पहाड़ का पीला सोना, कबाड़ से कमाल कर रही हैं उत्तराखंड की महिलाएं, जो जंगलों की है दुश्मन, जाने

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Deharadun news: जे पी मैठाणी ने बताया कि साल 1996 में उन्होंने एमएससी बॉटनी की थी. वह 1997 से वह पीरूल पर काम कर रहे हैं. तब रिवर्स पलायन जैसी बातें नहीं हुआ करती थी. उन्होंने कहा कि हम बस पीरूल को आमदनी का जरिया बनाने की कोशिश कर रहे थे और हमें सफलता भी मिली. उन्होंने कहा कि पीरूल को अभिशाप कहा जाता है. उन्होंने कहा कि लगभग 29 महिलाओं के साथ मिलकर एक ग्रोथ सेंटर संचालित कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमने देखा कि पहाड़ पर जंगलों में पीरूल की पत्तियां मार्च से जून के बीच सूखी होती हैं.