Monday, 12 October 2026
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सुधांशु त्रिवेदी बोले, इमरजेंसी वो था; जब इंदिरा को सत्ता से हटाने की बात पर होती थी जेल, जानिए क्या था DIR और MISA कानून

INT News11 October 2026 at 06:16 pm

सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि 1975 में जब देश में इमरजेंसी लागू हुआ था तो एक विशेष कानून DIR यानी (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स) लागू था. उस वक्त अगर आप किसी सार्वजनिक स्थल पर इतना भर कह देते कि इंदिरा गांधी की सरकार को हटाना है, तो आप जेल में होते और कोई सुनवाई भी नहीं होती. आज तो स्थिति यह है कि पीएम मोदी के बारे में कोई भी अनर्गल और निराधार बातें कर रहा है और उनपर कोई कार्रवाई भी नहीं हो रही है.

सुधांशु ने DIR और MISA कानून पर क्या कहा, वीडियो में देखें-

सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि जो लोग आज मानवाधिकारों की बातें कर रहे हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि इमरजेंसी में मानवाधिकार सस्पेंड कर दिए गए थे. उस वक्त कोर्ट में एक वकील ने पूछा था कि क्या अगर पुलिस किसी को गोली मार दे, तो हम देखते रहें, उस वक्त कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि राष्ट्रपति का आदेश प्रभावी रहने तक गिरफ्तार व्यक्ति कानून से संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता था. सुधांशु त्रिवेदी ने दो कानूनों का भी जिक्र किया है जिनके नाम हैं DIR और MISA, आइए समझते हैं क्या थे ये दोनों कानून.

DIR क्या था और इसका इस्तेमाल कैसे होता था?

DIR का पूरा नाम Defence of India Rules था. यह नियम 1971 के डिफेंस ऑफ इंडिया कानून के तहत बनाए गए थे. इनका उद्देश्य देश की रक्षा, सार्वजनिक सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार को विशेष अधिकार देना था. इन नियमों के अंतर्गत सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था, सभाओं, जुलूसों, प्रकाशनों और विरोधी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के अधिकार दिए गए थे.इसी के तहत इंदिरा गांधी की आलोचना करने वालों को जेल में डाला जाता था.

क्या था मीसा कानून जिसके तहत होती थी नेताओं की गिरफ्तारी

मीसा (MISA) का पूरा नाम Maintenance of Internal Security Act, 1971 यानी आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने का कानून था. इसे 2 जुलाई 1971 को कानून बनाया गया था. इसके तहत सरकार को किसी व्यक्ति को संभावित खतरे के आधार पर मुकदमा चलाए बिना हिरासत में रखने की व्यापक शक्तियां मिली थीं. इस कानून का उद्देश्य देश की आंतरिक सुरक्षा बनाए रखना था. इसके तहत केंद्र और राज्य सरकारों को बिना दोषसिद्धि के (Preventive Detention)हिरासत में लेने की शक्ति मिली थी. इस कानून के तहत किसी व्यक्ति पर अदालत में अपराध साबित किए बिना उसे हिरासत में रखा जा सकता था. इसके लिए संभावित खतरे का आधार बनाकर किसी व्यक्ति की गतिविधियों को देश की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया. इसके तहत तलाशी और जब्ती जैसी शक्तियां भी थीं. इमरजेंसी के दौरान इसके प्रावधान और सख्त किए गए.

इमरजेंसी में पुलिस किसी को गोली मार दे, तो क्या अदालत कुछ नहीं कर सकती थी?

सुधांशु त्रिवेदी ने यह कहा कि इमरजेंसी के दौरान पुलिस किसी को गोली मार दे, तो अदालत कुछ नहीं कर थी. इस आरोप को समझने के ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) के केस को समझना होगा. इस केस में 28 अप्रैल 1976 को पांच न्यायाधीशों ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाया था. इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तार लोगों की ओर से दलील दी गई कि सरकार यदि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखती है, तो उसे अदालत में चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए. सुनवाई से जुड़ा एक चर्चित सवाल यह था कि यदि कोई पुलिसकर्मी व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण किसी व्यक्ति को गोली मार दे, तो क्या उसके परिवार को न्याय पाने के लिए अदालत जाने का अधिकार भी नहीं होगा.

इस बहस में सरकार की ओर से पेश वकील निरन डे (Niren De) से जुड़ा एक चर्चित जवाब भी उद्धृत किया जाता है. उसका आशय था कि राष्ट्रपति के आदेश के प्रभावी रहने तक ऐसे मामले में कानूनी सहायता उपलब्ध नहीं होगी. यह प्रसंग इमरजेंसी के दौरान नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा पर बहस का प्रतीक बन गया था. सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के फैसले से कहा था कि राष्ट्रपति के आदेश के प्रभावी रहने के दौरान बंदी अपनी हिरासत को चुनौती देने के लिए याचिका दाखिल नहीं सकते थे, भले ही उन्होंने हिरासत को गैरकानूनी बताया हो.

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