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Gyanesh Kumar: SIR विवाद में उपेंद्र कुशवाहा की एंट्री, बोले- कंफ्यूजन दूर करने के लिए स्थिति स्पष्ट करें

INT News25 September 2026 at 06:26 pm

Gyanesh Kumar : मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विवाद लगातार चर्चा में है. मामला सिर्फ राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा है. चुनाव आयोग के भीतर प्रक्रिया को लेकर सामने आई आपत्तियों ने भी इस पूरे मुद्दे को चर्चा में ला दिया है. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीने के दौरान कई मामलों में प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए थे.

ERONET और Form 6 को लेकर भी उठे सवाल

रिपोर्ट में बताया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. इनमें ERONET डेटाबेस को केंद्रीकृत करने का मामला, नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में बदलाव और SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने से जुड़े फैसले शामिल बताए गए हैं. करीब 10 महीने में ऐसी 14 आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है.

फिर चुनाव आयोग का क्या कहना है?

रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की. आयोग ने कहा कि किसी भी बड़े संस्थान में फैसले लेने से पहले अलग-अलग राय, सवाल और सुझाव आना सामान्य बात है. EC के मुताबिक, किसी अधिकारी या चुनाव आयुक्त की ओर से किसी मुद्दे पर अलग राय सामने आने का मतलब यह नहीं है कि वही आयोग का अंतिम फैसला है.

SIR पर अंतिम फैसला किसका था?

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR समेत पिछले एक साल में लिए गए उसके फैसले सभी तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से हुए हैं. आयोग ने इन्हें सर्वसम्मत फैसला बताया है.

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उपेंद्र कुशवाहा ने भी दी प्रतिक्रिया

इस बीच राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने SIR को लेकर चल रही बहस पर अपनी बात रखी है. उन्होंने कहा कि किसी मुद्दे पर राजनीतिक दलों की राय अलग होना सामान्य है. लेकिन उनका कहना है कि इस मामले में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह उचित नहीं है. कुशवाहा ने यह भी कहा कि जिस स्तर पर किसी मामले की जांच या पड़ताल करने का अधिकार है, वहीं से इसकी जांच होनी चाहिए.

SIR का सीधा संबंध मतदाता सूची से है. इसलिए इस प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवाल आम मतदाताओं के लिए भी महत्वपूर्ण हैं. फिलहाल सामने आई जानकारी में दो अलग बातें दिखाई देती हैं. एक तरफ चुनाव आयुक्तों की ओर से अलग-अलग मुद्दों पर आपत्तियां उठाने की रिपोर्ट है.

दूसरी तरफ चुनाव आयोग कह रहा है कि ये विचार-विमर्श का हिस्सा था और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए. ऐसे में अब सबसे जरूरी है कि SIR से जुड़े फैसलों और उन पर हुई चर्चा की स्थिति साफ तौर पर सामने आए. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किन मुद्दों पर सवाल उठे थे और अंतिम फैसला किस तरह हुआ.

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