समाचार · गुजरात
अंबाजी के मोहनथाल प्रसाद को मिला भौगोलिक संकेतक टैग

पालनपुर. अंबाजी. गुजरात के प्रसिद्ध शक्तिपीठ अंबाजी मंदिर के पारंपरिक मोहनथाल प्रसाद को भौगोलिक संकेतक (जीआइ) टैग मिलने से राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान मिली है। शारदीय नवरात्रि के पहले दिन रविवार को अंबाजी मंदिर के चाचर चौक पर आयोजित समारोह में श्री आरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष सह बनासकांठा के जिला कलक्टर मिहिर पटेल को जीआइ टैग का आधिकारिक प्रमाण-पत्र सौंपा गया। इस उपलब्धि को मां अंबा के लाखों श्रद्धालुओं के लिए गौरवपूर्ण क्षण माना जा रहा है। समारोह की अध्यक्षता पेटेंट, डिजाइन एवं ट्रेडमार्क महानियंत्रक सह भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्रार प्रो. डॉ. उन्नत पी. पंडित ने की। उन्होंने प्रमाण-पत्र सौंपा। इस अवसर पर अंबाजी मंदिर के प्रशासक सह अतिरिक्त कलक्टर कौशिक मोदी सहित मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारी, सहयोगी संस्थाओं के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। मंदिर ट्रस्ट के आवेदन पर निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद 1 अक्टूबर, 2026 को जीआइ प्रमाण-पत्र जारी किया गया था। असली मोहनथाल की पहचान और गुणवत्ता को मिलेगा संरक्षण प्रो. पंडित ने कहा कि पारंपरिक उत्पादों की वास्तविक पहचान और गुणवत्ता बनाए रखना आवश्यक है। जीआइ टैग मिलने से अंबाजी आने वाले श्रद्धालुओं को असली मोहनथाल प्रसाद उपलब्ध कराने के प्रयासों को मजबूती मिलेगी। उन्होंने अहमदाबाद स्थित भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान (ईडीआइआइ) की ओर से जीआइ टैग प्राप्त उत्पादों के प्रचार-प्रसार और बिक्री के लिए की जा रही पहल का भी उल्लेख किया। संस्थान ने ऐसे उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए विशेष जीआइ स्टोर भी शुरू किया है। श्रद्धालुओं की आस्था और क्षेत्र की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत का भी सम्मान जिला कलक्टर मिहिर पटेल ने कहा कि मोहनथाल को जीआइ टैग मिलना केवल एक पारंपरिक प्रसाद की पहचान का सम्मान नहीं है, बल्कि यह मां जगदंबा के प्रति लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और क्षेत्र की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत का भी सम्मान है। तिरुपति के लड्डू और पलानी के पंचामृतम की तरह अब अंबाजी के मोहनथाल को भी विशिष्ट धार्मिक प्रसाद के रूप में पहचान मिली है। इसके नाम के अनधिकृत इस्तेमाल, नकल और नकली उत्पादों की बिक्री के विरुद्ध कानूनी संरक्षण प्राप्त करने में मदद मिलेगी। इससे इसकी पारंपरिक निर्माण विधि, गुणवत्ता और पहचान को संरक्षित करने के प्रयासों को भी बल मिलेगा।