आज जब समूचा राष्ट्र नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाकर उनकी वीरता को नमन कर रहा है, वहीं हरियाणा के 287 परिवारों की आंखों में आज भी न्याय का इंतजार है। विडंबना देखिए कि जिन वीरों ने नेताजी के एक आह्वान पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, आजादी के सात दशक बाद भी उनका नाम सरकारी दस्तावेजों में ‘स्वतंत्रता सेनानी’ के रूप में दर्ज होने के लिए भटक रहा है। दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि मुख्य सचिव कार्यालय द्वारा प्रदेश के सभी जिलों में डीसी को 7 सालों से लगातार रिमाइंडर पत्र भेजे जा रहे हैं। राष्ट्रीय अभिलेखागार से आजाद हिंद फौज के गुमनाम सिपाहियों की सूची प्राप्त हो चुकी है, लेकिन जिला प्रशासन इन परिवारों की पहचान करने और जांच रिपोर्ट भेजने में सुस्ती बरत रहा है। श्रीभगवान फोगाट लगातार कर रहे संघर्ष
दादरी के स्वर्गीय राम सिंह फोगाट के बेटे श्रीभगवान फोगाट ने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से 287 ऐसे गुमनाम शहीदों का रिकॉर्ड ढूंढ निकाला है जिन्हें सरकार भूल चुकी थी। उनके इस संघर्ष के चलते पिछले साल 23 जनवरी 2025 को एक परिवार को ‘स्वतंत्रता सेनानी सर्टिफिकेट’ मिला था। हालांकि, झज्जर, रोहतक, गुरुग्राम, हिसार और भिवानी जैसे जिलों के सैकड़ों मामले अभी भी लंबित हैं। परिजनों का कहना है कि इनमें से अधिकतर सैनिक कम उम्र में ही शहीद हो गए थे और अविवाहित थे। उनके परिवारों की मांग पेंशन की नहीं, बल्कि सम्मान की है। मां की पेंशन बनवाए गए तो पता चला रेवाड़ी के श्रीभगवान फोगाट ने दैनिक भास्कर एप को बताया कि वह 2012 में अपनी मां का पेंशन का रिकॉर्ड बनवाने के लिए गए थे। उनके पिता स्वर्गीय राम सिंह फोगाट आजाद हिंद फौज में सिपाही थे और उनका निधन 1996 में हुआ था। जब वह मां की पेंशन बनवाने गए तो उनको पुराने डॉक्यूमेंट की जरूरत पड़ी। जब वे पुराने दस्तावेज खंगाल रहे थे तो उनको बाकि गुमनाम शहीदों के बारे में जानकारी हाथ लगी ऐसे करते-करते 14 साल से वह गुमनाम शहीदों को उनका हक दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। श्रीभगवान फोगाट ने बताया कि दादरी में करीब 35, झज्जर के 35, रेवाड़ी के 20, गुरुग्राम के 25 और हिसार के 28 शहीद ऐसे हैं जिनको सम्मान नहीं मिला है। इसी तरह हरियाणा में इनकी संख्या 287 हैं। सरकार को इन नामों को गौरव पट्टों पर लिखवाने चाहिए। इन जिलों के जांबाज अब भी गुमनाम
आजाद हिंद फौज के इन शहीदों का संबंध मुख्य रूप से हिसार (जेवरा, राजली, ठसका, ढांढ), फतेहाबाद, सिरसा, भिवानी, चरखी दादरी और रेवाड़ी बेल्ट से है। रिसाल सिंह, हरके राम, मुंशी सिंह जैसे अनेक नाम हैं जिनकी कुर्बानियों पर आज प्रशासन की ‘कुंडली’ भारी पड़ रही है। श्रीभगवान फोगाट ने बताया कि जब मुख्य सचिव कार्यालय द्वारा बार-बार पत्र लिखे जा रहे हैं, तो जिला कलेक्टर स्तर पर इन रिपोर्टों को भेजने में सालों की देरी क्यों हो रही है? क्या पराक्रम दिवस सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा या इन गुमनाम नायकों को उनका वाजिब हक मिलेगा? इतिहास के पन्नों में कैद ‘आजाद हिंद फौज’ की अनसुनी कुर्बानियां… 1. सिंगापुर की जेलों से शहादत तक का सफर: रिसाल सिंह (जेवरा)
हिसार के जेवरा गांव के जांबाज रिसाल सिंह की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। वे 21 फरवरी 1982 को सेना में भर्ती हुए थे और हांगकांग व सिंगापुर में रॉयल आर्टिलरी में तैनात थे। 15 फरवरी 1942 को दुश्मनों ने उन्हें बंदी बना लिया। वे 11 अगस्त 1944 को ‘प्रिजनर ऑफ वार’ (युद्धबंदी) के तौर पर शहीद हो गए। दशकों बाद भी उनके परिवार को सम्मान के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। 2. पेंशन नहीं, पहचान की जंग: राजली की विधवा का संघर्ष
राजली गांव के शहीद हरके राम का नाम INA की सूची में होने के बावजूद, उनकी विधवा फूलपति ने 1972 में पेंशन के लिए आवेदन किया था। प्रशासन ने यह कहकर फाइल ठंडे बस्ते में डाल दी कि ‘रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है’। इसी गांव के देशराज और मुंशी सिंह भी आजाद हिंद फौज के सिपाही रहे, लेकिन उनके परिवारों को सम्मान के नाम पर केवल निराशा हाथ लगी। 3. वे जिले जहां से गूंजी थी नेताजी की हुंकार
हिसार के जेवरा के रिसाल सिंह, राजली के हरके राम, मुंशी सिंह, नियाना के भगवान सिंह, उजाला राम, और खानपुर के अमर सिंह जैसे वीरों ने अपनी आहुति दी। वहीं फतेहाबाद के जाखल के नारायण सिंह, मंदोरी के सुरजा राम और खबरा कलां के रामजी लाल का नाम आज भी सरकारी मुहर का इंतजार कर रहा है। इसके अलावा भिवानी व दादरी के तालु गांव के छोटूराम, कैरू के जयराम और बदवा के काना राम जैसे अनगिनत नौजवान अविवाहित ही शहीद हो गए, जिससे आज उनके नाम को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं बचा। आजादी की लड़ाई में नेताजी ने निभाई थी अहम भूमिका आजादी की लड़ाई में नेताजी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और कई बार जेल गए थे। 1940 में अंग्रेजों ने नेताजी को कलकत्ता में उनके घर पर नजरबंद कर दिया था। कड़े पहरे के बावजूद वे 26 जनवरी 1941 को कैद से भाग निकले और काबुल और मास्को के रास्ते होते हुए अप्रैल में हिटलर के शासन वाले जर्मनी पहुंच गए। जापान के साउथ ईस्ट एशिया पर हमले के बाद बोस मई 1943 में जापान पहुंचे। जुलाई 1943 में उन्होंने आजाद हिंद फौज की कमान संभाली। 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने भारत की पहली स्वतंत्र अस्थाई सरकार के गठन का ऐलान कर दिया। 1944 में आजाद हिंद फौज के सैनिकों को संबोधित करते हुए नेताजी ने प्रसिद्ध नारा दिया था, ‘’तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’’
हरियाणा में नेताजी के 287 ‘फौजी’ आज भी गुमनाम:डीसी कार्यालयों में धूल फांक रही फाइलें; सम्मान की लड़ाई तोड़ रही दम
