यूपी में 2017 से 2022 के दौरान लोक निर्माण विभाग (PWD) ने ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर खोलने के बाद काम की लागत बढ़ा दी। इतना ही नहीं, चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए सिंगल टेंडर पर भी काम आवंटित कर दिए। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। CAG ने प्रदेश की शिक्षा और स्वास्थ व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। नियमानुसार, टेंडर खोलने के बाद काम की मात्रा और लागत में कोई बदलाव नहीं किया जाता है। CAG का मानना है कि ऐसा करने से निविदा प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। CAG ने पाया कि 15 ठेकों के लिए कुल 305.79 करोड़ के टेंडर आमंत्रित किए गए थे। टेंडर खुलने के बाद और उसको अंतिम रूप देने से पहले टेंडर्स में 50 से 83 फीसदी तक बदलाव कर दिया गया। इससे 189 करोड़ रुपए का टेंडर रिवाइज हुआ। CAG ने यह भी खुलासा किया है कि सड़क निर्माण कार्य में 140 करोड़ के बदलाव की इजाजत दी गई। इनमें ग्रेन्युलर सब बेस, वेट मिक्स मैकडम, डेंस बिटुमनिस मैकडम (निर्माण सामग्री) जैसी मूलभूत एवं आवश्यक मदों को हटाना शामिल था। बाद में उसी कॉन्ट्रैक्ट में इन्हें अतिरिक्त मदों के रूप में शामिल किया गया। काम की लागत बढ़ने के बाद भी ठेकेदारों से परफॉरमेंस सिक्योरिटी की राशि 9.46 करोड़ रुपए बढ़ाकर नहीं ली गई। CAG ने साफ किया है कि टेंडर में बदलाव करने के बाद विभाग को नए सिरे से फिर निविदा आमंत्रित करनी चाहिए थी। लेकिन, ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा नहीं किया गया। शासन ने अपने जवाब में कहा है कि पीडब्ल्यूडी की ओर से मदवार मूल्य आधारित निविदा आमंत्रित नहीं की जाती है, बल्कि प्रतिशत आधारित निविदा आमंत्रित की जाती है। लेकिन, CAG ने साफ किया है कि विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि टेंडर खुलने के बाद बिल ऑफ क्वांटिटी में कोई बदलाव नहीं किया जाए। मजदूरों की जान से खेल रहे ठेकेदार
CAG ने खुलासा किया है कि PWD के ठेकेदार निर्माण कराने के दौरान श्रमिकों की जान से खेल रहे हैं। निर्माण के दौरान कई तरह के जोखिम होते हैं। ऐसे में नियमानुसार श्रमिकों का बीमा कराना जरूरी है। बीमा पॉलिसी और प्रमाणपत्र कार्य शुरू होने से पहले और पूरा होने के बाद संबंधित अभियंता को देना अनिवार्य है। लेकिन, CAG ने पाया कि ज्यादातर जगह ठेकेदार बीमा कवर नहीं दे रहे। वहीं, नियमानुसार PWD बिना ठोस वजह और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति के सिंगल टेंडर पर काम आवंटित नहीं कर सकता। लेकिन, PWD ने सिंगल टेंडर पर भी काम आवंटित कर दिए। 8 साल में बढ़ा 60 हजार किलोमीटर सड़कों का जाल
यूपी में 2017 से 2023 तक राष्ट्रीय राजमार्ग से लेकर ग्रामीण मार्ग की सड़कों में 60 हजार किलोमीटर का इजाफा हुआ है। 2027 में यूपी में कुल सड़कों की लंबाई 2,39,643 किलोमीटर थी। ये 2023 में बढ़कर 2,98,242 किलोमीटर हो गई है। सैफई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम पर भी सवाल
CAG ने 347 करोड़ की लागत से सैफई में बने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का उपयोग नहीं होने पर भी सवाल खड़ा किया है। CAG का मानना है कि राजकीय निर्माण निगम ने जून- 2020 में स्टेडियम का निर्माण पूरा कर लिया था। उसके बाद भी सैफई स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर का कोई क्रिकेट मैच नहीं हुआ। इतना ही नहीं, खेल विभाग ने सैफई स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच कराने के लिए बीसीसीआई से कोई अनुबंध भी नहीं किया। इस पर शासन ने जवाब दिया कि स्टेडियम का उपयोग सैफई कॉलेज के क्रिकेट खिलाड़ी कर रहे हैं। CAG ने जवाब को नकारते करते हुए कहा है कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम का निर्माण उचित प्रतीत नहीं हो रहा है। स्विमिंग पूल भी उजाड़ हो गया
