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‘आमार ग्राम आमार कल्पना’ से मालदा के 29 सीमावर्ती गांवों का होगा कायाकल्प

Amar Gram Amar Kalpana: पश्चिम बंगाल के मालदा जिला प्रशासन ने भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांवों के सर्वांगीण और समुदाय-आधारित विकास को गति देने के लिए एक अनूठी पहल की शुरुआत की है. ‘आमार ग्राम आमार कल्पना’ (मेरा गांव मेरी कल्पना) नामक इस सहभागी योजना (Participatory Planning Initiative) का मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और स्थानीय स्तर पर आजीविका के नये अवसर पैदा करना है. यह पहल केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ (Vibrant Villages Programme - VVP) के तहत शुरू की गयी है.
ग्रामीणों की सीधी भागीदारी से बनेगी विकास की रूपरेखा
इस पहल का उद्देश्य विकास की प्राथमिकताओं और आवश्यकताओं की पहचान की प्रक्रिया में ग्रामीणों की सीधी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है. इसी क्रम में मालदा के मुचिया ग्राम पंचायत अंतर्गत आदमपुर गांव में एक विशेष संवाद सत्र आयोजित किया गया. बैठक में ग्रामीणों ने मालदा के जिला मजिस्ट्रेट (DM) राजनवीर सिंह कपूर और स्थानीय विधायक गोपाल चंद्र साहा को अपनी जमीनी समस्याओं, प्राथमिक आवश्यकताओं के बारे में बताया. साथ ही विकास से जुड़े सुझाव भी दिये.
29 गांवों में विशेष अभियान
जिला प्रशासन द्वारा यह विशेष अभ्यास 12 जुलाई से 14 जुलाई तक अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे कुल 29 गांवों में चलाया गया. इसके माध्यम से एकत्र सुझावों को सीधे ‘ग्राम कार्ययोजना’ (Village Action Plan) में शामिल किया जायेगा.
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जरूरतों के हिसाब से बनेंगी विकास परियोजनाएं : विधायक
विधायक गोपाल चंद्र साहा ने कहा कि ग्रामीणों के साथ सीधा संवाद सुनिश्चित करेगा कि सरकार की विकास परियोजनाएं पूरी तरह स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हों. वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम ग्रामीण आकांक्षाओं को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ मजबूती से जोड़ता है.
सामूहिक भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण : डीएम
मालदा के जिला मजिस्ट्रेट राजनवीर सिंह कपूर ने कहा कि स्थानीय स्तर पर प्रभावी योजना निर्माण और जमीनी स्तर पर बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए आम नागरिकों की सामुदायिक भागीदारी (Community Participation) सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है.
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‘अंतिम चौकी’ नहीं, ‘भारत के प्रथम गांव’
मालदा जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया कि ‘आमार ग्राम आमार कल्पना’ पहल के जरिये सीमावर्ती बस्तियों के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव लाया जा रहा है. अब इन गांवों को देश के सुदूर या ‘अंतिम छोर’ के रूप में देखने की बजाय ‘भारत के प्रथम गांव’ के रूप में मान्यता दी जा रही है, ताकि इन्हें सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस और जीवंत बस्तियों में तब्दील किया जा सके.