बरसाना के पत्थरों से आती है दूध-दही की महक:मान्यता- श्रीकृष्ण ने यहीं गोपियों की मटकी फोड़ी, पदचिन्ह भी दिखते हैं

बरसाना के पत्थरों से आती है दूध-दही की महक:मान्यता- श्रीकृष्ण ने यहीं गोपियों की मटकी फोड़ी, पदचिन्ह भी दिखते हैं

मथुरा के बरसाना में राधाष्टमी के उत्सव की तैयारियां चल रही हैं। श्रीकृष्ण के जन्म के 15 दिन बाद यह उत्सव मनाया जाता है। बरसाना के अपने महल में राधा रानी श्रीकृष्ण के साथ दर्शन देंगी। 2 लाख से ज्यादा श्रद्धालु यहां उनके दर्शन करेंगे। राधा रानी जिस छवि में दिखती है, कहते हैं- यह छवि 500 साल पहले ब्रह्मांचल पर्वत से प्रकट हुई थी। पर्वत पर आज भी राधा-कृष्ण के प्रमाण मौजूद हैं। इस पर्वत पर जगह-जगह पद चिह्न हैं, भक्त इन्हें श्रीकृष्ण के मानते हैं। इनकी पूजा कर माथा टेकते हैं। मान्यता ये भी है कि इन्हीं पर्वतों के बीच श्रीकृष्ण बैठते थे। वे यहां से गुजरने वाली गोपियों की मटकियां फोड़ देते थे। इसलिए आज भी इन पर्वतों से दूध-दही की महक आती है। राधाष्टमी के उत्सव की तैयारियां कैसी चल रही हैं? बरसाना के गोवर्धन, नंदीश्वर, ब्रह्मांचल पर्वतों की कहानी क्या है? क्या वाकई जहां श्रीकृष्ण गोपियों की मटकियां फोड़ देते थे, उन पर्वतों पर आज भी दूध-दही की महक आती है? ये जानने के लिए दैनिक भास्कर टीम बरसाना के ब्रह्मांचल पर्वत पर पहुंची। पढ़िए रिपोर्ट… जन्म ननिहाल रावल में, फिर राधाजी के पिता बरसाना आए
दैनिक भास्कर ने सबसे पहले मथुराधीश प्रभु मंदिर के सेवायत और भागवत प्रवक्ता रमाकांत गोस्वामी से बात की। उन्होंने बताया- राधा रानी का जन्म उनके ननिहाल रावल में हुआ था। लेकिन जब नंदबाबा गोकुल से नंदगांव गए, तब राधाजी के पिता वृषभानु भी अपनी नगरी बरसाना चले गए। राधाजी भी उनके साथ बरसाना चली आईं। बरसाना से रावल गांव की दूरी करीब 60 किलोमीटर है। सबका कहना है कि राधाजी जब से बरसाना आईं, तब से वहीं रहीं। बताया जाता है कि द्वापर युग में यही उनका घर था। इसका प्रमाण बरसाना में बना राधाजी का मंदिर है। मंदिर को ‘बरसाने की लाडलीजी का मंदिर’ और ‘राधा रानी महल’ भी कहा जाता है। स्कंद पुराण और गर्ग संहिता के अनुसार, हिंदू कैलेंडर के भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को राधा जी का जन्म हुआ था। यह दिन राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। जन्म के बाद राधाजी की मूल शांति, फिर होता है अभिषेक
बरसाना मंदिर के सेवायत डॉ. यज्ञ पुरुष गोस्वामी से हमारी मुलाकात हुई। हमने उनसे राधाष्टमी पर होने वाले आयोजन को समझने की कोशिश की। वह कहते हैं- सनातन धर्म में जब किसी बच्चे का जन्म होता है, तो मूल शांति की प्रक्रिया होती है। उस प्रक्रिया को गोस्वामी मंदिर में पूर्ण करते हैं। इसमें 27 वृक्षों के पत्ते, 27 तरह के फूल समेत कई तरह की सामग्री का इस्तेमाल होता है। श्रीजी का घी, दूध, दही, मक्खन, जल, चंदन और जड़ी-बूटी से अभिषेक होता है। फिर सुबह 4 बजे श्रीजी के दर्शन होते हैं। जिस पर्वत पर राधारानी विराजमान, उसके 4 मुख
