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58500 साल पहले दार्जिलिंग से नीचे आ गया था हिमालय का 100 किमी लंबा ग्लेशियर! वैज्ञानिकों की रिसर्च में खुलासा

INT News18 July 2026 at 10:42 pm

Climate Change Study: आज वैश्विक तापमान में वृद्धि (Global Warming) पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा संकट बन गयी है. ऐसे नहीं है कि पहले कभी यह संकट नहीं था. हजारों साल पहले भी तापमान में बढ़ोतरी के कारण पूर्वी हिमालय में एक बहुत बड़ी तबाही मची थी. इसका सीधा संबंध पश्चिम बंगाल के आज के पर्वतीय क्षेत्रों से है. 'क्वाटरनरी साइंस रिव्यू' (Quaternary Science Review) जर्नल में प्रकाशित एक शोध में बताया गया है कि करीब 58,500 वर्ष पहले पूर्वी हिमालय का एक विशाल ग्लेशियर पिघलकर दार्जिलिंग, शिमला और शिलांग जैसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन्स की मौजूदा ऊंचाई से भी काफी नीचे आ गया था.

द्री घाटी का 100 किमी लंबा ग्लेशियर अब विलुप्तप्राय

वैज्ञानिकों का कहना है कि आज हम दार्जिलिंग, शिमला और शिलांग की जिन खूबसूरत वादियों में घूमते हैं, अगर उस दौर में वे शहर वहां बसे होते, तो पूरी तरह बर्फ की चादर के नीचे दफन हो गये होते. मैनचेस्टर विश्वविद्यालय (University of Manchester) के शोधकर्ता शशांक नितुंदिले के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने वर्ष 2023 में पूर्वी हिमालय के सुदूर इलाकों का दौरा किया था. इस दौरान अरुणाचल प्रदेश के दिबांग क्षेत्र में स्थित ‘द्री घाटी’ (Dri Valley) में व्यापक अध्ययन किया गया, जिसमें तिब्बत और स्थानीय मिशमी समुदाय के लोगों ने वैज्ञानिकों की मदद की.

रिसर्च से पता चला कि 58,500 साल पहले इस क्षेत्र में लगभग 100 किलोमीटर (62 मील) लंबा एक विशाल ग्लेशियर फैला हुआ था. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण आज वह सिकुड़ते-सिकुड़ते महज 5 किलोमीटर का रह गया है और लगभग विलुप्ति की कगार पर है.

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दार्जिलिंग से 700 मीटर नीचे आ गयी थी 'बर्फ की जीभ'

वैज्ञानिकों के विश्लेषण के मुताबिक, उस दौर में पूर्वी हिमालय की करीब 7,000 मीटर की औसत ऊंचाई वाले शिखरों से ग्लेशियर में भू-स्खलन हुआ, जिसके कारण ग्लेशियर का अंतिम सिरा (जिसे विज्ञान की भाषा में ‘जीभ’ कहा जाता है) पिघलकर समुद्र तल से 1,300 से 1,500 मीटर की ऊंचाई तक नीचे आ गया था.

अगर इसकी तुलना आज के प्रमुख हिल स्टेशंस की ऊंचाई से की जाये, तो आंकड़े हैरान हैरान कर देंगे.

शिमला (हिमाचल प्रदेश) : समुद्र तल से 2,206 मीटर की ऊंचाई पर.

दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल): समुद्र तल से 2,042 मीटर की ऊंचाई पर.

शिलांग (मेघालय) : समुद्र तल से 1,966 मीटर की ऊंचाई पर.

यानी, हजारों साल पहले आयी वह प्राकृतिक आपदा इतनी भयानक थी कि ग्लेशियर का मलबा और बर्फ बंगाल के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल दार्जिलिंग (2,042 मीटर) की ऊंचाई से भी करीब 500 से 700 मीटर नीचे तक आ पहुंचा था.

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‘बेरिलियम-10’ से खुला ऐतिहासिक तबाही का राज

वैज्ञानिकों को द्री घाटी में रिसर्च के दौरान यू (U) आकार की घाटियां और बिल्कुल चिकनी चट्टानें मिलीं, जो यह साबित करती हैं कि यहां कभी ग्लेशियरों का घर्षण हुआ था. ग्लेशियर के पिघलने का सटीक समय जानने के लिए वैज्ञानिकों ने कॉस्मोजेनिक न्यूक्लाइड डेटिंग (Cosmogenic Nuclide Dating) पद्धति का सहारा लिया.

शोधकर्ताओं ने घाटी से पत्थरों और बोल्डर के 63 नमूने एकत्र कर जांच के लिए ऑस्ट्रेलिया की प्रयोगशाला में भेजे. जब ग्लेशियर पिघलता है, तो उसके नीचे दबे पत्थरों पर सूर्य की किरणें पड़ने से ‘बेरिलियम-10’ (Beryllium-10) नामक एक दुर्लभ आइसोटोप बनता है. इसी आइसोटोप की मात्रा को मापकर पता चला कि ग्लेशियर धीरे-धीरे नहीं, बल्कि अचानक आयी तबाही के कारण सिकुड़ने लगा था. 58,500 साल पहले जो ग्लेशियर 100 किमी लंबा था, वह 12,600 साल पहले घटकर सिर्फ 25 किमी का रह गया.

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अत्यधिक बारिश नहीं, तापमान में वृद्धि असली विलेन!

अब तक वैज्ञानिकों का यह मानना था कि पूर्वी हिमालय जैसे अत्यधिक नमी और बारिश वाले इलाकों में ज्यादा बारिश ग्लेशियरों को स्थिर रखने में मदद करती है. लेकिन द्री घाटी के इस शोध ने पूरी धारणा बदल दी है. अंतिम ग्लेशियर चक्र के विश्लेषण से साफ हुआ कि ग्लेशियर के पिघलने के पीछे बारिश या बर्फबारी की कोई खास भूमिका नहीं थी. इसका मुख्य कारण तापमान में लगातार हो रही वृद्धि थी. तापमान बढ़ने से बर्फबारी कम हो जाती है और बारिश बढ़ जाती है, जिससे नयी बर्फ जमने की प्रक्रिया पूरी तरह रुक जाती है. पुराना ग्लेशियर तेजी से गलने लगता है.

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पश्चिम बंगाल और उत्तर बंगाल के लिए बड़ा अलर्ट

वैज्ञानिक अतीत के इस पन्ने को खंगालकर हमारे भविष्य का खाका तैयार कर रहे हैं. जिस प्रकार वर्तमान में ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण तापमान बढ़ रहा है, उससे सिक्किम और उत्तर बंगाल से सटे हिमालयी ग्लेशियरों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है. अगर ये ग्लेशियर इसी तरह अचानक पिघलते हैं, तो तीस्ता, तोर्सा, जलढाका और महानंदा जैसी उत्तर बंगाल की लाइफलाइन कही जाने वाली नदियों में भयानक फ्लैश फ्लड (बाढ़) और बाद में जलसंकट की स्थिति पैदा हो सकती है.

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