समाचार · गुजरात
जब धर्म से बड़ा हुआ इंसानियत का रिश्ता, एक-दूसरे के अपनों को दी किडनी

ahmedabad : दो परिवार... दो मरीज... और दोनों परिवारों में अपने प्रियजन की जिंदगी बचाने के लिए किडनी देने को तैयार एक-एक व्यक्ति। लेकिन जब जांच हुई तो पता चला कि दोनों दाताओं की किडनी अपने-अपने परिजन से मैच नहीं कर रही। एक पल के लिए लगा कि शायद अब उम्मीद नहीं बची। फिर चिकित्सा विज्ञान ने रास्ता दिखाया और इंसानियत ने उसे मंजिल तक पहुंचाया। एक हिंदू महिला ने मुस्लिम मरीज को अपनी किडनी देकर जीवन दिया, वहीं मुस्लिम महिला ने हिंदू मरीज के लिए अपनी किडनी दान की। यानी दोनों ने अपने नहीं, एक-दूसरे के अपनों को जिंदगी दी। 13 अगस्त को विश्व अंगदान दिवस के मौके पर सामने आई यह कहानी चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द का भी संदेश देती है। किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे दोनों मरीजों को इस स्वैप ट्रांसप्लांट के जरिए नई जिंदगी मिली। अपने परिजन को नहीं दे सके, फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी दोनों मरीजों के परिवार के सदस्य किडनी दान करने के लिए तैयार थे। जांच के बाद सामने आया कि दाताओं की किडनी अपने-अपने परिजन के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसे मामलों में किडनी स्वैप ट्रांसप्लांट मरीजों के लिए उम्मीद का रास्ता बनता है। इसमें एक दाता दूसरे मरीज को किडनी देता है और दूसरे मरीज का दाता पहले मरीज को। दोनों परिवारों को पूरी प्रक्रिया, संभावित जोखिम और परिणामों के बारे में विस्तार से समझाया गया। सभी पहलुओं पर चर्चा के बाद दोनों परिवार इस अनोखे किडनी स्वैप के लिए तैयार हो गए। इसके बाद चिकित्सकीय जांच और आवश्यक तैयारियां पूरी की गईं। एक साथ हुए दोनों ट्रांसप्लांट दोनों मरीजों के ट्रांसप्लांट 9 जुलाई को शहर के एक निजी अस्पताल में एक साथ किए गए। यह प्रक्रिया इसलिए भी चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि दोनों ट्रांसप्लांट का आपसी समन्वय बेहद जरूरी था। डॉक्टरों और विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम ने पूरी प्रक्रिया की सावधानीपूर्वक योजना बनाई। ट्रांसप्लांट टीम का नेतृत्व डॉ. सोनल दलाल, डॉ. जावेद वकील, डॉ. केतन शुक्ला सहित अन्य ने किया। अस्पताल के क्लिनिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. सुधीर मोराड ने कहा कि जब कोई इच्छुक दाता चिकित्सकीय असंगति के कारण अपने परिजन को सीधे किडनी नहीं दे पाता, तब किडनी स्वैप ट्रांसप्लांट मरीजों को जीवन का दूसरा अवसर दे सकता है। मरीजों की बेहतर स्थिति ट्रांसप्लांट के बाद दोनों मरीजों की हालत में उल्लेखनीय सुधार हुआ। दोनों दाता भी स्वस्थ रहे और रिकवरी के बाद उन्हें भी छुट्टी दे दी गई। 18 जुलाई को सभी मरीजों और दाताओं को सफलतापूर्वक डिस्चार्ज कर दिया गया। चिकित्सकों का कहना है कि दोनों मरीजों की किडनी की जांच करने पर उचित परिणाम आए हैं।