यहां राधारानी ब्रह्मांचल पर्वत पर बने महल में विराजमान हैं। मान्यता है कि इस पर्वत पर राधारानी प्रकट हुईं थीं। 5 Km में फैले इस पर्वत को ब्रह्माजी का पर्वत रूप माना जाता है। कहते हैं- जिस तरह ब्रह्माजी के 4 मुख हैं, ठीक वैसे ही इस पर्वत के 4 शिखर हैं। दान गढ़, भानगढ़, विलास गढ़ और मान गढ़। भानगढ़ शिखर पर राधारानी जी का मंदिर है और वह वहीं विराजमान हैं। मंदिर को 400 साल पहले ओरछा नरेश ने बनवाया था। मंदिर में विराजित राधा रानी की प्रतिमा को ब्रजाचार्य श्रील नारायण भट्ट ने बरसाना स्थित ब्रहृमेश्वर गिरि नामक पर्वत से निकाला था। मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को 250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। जहां यह मंदिर है, वहां से पूरा बरसाना गांव दिखता है। बरसाने से 6 Km दूर नंदगांव है, जहां श्रीकृष्ण के पिता नंदजी का घर था। अब ब्रज में ब्रह्मा, विष्णु, महेश के विराजमान होने की कहानी जानें मथुरा-वृंदावन के पर्वतों की मान्यताओं को ठीक से समझने के लिए हमने नंदगांव मंदिर के सेवायत सुशील गोस्वामी से बात की। उन्होंने बताया कि, श्रीकृष्ण और राधारानी के अवतरित होने के बाद इस धरती पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) भगवान भी आए। यहां वह तीनों पर्वत के स्वरूप में विराजमान हुए। पर्वत 1. गोवर्धन- इसको विष्णुजी का स्वरूप माना जाता है। पर्वत 2. ब्रह्मांचल- इसे ब्रह्माजी का रूप माना जाता है। पर्वत 3. नंदीश्वर- इसको शिव भगवान का स्वरूप माना जाता है। गोस्वामी आगे बताते हैं कि एक मान्यता यह भी है कि सती अनुसुइया के श्राप के कारण यह तीनों देवता यहां पर्वत स्वरूप में विराजमान हैं। 5 Km में फैला है ब्रह्मांचल पर्वत
बरसाना धाम में स्थित ब्रह्मांचल पर्वत श्रृंखला 5 Km में फैली है। दैनिक भास्कर की टीम जब बरसाना धाम पहुंची तो बताया गया कि भक्त पर्वत की 10 km में परिक्रमा लगाते हैं। लोग यहां पूजापाठ करते नजर आए। जैसा कि बरसाना के गोस्वामी ने बताया, हमने भी इस पर्वत पर चलने का फैसला किया। ब्रह्मांचल पर्वत पर बने राधारानी मंदिर के लिए हम करीब 300 सीढ़ी चढ़कर सिंह द्वार तक पहुंचे। यहां हमें सबसे पहले एक छोटा सा ब्रह्माजी का मंदिर मिला। इसी मंदिर के नीचे राधारानी के चरण बने हुए थे। कहा जाता है कि यह पद चिन्ह द्वापर कालीन हैं। इसी स्थान से कुछ आगे एक जगह पर पूजापाठ हो रहा था। पूछने पर पता चला कि यहां पर कामधेनु गाय प्रकट हुई थीं। सांकरी खोर : यहां दिखते हैं, दो तरह के पत्थर बरसाना के श्रीजी मंदिर से हम आगे बढ़े और करीब 3 किमी. दूर ब्रह्मांचल पर्वत की श्रृंखलाओं के बीच बने स्थान सांकरी खोर पहुंचे। इन पहाड़ियों में राधा-श्रीकृष्ण से जुड़ी कई कहानियां भी हैं। श्रीकृष्ण की लीलाओं की कथा सुनते हुए जब हम इन पहाड़ियों पर