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जस्टिस यशवंत वर्मा पर चलेगा महाभियोग: जांच कमेटी ने अधजली नकदी कांड में पाया दोषी, रिपोर्ट संसद में पेश

जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि जस्टिस वर्मा अपने सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिली भारी नकदी और उसके स्वामित्व को लेकर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में पूरी तरह विफल रहे.
समिति ने वर्मा के स्पष्टीकरण को बताया टालमटोल वाला और असंतोषजनक
जांच समिति के अनुसार, जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया स्पष्टीकरण टालमटोल वाला, असंतोषजनक था. समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी टिप्पणी की है कि घटना के समय घटनास्थल से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित या संरक्षित नहीं किया गया और आवास के स्टोर रूम में फेरबदल की गई थी.
मार्च 2025 में हुआ था घटना का खुलासा
यह मामला 14 मार्च 2025 की रात का है, जब दिल्ली स्थित उनके तत्कालीन सरकारी आवास में अचानक आग लग गई थी. आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को एक स्टोर रूम से नोटों की अधजली गड्डियां मिली थीं. विवाद बढ़ने के बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर दिया गया था. तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति ने भी अपनी जांच में पाया था कि जस्टिस वर्मा का उस स्टोर रूम पर "सक्रिय या मौन नियंत्रण" था.
महाभियोग और जांच समिति का गठन
मामले की गंभीरता को देखते हुए जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे. इसके बाद, 12 अगस्त 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था. इस समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष को सौंपी थी.
पद से दे चुके हैं इस्तीफा
संसद द्वारा पद से हटाए जाने की महाभियोग कार्यवाही के बीच जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से अपना इस्तीफा दे दिया है. उनके इस्तीफे की अधिसूचना अभी कानून मंत्रालय द्वारा जारी की जानी बाकी है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट के पूर्व फैसलों के अनुसार जब कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंप देता है और उसकी प्रति सार्वजनिक हो जाती है, तो इस्तीफा प्रभावी मान लिया जाता है. इसके लिए राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति की प्रतीक्षा आवश्यक नहीं होती. इस्तीफा देने के कारण उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अब व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गई है.
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