CAG ने खुलासा किया है कि सैफई में मेजर ध्यानचंद स्पोर्ट्स कॉलेज में 207.96 करोड़ की लागत से बना स्विमिंग पूल भी बिना इस्तेमाल किए ही उजाड़ हो गया। राजकीय निर्माण निगम ने स्विमिंग पूल 2020 में ही खेल विभाग को ट्रांसफर कर दिया था। निगम ने स्विमिंग पूल निर्माण की अवधि में 1.25 करोड़ रुपए के बकाया बिजली के बिल का भुगतान भी नहीं किया। ऊर्जा विभाग ने बिजली कनेक्शन काट दिया। इससे स्विमिंग पूल संचालित नहीं हो सका। ट्रेनर्स की भी बेहद कमी
CAG ने खुलासा किया कि प्रशिक्षु खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देने के लिए यूपी में स्थायी और अंशकालिक ट्रेनर्स की भी बेहद कमी है। स्थायी ट्रेनर्स की 79 फीसदी और अंशकालिक ट्रेनर्स की 271 फीसदी कमी है। महिला प्रशिक्षकों की भी कमी है। स्थायी ट्रेनर स्वीकृत पद 209 हैं, जबकि यहां सिर्फ 130 ट्रेनर हैं। इसी तरह से अंशकालिक ट्रेनर के स्वीकृत पत 450 हैं, लेकिन 179 ही कार्यरत हैं। लखनऊ में नहीं बन सका वेलोड्रोम स्टेडियम
सपा सरकार के समय 2015 में लखनऊ के गुरु गोविंद सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज में वेलोड्रोम स्टेडियम के निर्माण को मंजूरी दी गई थी। इसका उद्देश्य प्रतिभावान साइकिलिस्ट खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण देना था। 158 करोड़ की लागत से बनने वाले इस स्टेडियम का काम 2015 में शुरू हुआ। सरकार ने इसके लिए 60 करोड़ रुपए राशि जारी की। इसमें से 51.56 करोड़ रुपए खर्च भी हो गए। लेकिन, सरकार ने 2023 में प्रदेश में साइकिल सवारों की संख्या बहुत कम बताते हुए स्टेडियम का निर्माण बंद कर दिया। सरकार ने वेलोड्रोम स्टेडियम को इंडोर सिंथेटिक स्टेडियम के रूप में बदलने करने का प्रस्ताव दिया। इससे न तो वेलोड्रोम स्टेडियम बन सका, न ही सिंथेटिक स्टेडियम बना। सरकार के 51.56 करोड़ रुपए खर्च हुए, लेकिन उसका फायदा खिलाड़ियों को नहीं मिला। खेल नीति की कमी से प्रयास औपचारिक रहे
CAG ने माना है कि यूपी में 2016 से 2022 तक राज्य खेल नीति के अभाव में खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए उठाए गए कदम औपचारिक साबित हुए। उत्कृष्टता हासिल करने के लिए खेल विधाओं की प्राथमिकता तय नहीं थी। शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कम
CAG ने माना है कि 2016 से लेकर 2024 तक शिक्षा और स्वास्थ पर खर्च में लगातार कमी हुई है। शिक्षा पर व्यय का कुल खर्च अनुपात साल 2019-20 में 15.34 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 13.16 प्रतिशत हो गया। दोनों सालों के दौरान यह सामान्य श्रेणी के राज्यों के औसत से कम था। इसी तरह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण पर व्यय का कुल व्यय से अनुपात 2019-20 में 5.53 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 5.27 प्रतिशत हो गया। यह भी इसी अवधि में सामान्य श्रेणी के राज्यों के औसत से कम था। इसमें बताया गया कि 2019-20 और 2023-24 के दौरान राज्य सरकार के कुल व्यय का जीएसडीपी से अनुपात सामान्य श्रेणी के राज्यों के औसत की तुलना में अधिक था। ————————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी में CAG रिपोर्ट में बड़े खुलासे, कचरा निपटान से लेकर सड़क निर्माण तक में गड़बड़ियां, सरकार को करोड़ों की चपत लगी यूपी में शासन से लेकर जिला स्तर तक विभागों ने ठोस कचरा प्रबंधन से लेकर सड़कों के निर्माण तक में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं और नियम-कायदों के अनदेखी की है। बजट पास होने के बाद भी उसे जारी करने में देरी से सरकार को करोड़ों रुपए की चपत लगी। आम जनता को स्वच्छ भारत मिशन का पूरा फायदा नहीं मिला। पढ़ें पूरी खबर
यूपी में PWD ने ठेकेदारों को पहुंचाया फायदा, बढ़ाए एस्टीमेट:CAG ने सैफई स्टेडियम समेत, शिक्षा-स्वास्थ्य पर भी उठाए सवाल
