समाचार · मध्य प्रदेश
क्या नरोत्तम मिश्रा का टिकट मोहन यादव ने कटवाया:फॉर्म खरीद लिया, प्रचार में जुटे थे, फिर अचानक क्या हुआ; अब आगे क्या करेंगे
एमपी के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने दतिया उपचुनाव का नामांकन फॉर्म खरीद लिया था। ताबड़तोड़ प्रचार में भी जुट गए थे। लेकिन 10 जुलाई को बीजेपी ने उनका टिकट ही काट दिया। आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया है। नरोत्तम के समर्थक उत्पात मचा रहे हैं। दतिया में धारा 163 लागू है। आखिर क्यों कटा नरोत्तम मिश्रा का टिकट और कौन हैं नए उम्मीदवार आशुतोष तिवारी; एमपी एक्सप्लेनर में पूरी कहानी…। सवाल-1: दतिया में नरोत्तम इतने कॉन्फिडेंट क्यों थे?
जवाबः सवाल-2: तो आखिर ऐन वक्त पर उनका टिकट क्यों कट गया?
जवाबः इसकी 3 वजहें सामने आ रही हैं… 1. गिरता वोट मार्जिन
राजनीतिक विश्लेषक रवि ठाकुर के मुताबिक, ‘विधायक रहते हुए उनके पुराने आचरण को लेकर आम आदमी और अधिकारियों में अब भी नाराजगी है। पिछले 2 साल में सिर्फ 10-20% डैमेज कंट्रोल हो पाया है।' पिछले तीन विधानसभा चुनाव के आंकड़े भी यही दिखाते हैं… 2. हार का ठीकरा CM पर फूटता
रवि ठाकुर कहते हैं- उपचुनाव हमेशा सत्ताधारी दल और मौजूदा सीएम के चेहरे का चुनाव माना जाता है। अगर नरोत्तम मिश्रा को टिकट मिलता और वे हार जाते, तो इसका सीधा ठीकरा सीएम मोहन यादव पर फूटता। नरोत्तम मूल रूप से डबरा के हैं, इसलिए बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा भी उठ रहा था। 3. भाजपा जनरेशनल शिफ्ट के दौर में
राजनीतिक विश्लेषक दिनेश गुप्ता बताते हैं कि भाजपा इस वक्त जनरेशनल शिफ्ट यानी नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने पर काम कर रहा है। इसी वजह से किसी हैवीवेट और विवादित चेहरे की जगह आशुतोष तिवारी जैसे युवा चेहरे को आगे किया गया। संगठन में इसे इंटरनल बैलेंस कहा जाता है। यानी किसी भी नेता को इतना बड़ा न होने देना कि वह सरकार के सामने अलग 'पावर सेंटर' बन जाए। इससे गुटबाजी भी बढ़ती है। सीएम मोहन यादव को पार्टी ने जो फ्री-हैंड दिया है। इसका मकसद गुटबाजी रोकना है। सवाल-3: क्या नरोत्तम को किनारे लगाने में किसी ‘अपने’ का हाथ है?
जवाबः ऐसा पूरी तरह से नहीं कहा जा सकता, लेकिन 3 संकेत इस संभावना को जोर दे रहे हैं… 1. राम नरेश-भरत यादव कनेक्शन
चर्चा है कि नरोत्तम का टिकट कटने के पीछे दतिया जिला पंचायत सदस्य राम नरेश यादव और उनके भाई IAS भरत यादव की अहम भूमिका है। भरत सीएम मोहन यादव की कोर टीम का हिस्सा हैं। राजनीतिक गलियारों में यह अटकल भी है कि दतिया में 'नरोत्तम-मुक्त' चुनाव को लेकर पर्दे के पीछे कोई तैयारी पहले से चल रही थी, ताकि सरकार के कामकाज में पॉवर सेंटर्स का दखल कम हो। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है। भरत यादव या राम नरेश यादव की तरफ से भी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है। 2. पावर सेंटर का डर
नरोत्तम मिश्रा शिवराज सरकार के पावरफुल चेहरों में गिने जाते थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नरोत्तम प्रेशर पॉलिटिक्स में माहिर हैं। सरकार में पहले ही कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और नरेंद्र सिंह तोमर जैसे तीन-चार दिग्गज मौजूद हैं। ऐसे में डर था कि नरोत्तम जीतकर आते, तो वे सरकार के सामने एक अलग 'पावर सेंटर' बन जाते। 3. बड़े नेताओं की राय बनाम ग्राउंड सर्वे
भाजपा सूत्रों के मुताबिक जब प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल से राय ली तो उन्होंने नरोत्तम का नाम आगे बढ़ाया। हालांकि, पार्टी के इंटरनल सर्वे में उनका निगेटिव फीडबैक आया। दरअसल, पिछले 15-20 सालों में नरोत्तम के दबदबे ने अन्य नेताओं का कद छोटा कर दिया था। नरोत्तम की पिछली चुनाव हार ने उन नेताओं को उभरने का मौका दिया। उनके दोबारा विधायक बनने से वे फिर साइड लाइन हो सकते थे। ऐसे में कुछ स्थानीय नेताओं ने छिपे तौर पर नरोत्तम के टिकट का विरोध किया था। सवाल-4: नए उम्मीदवार आशुतोष तिवारी कौन हैं, उन्हें किस आधार पर टिकट मिला?
