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JAP के चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को HC से राहत, बर्खास्तगी से बहाली तक का मिलेगा पूरा वेतन

INT News25 September 2026 at 05:11 pm

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड आर्म्ड पुलिस (JAP) में वर्ष 2016 में नियुक्त चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार को बर्खास्तगी से लेकर पुनर्बहाली तक की पूरी अवधि का बकाया वेतन और सभी परिणामी सेवा लाभ देने का आदेश दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि जब नियुक्ति रद्द करने का आदेश पहले ही निरस्त किया जा चुका है और कर्मचारियों को परिणामी सेवा लाभों का हकदार माना जा चुका है, तब उन्हें "नो वर्क, नो पे" के आधार पर वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है.

2016 की नियुक्तियों से शुरू हुआ पूरा विवाद

यह मामला वर्ष 2016 में झारखंड आर्म्ड पुलिस में चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों की भर्ती से जुड़ा है. चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद कई अभ्यर्थियों की नियुक्ति हुई थी, लेकिन कुछ समय बाद भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जुड़ी शिकायतें और समाचार सामने आए. इसके बाद राज्य सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया. समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार ने पूरी चयन प्रक्रिया को रद्द कर दिया और नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं भी समाप्त कर दीं. सरकारी फाइलों की एक पुरानी कला है, पहले लोगों को नौकरी से बाहर करो, फिर वर्षों बाद अदालत बताती है कि फाइल ने कानून से तेज दौड़ लगा दी थी.

पहली बार हाईकोर्ट पहुंचा था मामला

सेवा समाप्त किए जाने के बाद प्रभावित कर्मचारियों ने झारखंड हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दाखिल कर सरकार के फैसले को चुनौती दी. सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने नियुक्तियां रद्द करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया था. अदालत ने अपने फैसले में याचिकाकर्ताओं को परिणामी सेवा लाभों का भी हकदार माना था. इस आदेश के बाद राज्य सरकार ने कर्मचारियों को दोबारा सेवा में बहाल कर दिया.

बहाली हुई, लेकिन वेतन रोक दिया गया

पुनर्बहाली के बावजूद विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. राज्य सरकार ने एक अलग आदेश जारी कर यह कहा कि जिस अवधि में कर्मचारी सेवा से बाहर रहे, उस दौरान उन्होंने काम नहीं किया, इसलिए "नो वर्क, नो पे" के सिद्धांत के तहत उन्हें उस अवधि का वेतन नहीं मिलेगा. सरकार के इस फैसले के बाद दिकेश कुमार और अन्य कर्मचारियों ने अधिवक्ता चंचल जैन के माध्यम से फिर से झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

कर्मचारियों ने अदालत में क्या दलील दी?

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि पहले ही हाईकोर्ट नियुक्तियां रद्द करने के आदेश को अवैध घोषित कर चुका है और उन्हें परिणामी सेवा लाभों का अधिकारी भी मान चुका है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने कोई अपील दाखिल नहीं की. ऐसे में वह आदेश अंतिम रूप से लागू हो चुका है और सरकार उसके प्रभाव को सीमित करते हुए केवल बहाली का लाभ नहीं दे सकती. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे अपनी इच्छा से सेवा से बाहर नहीं रहे थे. उन्हें सरकार के आदेश के कारण नौकरी से हटाया गया था और बाद में वही आदेश अदालत ने रद्द कर दिया. ऐसी स्थिति में वेतन और अन्य सेवा लाभ रोकना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.

हाईकोर्ट ने क्यों नहीं माना 'नो वर्क, नो पे' का तर्क?

मामले की सुनवाई के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि जब पहले के न्यायिक आदेश में उन्हें परिणामी सेवा लाभों का अधिकार दिया जा चुका है, तब राज्य सरकार उस आदेश को सीमित नहीं कर सकती. अदालत ने माना कि सेवा से बाहर रहने की अवधि कर्मचारियों की किसी गलती या स्वैच्छिक अनुपस्थिति का परिणाम नहीं थी, बल्कि सरकारी कार्रवाई के कारण वे नौकरी से बाहर हुए थे. इसलिए उस अवधि के वेतन से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता.

आठ सप्ताह में करना होगा भुगतान

हाईकोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि नियुक्ति रद्द होने से लेकर पुनर्बहाली तक की पूरी अवधि का बकाया वेतन और सभी परिणामी सेवा लाभ आठ सप्ताह के भीतर प्रदान किए जाएं. इस फैसले से दिकेश कुमार समेत सभी याचिकाकर्ताओं को आर्थिक और सेवा संबंधी राहत मिलने का रास्ता साफ हो गया है.

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फैसले का व्यापक महत्व

यह निर्णय केवल वेतन भुगतान का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि यह उस सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा समाप्ति का आदेश बाद में अदालत द्वारा अवैध घोषित कर दिया जाता है और उसे परिणामी सेवा लाभों का अधिकारी माना जाता है, तो सरकार केवल पुनर्बहाली देकर बाकी लाभों से इनकार नहीं कर सकती. झारखंड में सरकारी नियुक्तियों से जुड़े विवादों के बीच यह फैसला ऐसे कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी सेवाएं प्रशासनिक कार्रवाई के कारण प्रभावित हुईं और बाद में न्यायालय से उन्हें राहत मिली.

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