समाचार · मध्य प्रदेश
एमपी की खदानों में तीन साल में 31 मौतें:कोल माइंस और दूसरी खदानों में 26 हादसे, 50 श्रमिक घायल
मध्य प्रदेश में खनन उद्योग जहां एक ओर राज्य के राजस्व का मुख्य जरिया है, वहीं दूसरी ओर खदानों में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई है। संसद में खान मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत पिछले तीन साल (2023 से 2025) के आंकड़ों के अनुसार, एमपी की कोयला और दूसरी खदानों में सुरक्षा नियमों की अनदेखी सामने आई है। इन तीन साल में मध्य प्रदेश में कुल 26 जानलेवा हादसे दर्ज किए गए। इनमें 31 श्रमिकों की मौत हुई, जबकि 50 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। खासतौर पर कोयला और पत्थर-खनिज वाले क्षेत्रों में असुरक्षित खनन के कारण मौतों और गंभीर रूप से घायल श्रमिकों की संख्या लगातार चिंता बढ़ा रही है। देश में सबसे ज्यादा हादसे वाले राज्यों में शामिल राष्ट्रीय स्तर पर तुलना करें तो झारखंड, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा एक्सीडेंट और खदान हादसे हो रहे हैं। गैर-कोयला और कोयला खदानों के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो गंभीर रूप से घायल श्रमिकों और जानलेवा हादसों के मामले में मध्य प्रदेश देश के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में शामिल है। खदानों में रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम, गैस डिटेक्शन और ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीकों के प्रभावी इस्तेमाल की कमी के कारण इन राज्यों में हादसों पर लगाम नहीं लग पा रही है। हादसों के पीछे प्रबंधन की खामियां खान मंत्रालय की जांच रिपोर्ट के अनुसार, इन खदानों में होने वाले हादसों के पीछे कई तकनीकी और प्रबंधन से जुड़ी कमियां जिम्मेदार पाई गई हैं। खदानों में अचानक छत गिरना, ऊंचाई से श्रमिकों या मलबे का नीचे गिरना, ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग के दौरान पत्थरों के टुकड़े उड़ना, रस्सियों और जंजीरों का टूटना तथा डंपर और भारी मशीनें चलाने में लापरवाही हादसों की मुख्य वजह हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जिन खदानों में सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाया गया है, वहां के संचालकों के खिलाफ व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियां (OSH WC) संहिता, 2020 के तहत सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है।