सपा के 12 नेता अपने बेटे-बेटियों के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव के टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। इनमें सपा के कद्दावर नेता रहे बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा भी शामिल हैं। सपा का गढ़ मानी जाने वाली कटेहरी सीट पर भी सांसद लालजी वर्मा अपनी बेटी के लिए दावेदारी कर रहे हैं। वहीं, बीमार चल रहे रामगोविंद अब अपने बेटे को बांसडीह सीट से विधायक बनाना चाहते हैं। इस कतार में तूफानी सरोज भी शामिल हैं, वो बेटी प्रिया सरोज को राजनीति में फिट करने के बाद अब बेटे के टिकट की पैरवी कर रहे हैं। ये नेता पिछले कुछ महीनों में अखिलेश यादव से मुलाकात कर चुके हैं। कई तो अपने-अपने क्षेत्रों में बेटे-बेटियों के साथ प्रचार करके माहौल भी बनाने लगे हैं। जिससे जब पार्टी के सर्वे हो, तब उनकी दावेदारी मजबूत दिखाई दे। ये नेता कौन-कौन हैं? क्या उनके परिवार के दो या उससे ज्यादा सदस्य पहले से किसी न किसी सदन का हिस्सा हैं? इस रिपोर्ट में जानते हैं… 12 नेताओं की सियासी वारिस की चिंता जानिए बेटे के लिए सीट सुरक्षित करना चाहते हैं फरीद
बाराबंकी की रामनगर सीट से विधायक फरीद महफूज किदवई अखिलेश यादव सरकार (2012-2017) में मंत्री रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने तकनीकी शिक्षा, वन और खेल समेत कई विभागों की जिम्मेदारी संभाली। अब वे अपनी सियासी विरासत आगे बढ़ाने के लिए बेटे फैजान किदवई को चुनाव लड़वाना चाहते हैं। इसके लिए क्षेत्र में फैजान के नाम पर प्रचार भी शुरू कर चुके हैं। फैजान बॉलीवुड एक्टर भी हैं। बेटे के लिए दोबारा टिकट मांग रहे अवधेश
अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद अपने बेटे अजीत प्रसाद के लिए मिल्कीपुर सीट से टिकट की डिमांड कर रहे हैं। फरवरी, 2025 में हुए मिल्कीपुर उपचुनाव में सपा कैंडिडेट अजीत प्रसाद को भाजपा के चंद्रभानु पासवान ने 61,710 मतों से हराया था। यह हार इसलिए भी बड़ी मानी गई, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में अवधेश प्रसाद ने इसी क्षेत्र से बढ़त लेकर अयोध्या (फैजाबाद) सीट पर जीत दर्ज की थी। उपचुनाव में हार के बावजूद अवधेश प्रसाद अपनी राजनीतिक विरासत अजीत प्रसाद को ही सौंपने पर अड़े हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए वे अभी से ही क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं। अवधेश प्रसाद मिल्कीपुर से 9 बार विधायक रह चुके हैं। बेटी के टिकट के लिए राकेश की पैरवी
बाराबंकी में सपा के कद्दावर नेता रहे बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा कुर्सी सीट से विधायक रह चुके हैं। वे अखिलेश सरकार में राज्यमंत्री भी रहे हैं। पिता की विरासत संभालने के बाद अब वो अपनी बेटी श्रेया वर्मा को राजनीति में उतारना चाहते हैं। ऐसी कोशिश वो 2024 के लोकसभा चुनाव में भी कर चुके हैं। श्रेया गोंडा से चुनाव लड़ चुकी हैं, उन्हें 4.28 लाख वोट मिले थे। लेकिन, 46 हजार वोटों से हार गई थीं। अब राकेश वर्मा 2027 के चुनाव में भी उन्हें कुर्सी सीट से विधायक का चुनाव लड़वाना चाहते हैं। लालजी वर्मा डॉक्टर बेटी को विधायक बनाना चाहते हैं
लालजी वर्मा अंबेडकरनगर से सपा सांसद हैं। 2022 के चुनाव में वे कटेहरी विधानसभा से चुनाव जीतकर विधायक बने थे। अखिलेश यादव ने उन्हें 2024 में लोकसभा का टिकट दिया था। वो चुनाव जीतकर सांसद बन गए। उपचुनाव में उनकी पत्नी शोभावती वर्मा सपा के टिकट पर चुनाव लड़ी थीं और उन्हें जीत मिली थी। इस बार लालजी वर्मा अपनी बेटी छाया वर्मा को विधानसभा में देखना चाहते हैं। छाया वर्मा पेशे से डॉक्टर (नेत्र रोग विशेषज्ञ) हैं। 8 बार के विधायक राम गोविंद बेटे को सौंपना चाहते हैं विरासत
