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इंदौर के जल संकट पर हाईकोर्ट में सुनवाई:सूखे तालाबों तक नर्मदा जल पहुंचाने के प्रस्ताव पर सरकार से 2 सप्ताह में निर्देश लेने को कहा
इंदौर में गहराते जल संकट और गिरते भूजल स्तर के बीच सूखे तालाबों को नर्मदा जल से भरने का प्रस्ताव हाईकोर्ट पहुंच गया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने शिप्रा टेकरी/उज्जैनी से असरावद खुर्द तालाब तक अस्थायी पाइपलाइन बिछाने के प्रस्ताव पर राज्य शासन को दो हफ्ते में आवश्यक निर्देश लेने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की डबल बेंच में शुक्रवार को राजलक्ष्मी फाउंडेशन की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में शहर में पानी की बर्बादी रोकने, पेयजल की गुणवत्ता सुधारने और पारंपरिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने की मांग की गई है। असरावद खुर्द से आसपास के तालाबों को जोड़ने का प्रस्ताव याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट अजय बागड़िया ने प्रस्ताव रखा कि शिप्रा टेकरी/उज्जैनी से असरावद खुर्द तालाब तक अस्थायी पाइपलाइन बिछाकर नर्मदा का पानी पहुंचाया जा सकता है। इससे असरावद खुर्द तालाब को भरने और उससे जुड़े मिर्जापुर, रालामंडल, लिम्बोदी और बिलावली सहित अन्य तालाबों तक पानी पहुंचाने में मदद मिल सकती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे भूजल स्तर सुधारने में भी मदद मिलेगी। इस प्रस्ताव की तकनीकी व्यवहार्यता जांचने के लिए 48 घंटे में निरीक्षण और 72 घंटे में रिपोर्ट देने की मांग की गई थी। हालांकि कोर्ट ने राज्य शासन को इस संबंध में दो सप्ताह में आवश्यक निर्देश प्राप्त करने को कहा है। पाइप लाइन लीकेज रोकने के लिए 7 दिन का अभियान चलाने की मांग सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने शहर में पाइपलाइन लीकेज, खराब वाल्व, अवैध कनेक्शन और कम दबाव जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए सात दिन का विशेष अभियान चलाने की मांग की। ‘’ में प्रकाशित पाइप लाइन लीकेज से करीब एक करोड़ लीटर पानी बर्बाद होने की खबर का भी हवाला दिया गया। याचिका में दूषित पानी की शिकायत वाले क्षेत्रों में पाइपलाइन, टैंकरों और सार्वजनिक बोरवेल के पानी की जांच कराने तथा रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग भी रखी गई। बारिश का पानी बचाने और मोहरियों से अतिक्रमण हटाने की मांग याचिकाकर्ता ने सरकारी भवनों, अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, मॉल और अन्य बड़े परिसरों में लगे रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की सफाई व मरम्मत कर उन्हें सात दिन में चालू करने की मांग की। इसके साथ ही तालाबों को जोड़ने वाली पारंपरिक जल निकासी नालियों यानी मोहरियों की सफाई, गाद निकालने और जल प्रवाह में बाधक अतिक्रमण हटाने का मुद्दा भी उठाया गया। याचिका के अनुसार इससे बारिश के पानी का संचयन और भूजल पुनर्भरण बेहतर हो सकता है। उपचारित पानी का इस्तेमाल बढ़ाने पर भी जोर याचिका में मांग की गई कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से मिलने वाले उपचारित पानी का उपयोग निर्माण कार्यों, उद्यानों, सड़कों की धुलाई और औद्योगिक गतिविधियों में किया जाए। इससे गैर-जरूरी कामों में पीने योग्य पानी और भूजल की खपत कम की जा सकती है। सुनवाई के दौरान नगर निगम ने अपनी अनुपालन रिपोर्ट पेश की। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि कई मुद्दों पर विभाग एक-दूसरे की जिम्मेदारी बता रहे हैं, जबकि जल संकट से निपटने के लिए समन्वित कार्रवाई जरूरी है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।