Saturday, 8 August 2026
INTइंडियन न्यूज़ ट्रस्टजहाँ सत्य मिले विश्वास से
ताज़ा खबरें

समाचार · पंजाब

राज्यसभा में उठा कॉरपोरेट बनाम किसान कर्ज का मुद्दा:5 वर्षों में कॉरपोरेट का ₹3.20 लाख करोड़ का ऋण 'राइट-ऑफ', किसानों से तीन गुना

INT News8 August 2026 at 06:49 am

देश की ऋण नीति और बैंकिंग व्यवस्था को लेकर राज्यसभा में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। राज्यसभा सदस्य संत बलबीर सिंह सीचेवाल द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में जो आंकड़े सामने आए हैं, उसने कॉरपोरेट और कृषि क्षेत्र के ऋणों के बीच के बड़े अंतर को उजागर कर दिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वित्तीय वर्षों में बैंकों द्वारा बड़े उद्योगों का किया गया ऋण 'राइट-ऑफ' (बट्टे खाते में डालना) किसानों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है। राज्यसभा में संत सीचेवाल के सवाल का लिखित जवाब देते हुए वित्त राज्य मंत्री श्री पंकज चौधरी ने पिछले पांच वर्षों का ब्योरा पेश किया। इन आंकड़ों से साफ है कि कॉरपोरेट जगत को मिलने वाली यह बैंकिंग राहत कृषि क्षेत्र के मुकाबले करीब तीन गुना ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक: सरकार की सफाई: 'राइट-ऑफ' का मतलब ऋण माफी नहीं बहस के बीच सरकार ने अपने जवाब में स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। वित्त राज्य मंत्री ने कहा कि तकनीकी और कानूनी रूप से 'ऋण का राइट-ऑफ' करना 'ऋण माफी' (Loan Waiver) नहीं होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल बैंकों की एक सामान्य बैलेंस शीट या लेखा-प्रक्रिया (Accounting Process) का हिस्सा है।इससे कर्जदार की देनदारी खत्म नहीं होती है। बैंक डिफॉल्टरों और बकायेदारों से ऋण की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रिया पहले की तरह ही जारी रखते हैं। "जनता को गुमराह किया जा रहा है" — संत सीचेवाल ने उठाए दोहरे मापदंड पर सवाल सांसद संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने सरकार के इस तकनीकी स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए बैंकिंग नीतियों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि 'राइट-ऑफ' और 'ऋण माफी' के बीच केवल शब्दों का अंतर बताकर आम लोगों को गुमराह किया जा रहा है। राज्यसभा सदस्य संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने कहा कि जब बड़े कॉरपोरेट हजारों करोड़ रुपये का कर्ज नहीं चुका पाते, तो उसे बैंकिंग नीतियों के नाम पर राइट-ऑफ कर दिया जाता है। लेकिन जब देश का अन्नदाता मौसम की मार, फसल की बर्बादी और कम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के कारण कर्ज के दलदल में फंसता है, तो उसे ऋण माफी के लिए बरसों इंतजार करना पड़ता है।" — आर्थिक नीतियों में समानता की मांग संत सीचेवाल ने जोर देकर कहा कि अगर बैंक राइट-ऑफ की प्रक्रिया तभी अपनाते हैं जब ऋण वसूली की उम्मीद बेहद कम रह जाती है, तो फिर कॉरपोरेट क्षेत्र को इतनी बड़ी राहत और किसानों को उससे महरुम क्यों रखा जा रहा है? उन्होंने मांग की कि आर्थिक और बैंकिंग नीतियों में कॉरपोरेट और कृषि क्षेत्र के लिए अपनाए जा रहे इस दोहरे मापदंड को तुरंत बंद किया जाना चाहिए और किसानों के साथ भी समानता का व्यवहार किया जाना चाहिए।