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एमपी में बैट्री और पम्प्ड एनर्जी से स्टोर होगी बिजली:एनर्जी स्टोरेज में सालाना स्टोर ऊर्जा का 85% हिस्सा नवकरणीय स्रोतों से लेना होगा
मध्य प्रदेश में आने वाले वर्षों में बिजली व्यवस्था में बैटरी स्टोरेज और अन्य ऊर्जा भंडारण तकनीकों की भूमिका बढ़ने वाली है। मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने नवीकरणीय ऊर्जा के साथ बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पम्प्ड स्टोरेज प्लांट (PSP) जैसी तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए नियमों में संशोधन किया है। इसका उद्देश्य सौर और पवन ऊर्जा को स्टोर कर जरूरत के समय इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ाना है। आयोग ने मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (ऊर्जा के नवीकरणीय (अक्षय) स्रोतों से विद्युत का सह-उत्पादन तथा उत्पादन, पुनरीक्षण-द्वितीय) विनियम, 2021 में संशोधन किया है। नए प्रावधान के अनुसार एनर्जी स्टोरेज सिस्टम में सालाना स्टोर की गई कुल ऊर्जा का कम से कम 85% हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त होना जरूरी होगा। इस व्यवस्था से बिजली क्षेत्र में ऊर्जा भंडारण की क्षमता धीरे-धीरे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। पीक डिमांड में काम आएगी स्टोरेज बिजली नए प्रावधान का प्रमुख उद्देश्य सोलर और विंड एनर्जी से बनने वाली बिजली को जरूरत के समय उपलब्ध कराना है। दिन के समय बनने वाली अतिरिक्त सौर ऊर्जा को बैटरी या अन्य स्टोरेज सिस्टम में जमा किया जा सकेगा और मांग बढ़ने पर इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे पीक डिमांड के दौरान बिजली आपूर्ति को संतुलित करने और ग्रिड की विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। RPO की पूर्ति में भी मिलेगी मान्यता नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से स्टोरेज की गई बिजली को निर्धारित सीमा तक रिन्यूएबल परचेज ऑब्लिगेशन (RPO) की पूर्ति के हिस्से के रूप में मान्यता दी जाएगी। इससे बिजली वितरण और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं के लिए नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने के साथ ऊर्जा भंडारण अपनाने का रास्ता आसान होगा। BESS और पम्प्ड स्टोरेज को बढ़ावा आयोग के संशोधन से प्रदेश में बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के साथ पम्प्ड स्टोरेज प्लांट जैसी तकनीकों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। तकनीक की लागत और व्यावसायिक उपयोग में बदलाव के आधार पर ऊर्जा भंडारण की अनिवार्यता की समय-समय पर समीक्षा भी की जाएगी। इस व्यवस्था से मध्य प्रदेश में नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाने के साथ बिजली को स्टोर कर जरूरत के समय इस्तेमाल करने की क्षमता मजबूत होगी। खासकर सोलर और विंड एनर्जी को ग्रिड में बेहतर तरीके से शामिल करने में यह व्यवस्था अहम भूमिका निभा सकती है।