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Gujarat: 80 हजार करोड़ की सरकारी खरीद में स्टार्टअप की हिस्सेदारी महज एक फीसदी

INT News18 July 2026 at 10:32 pm

Ahmedabad. गुजरात प्रदेश कांग्रेस समिति ने राज्य सरकार पर स्टार्टअप उद्यमियों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। शनिवार को प्रदेश मुख्यालय राजीव गांधी भवन में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में पार्टी के प्रवक्ता डॉ. पार्थिवराजसिंह कठवाडिया ने कहा कि डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआइआइटी) से मान्यता प्राप्त गुजरात के 19 हजार से अधिक स्टार्टअप हैं। राज्य सरकार उनके साथ अन्याय कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2024 में घोषित गुजरात स्टेट प्रोक्योरमेंट पॉलिसी को अब तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है, जिससे स्टार्टअप संचालकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 और 2017 में माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) के लिए सार्वजनिक खरीद से जुड़े आदेश जारी किए थे। जिसके तहत सरकारी खरीद में स्टार्टअप को प्रोत्साहन देने तथा कुछ मामलों में अनुभव और टर्नओवर जैसी शर्तों में छूट देने का प्रावधान किया था। गुजरात सरकार ने भी वर्ष 2024 में गुजरात स्टेट प्रोक्योरमेंट पॉलिसी जारी की, लेकिन इसे सभी विभागों में समान रूप से लागू नहीं किया गया है। कांग्रेस प्रवक्ता ने दावा किया कि गुजरात सरकार के विभिन्न विभाग, बोर्ड, निगम और सरकारी संस्थाएं हर वर्ष 80 हजार करोड़ रुपए से अधिक के उत्पादों और सेवाओं की खरीदी करते हैं, लेकिन इसमें स्टार्टअप को केवल करीब 1000 करोड़ रुपए तक के टेंडर ही मिल पाते हैं। यह कुल सरकारी खरीद का लगभग एक प्रतिशत ही है। कड़ी शर्तों के चलते स्पर्धा से बाहर हो रहे स्टार्टअप उन्होंने कहा कि कई टेंडरों में अत्यधिक अनुभव, बहुत अधिक वार्षिक टर्नओवर, पहले सरकारी आपूर्ति का अनुभव और अन्य कड़ी शर्तें रखी जाती हैं। इन शर्तों के कारण गुणवत्तापूर्ण और नवाचार आधारित स्टार्टअप सरकारी निविदाओं में समान अवसर नहीं प्राप्त कर पाते और डीपीआइआइटी से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाते हैं। सरकार स्टार्टअप को वास्तविक लाभ पहुंचाने में विफल डॉ. कठवाडिया ने मांग की कि राज्य सरकार सभी विभागों के लिए सार्वजनिक खरीद नीति और स्टार्टअप से संबंधित स्पष्ट परिपत्र जारी करे। साथ ही टेंडर जारी करने से पहले उसकी शर्तों की समीक्षा कर स्टार्टअप को नीति के अनुसार मिलने वाले सभी लाभ सुनिश्चित करने के कदम उठाए। 'इनोवेशन', 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे बड़े दावों के बावजूद युवा उद्यमियों को वास्तविक लाभ पहुंचाने में सरकार विफल रही है।