पहुंचे, तो देखा कि इन पहाड़ियों पर 2 तरह के पत्थर हैं – पहले – वो पत्थर जो श्याम वर्ण (काले) के हैं। इन पत्थरों को श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। ये पत्थर कई परतों में दिखते हैं, यहां कई जगह पर पद चिह्न दिखते हैं। दूसरे – गौर वर्ण (सफेद) पत्थर दिखते हैं। इन्हें राधाजी का स्वरूप मानते हैं। लोग यहां पूजा करते हैं। अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं। यहां भक्त पूजा करते हुए मिले। बातचीत करने पर पता चला कि श्याम वर्ण का पर्वत भगवान कृष्ण का है, जबकि गौर वर्ण का पर्वत राधा रानी का है। द्वापर में भगवान कृष्ण अपने पर्वत पर विराजमान होते थे, तो राधा रानी अपने पर्वत पर विराजमान हुईं थीं। भगवान लेते थे दूध, दही और मक्खन का दान
सांकरी खोर के बारे में वहां मौजूद ब्रज किशोर ने बताया- यहां भगवान कृष्ण लीला किया करते थे। इस संकरी गली से होकर जब गोपियां दूध, दही, मक्खन लेकर जाती थीं तो भगवान उनसे दान मांगते थे। नहीं देने पर उनकी मटकियां फोड़ देते थे। मटकियों में रखा दूध-दही इस शिलाओं पर फैल जाता था। यही वजह है कि आज भी इन शिलाओं पर दूध, दही-मक्खन की खुशबू आती है। श्रद्धालु बोले- वाकई चमत्कार है
यहां हमने पर्वत की शिलाओं से आ रही दूध,दही और मक्खन की खुशबू आने के दावे की हकीकत पता की। इस दौरान कई श्रद्धालु पर्वत शिलाओं को सूंघते नजर आए। इन श्रद्धालुओं से जब जानकारी की गई तो उन्होंने बताया कि यहां से वाकई दूध, मक्खन जैसी महक आती महसूस होती है। श्रद्धालुओं और लोकल लोगों के दावे को परखने के लिए जब हम इन पत्थरों के और करीब गए, तो हमें भी सच में ऐसी महक महसूस हुई। अब विवाह का प्रसंग जानिए विवाह को लेकर पुराण और धार्मिक ग्रंथों में क्या लिखा है
आचार्य मृदुल कांत शास्त्री और राधाकांत गोस्वामी ने बताया- ब्रह्म वैवर्त पुराण के प्रकृति खंड अध्याय- 49 के श्लोक 40, 43, 44 में राधा रानी के कृष्णजी से विवाह के संबंध में उल्लेख है। इसके अलावा, गर्ग संहिता में गिर्राज खंड अध्याय- 5 के श्लोक संख्या 15-16, 31- 34, शिव महापुराण में पार्वती खंड के अध्याय- 2 के श्लोक संख्या 40 और स्कंद पुराण में भी इसका वर्णन है। …… ये भी पढ़ें : बांके बिहारी मंदिर में AK-47 लेकर पहुंचा पुलिसकर्मी:गर्भगृह के बाहर VIP गेस्ट के लिए कुर्सियां लगी, फोटो- VIDEO भी बनवाया मथुरा के वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर का एक वीडियो सामने आया है। जिसमें एक पुलिस कर्मी सरकारी हथियार लेकर मंदिर के गर्भ गृह के बाहर स्थित जगमोहन में घूमता नजर आ रहा है। पुलिस कर्मी किसी वीआईपी के साथ आया था। जो कंधें पर एके- 47 टांगकर वीआईपी की फोटो खींच रहा था। वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर यूजर्स कमेंट कर रहे हैं- मंदिर की मर्यादाओं को तार-तार किया जा रहा है। पढ़िए पूरी खबर…

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