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8 करोड़ की मशीन खरीदी पर हाईकोर्ट में PIL:सरकार से 4 हफ्ते में जवाब, जांच रिपोर्ट में खरीदी प्रक्रिया पर सवाल
इंदौर में एमजीएम मेडिकल कॉलेज में करीब 8 करोड़ रुपए की NGS मशीन खरीदी को लेकर बुधवार को हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में जनहित याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता राकेश भाबर ने स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि मशीन खरीदी की प्रक्रिया में कई अनियमितताएं सामने आने के बावजूद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अब तक आरोप पत्र जारी नहीं किया गया है। मामले में जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की डबल बेंच ने सरकार को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को होगी। जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप याचिकाकर्ता ने स्वास्थ्य विभाग, लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ में मशीन खरीदी को लेकर शिकायत की थी। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने अप्रैल 2026 में वित्त संचालक की अध्यक्षता में जांच समिति बनाई थी। समिति ने कॉलेज पहुंचकर दस्तावेजों और खरीदी प्रक्रिया की जांच की और जुलाई में रिपोर्ट विभाग को सौंपी। डीन समेत 6 को बनाया पक्षकार याचिका में मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, स्वास्थ्य आयुक्त, आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ के इंदौर एसपी, एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया और उनकी पत्नी तथा टेंडर तकनीकी समिति की अध्यक्ष डॉ. शिखा घनघोरिया सहित दो अन्य को पक्षकार बनाया गया है। मुख्य सचिव मॉनिटर में मामला, फिर भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप याचिका के मुताबिक, जांच रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर मुख्य सचिव के समक्ष शिकायत की गई। मामला मुख्य सचिव मॉनिटर नंबर 974 में 7 जुलाई 2026 को दर्ज कर स्वास्थ्य विभाग को भेजा गया। प्रमुख सचिव स्वास्थ्य ने भी इसे समय-सीमा प्रकरण के रूप में दर्ज किया। याचिकाकर्ता का दावा है कि इसके बावजूद करीब ढाई महीने बीतने के बाद भी डीन के खिलाफ आरोप पत्र जारी नहीं किया गया। 2022 से मशीन थी तो नई मशीन की जरूरत क्यों पड़ी? याचिका में जांच रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि एमजीएम में 2022 से ही NGS मशीन उपलब्ध थी। इसके बावजूद नई मशीन खरीदने की प्रक्रिया शुरू की गई। कॉलेज की कार्यकारिणी समिति की 12 अप्रैल की बैठक में पुरानी मशीन शुरू करने के लिए जरूरी उपभोज्य सामग्री और वार्षिक रखरखाव अनुबंध की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद करीब 8 करोड़ रुपए की नई मशीन खरीदने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। डीन की ओर से पुरानी मशीन के अप्रचलित होने और उसके लिए जरूरी सामग्री का निर्माण बंद होने की बात कही गई थी। हालांकि, जांच में इससे जुड़े दस्तावेजों और कंपनी की जानकारी के आधार पर इस दावे पर सवाल उठाए गए। 4 करोड़ रुपए मिलना बाकी थे, फिर 8 करोड़ की मंजूरी का प्रस्ताव जांच में यह भी सामने आने का उल्लेख है कि MDRU प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की शत-प्रतिशत वित्तपोषित योजना थी और करीब 4 करोड़ रुपए की राशि मिलना बाकी थी। इसके बावजूद राज्य शासन से अलग से करीब 8 करोड़ रुपए की वित्तीय स्वीकृति का प्रस्ताव भेजा गया। 27 उपकरणों को एक ही टेंडर में शामिल करने पर सवाल जांच रिपोर्ट में 27 अलग-अलग प्रकार के उपकरणों को एक ही समग्र निविदा में शामिल करने और मूल निर्माता कंपनियों के प्राधिकरण-पत्रों से जुड़ी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि जांच रिपोर्ट में इसके लिए डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया और तकनीकी समिति की अध्यक्ष डॉ. शिखा घनघोरिया की जवाबदेही तय किए जाने का उल्लेख है। महंगी मशीन का तकनीकी प्रदर्शन कराए बिना वैल्यूएशन जांच रिपोर्ट के अनुसार, ऊंची कीमत वाली मशीन का तकनीकी प्रदर्शन कराए बिना उसे तकनीकी मूल्यांकन में पात्र घोषित किया गया। नई मशीन खरीदने के समर्थन में विस्तृत तकनीकी मूल्यांकन, विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा या स्वतंत्र व्यवहार्यता रिपोर्ट भी रिकॉर्ड में नहीं मिलने की बात रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट में प्रशासनिक पारदर्शिता, दस्तावेजों के संधारण और निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की मांग जनहित याचिका में जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों के आधार पर डॉ. अरविंद घनघोरिया, डॉ. शिखा घनघोरिया और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।