत्रों पर नियंत्रण बढ़ाया और प्रशासन ने उस नियंत्रण को स्थायी बनाने की कोशिश की.

पूर्वी भारत में शुरू हुई यह प्रक्रिया धीरे-धीरे जंगलों और आदिवासी इलाकों तक पहुंची.

इसलिए ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की कहानी केवल दिल्ली, कलकत्ता या बड़े राजाओं की कहानी नहीं है. यह उन जंगलों और गांवों की भी कहानी है, जहां पहली बार किसी बाहरी सत्ता ने जमीन को समुदाय की विरासत के बजाय राजस्व की इकाई के रूप में देखना शुरू किया.

और यहीं से औपनिवेशिक सत्ता बनाम आदिवासी स्वायत्तता के बीच लंबे संघर्ष की नींव पड़ी.

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