जवाबः आशुतोष तिवारी मूल रूप से दतिया जिले के भांडेर क्षेत्र के रहने वाले हैं। यह उनका पहला चुनाव है। आशुतोष को टिकट मिलने का चुनावी गणित
1. दतिया में ब्राह्मण वोटरों का बड़ा प्रभाव है। नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से इस वोट बैंक में नाराजगी का रिस्क था। इसे बैलेंस करने के लिए आशुतोष तिवारी को टिकट दिया गया। 2. आशुतोष साफ-सुथरी छवि के नेता हैं और स्थानीय स्तर पर उनका विरोध नहीं है। 3. मध्य प्रदेश भाजपा में सत्ता परिवर्तन के बाद से व्यक्ति-केंद्रित राजनीति की जगह 'संगठन के चेहरों' को टिकट दिया जा रहा है। 4. संगठन मंत्री रहने के कारण तिवारी की पकड़ RSS और भाजपा के कोर ग्रुप में मजबूत मानी जाती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि, पार्टी नेतृत्व फिलहाल ऐसे चेहरों को तरजीह दे रहा है जिनसे सरकार के सामने कोई अलग 'पावर सेंटर' खड़ा होने का जोखिम न हो। आशुतोष इस खांचे में फिट बैठते हैं। सवाल-5: नरोत्तम मिश्रा के पास आगे क्या विकल्प हैं?
जवाबः रवि ठाकुर बताते हैं कि पिछले 35 सालों में नरोत्तम मिश्रा चाहे जीते हों या हारे हों, उन्होंने कभी पार्टी नहीं बदली। इसी वजह से आगे के ज्यादातर विकल्प पार्टी के भीतर रहकर ही दिखते हैं। ऐसे में 5 विकल्प नजर आते हैं… 1. टिकट पलटवाने की कोशिश
पहली कोशिश यही होगी कि आशुतोष तिवारी का टिकट कैंसिल हो जाए और उन्हें ही टिकट मिल जाए। इसके लिए वे दिल्ली भी गए थे। रवि ठाकुर कहते हैं, अगर टिकट वापस नहीं मिलता तो नरोत्तम खुद बगावत नहीं करेंगे, लेकिन उनके करीबी कार्यकर्ता जरूर विद्रोह कर सकते हैं। हालांकि, टिकट कटने के बाद नरोत्तम मिश्रा ने से कहा, ‘पार्टी के किसी बड़े नेता का मुझे फोन नहीं आया। पार्टी ने जो निर्णय लिया है, उसका मैं सम्मान करता हूं। नाराज कार्यकर्ताओं को मना लिया जाएगा, सभी मिलकर काम करेंगे।’ 2. दबाव की रणनीति
नरोत्तम ने अपनी पहचान 'जमीनी नेता' की बनाई है। दतिया में उनके समर्थकों का प्रदर्शन इसी का संकेत है- वे अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए अपने कैडर का इस्तेमाल करेंगे, ताकि पार्टी को यह संदेश मिले कि दतिया की राजनीति उनके बिना आसान नहीं होगी। 3. निर्दलीय चुनाव
ठाकुर के मुताबिक, अगर कार्यकर्ताओं का दबाव बहुत बढ़ा, तो नरोत्तम निर्दलीय चुनाव भी लड़ सकते हैं। वे पिछले 2 महीने से तैयारी कर रहे हैं। पार्टी के अलावा भी उनका निजी तौर पर बूथ-स्तर तक संगठन तैयार है। 4. संगठन में बड़ी भूमिका का इंतजार
भाजपा में नरोत्तम की पहचान एक 'संगठन के आदमी' की रही है। केंद्रीय नेतृत्व से उनके पुराने संबंध हैं। संभावना है कि उन्हें संगठन में किसी बड़ी राष्ट्रीय जिम्मेदारी या किसी अन्य राज्य में चुनाव प्रबंधन की भूमिका दी जाए। यह उन्हें 'मेनस्ट्रीम' में बनाए रखने का एक तरीका हो सकता है। 5. मार्गदर्शक की भूमिका में रहना
मध्य प्रदेश की नई सियासत जनरेशनल शिफ्ट की तरफ बढ़ रही है। एक विकल्प यह भी है कि वे सक्रियता कम करके पार्टी के वरिष्ठ मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं। हालांकि, उनके जैसा आक्रामक और हमेशा सक्रिय नेता इतनी जल्दी 'रिटायरमेंट' मोड में जाएगा, इसकी संभावना कम है। ------------------------------------------ ये खबर भी पढ़ें एमपी एक्सप्लेनर: ₹7669 करोड़ का दावा छोड़ा, ₹232 करोड़ जेब से देंगे सरदार सरोवर डैम की वजह से मध्य प्रदेश की करीब 21 हजार हेक्टेयर जमीन पानी में समा गई। 192 गांव उजड़ गए। राज्य सरकार ने गुजरात से 7,669 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा। 30 साल से अटके मामले पर 7 जुलाई को दिल्ली में समाधान हुआ है। मध्य प्रदेश को मुआवजा मिलना तो दूर, उल्टा 231.80 करोड़ रुपए चुकाने पड़ रहे हैं…पूरी खबर पढ़ें