बलिया की बांसडीह से 8 बार विधायक रह चुके राम गोविंद चौधरी अब अपने बेटे रंजीत को राजनीतिक विरासत सौंपना चाहते हैं। विधानसभा चुनाव 2022 में बांसडीह सीट से हार गए थे। केतकी सिंह ने उन्हें हराया था। राम गोविंद चौधरी 2017 से 2022 तक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। लंबे समय से वे बीमार भी चल रहे हैं, इसलिए वे अब अपने बेटे के लिए टिकट मांग रहे हैं। इसकी पैरवी वे अखिलेश यादव से भी कर चुके हैं। प्रिया सरोज के बाद बेटे को राजनीति में उतारने की तैयारी
तूफानी सरोज मछलीशहर से सांसद रह चुके हैं। वर्तमान में केराकत से विधायक हैं। उनकी बेटी प्रिया सरोज मछलीशहर से सांसद हैं। वह उनकी सियासी विरासत संभाल रही हैं। उनकी शादी क्रिकेटर रिंकू सिंह से तय है। अब तूफानी सरोज अपने बेटे धनंजय को भी राजनीति में उतारने की तैयारी कर रहे हैं। धनंजय पेशे से एडवोकेट हैं और कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं। बेटे के लिए टिकट की दावेदारी
राजेंद्र यादव लखनऊ की बख्शी का तालाब (BKT) सीट से दो बार विधायक रहे हैं। अब वे अपनी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह से शिवेंद्र के पीछे खड़े हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में शिवेंद्र यादव को सपा की ओर से लगभग तय उम्मीदवार माना जा रहा था। उनका नाम चर्चा में भी था। अंतिम समय में रणनीतिक कारणों से पार्टी ने उनका टिकट काटकर गोमती यादव को मैदान में उतारा था। गोमती यादव को सपा ने 2012 में यहां से चुनाव जितवाया था। लेकिन, 2022 में वह भाजपा के योगेश शुक्ला से हार गए थे। शिवेंद्र क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे हैं। बख्शी का तालाब में पिछले दो चुनावों (2017 और 2022) में सपा को हार का सामना करना पड़ा है। अंबिका चाहते हैं बेटे को टिकट मिले
अंबिका चौधरी की गिनती सपा के वरिष्ठ नेताओं में होती है। अंबिका चौधरी मुलायम सिंह यादव के भरोसेमंद नेताओं में थे। वे सपा सरकार में राजस्व और पिछड़ा वर्ग कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रह चुके हैं। अखिलेश और शिवपाल यादव के बीच पारिवारिक कलह के दौरान अंबिका चौधरी ने 2017 में बसपा का दामन थाम लिया था। उन्होंने बसपा के टिकट पर फेफना विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा, लेकिन हार गए थे। अगस्त, 2021 में वे फिर से सपा में शामिल हो गए। इसकी नींव उनके बेटे आनंद चौधरी के जरिए ही पड़ी थी। आनंद चौधरी ने सपा के समर्थन से बलिया जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीता था। अंबिका चौधरी अब अपनी विरासत आनंद चौधरी को सौंपने की तैयारी में हैं। चर्चा है कि वे 2027 के विधानसभा चुनाव में आनंद के लिए बलिया की किसी प्रमुख सीट (संभवतः फेफना या बलिया सदर) से टिकट चाहते हैं। बेटे के लिए सीट छोड़ने की तैयारी
आलम बदी 90 साल की उम्र में भी स्कूटर से विधानसभा पहुंचकर सबको चौंका देते हैं। आजमगढ़ की निजामाबाद सीट से लगातार जीतना उनकी जमीनी पकड़ का सबूत है। अब वो उनके बेटे मुज्तेबा आलम उर्फ बाबू को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं। दरअसल, आलम बदी ने निजामाबाद सीट को सपा का अभेद्य किला बना दिया है। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य कारणों को देखते हुए वे अपने बेटे मुज्तेबा आलम को विरासत सौंपना चाहते हैं। मुज्तेबा आलम पहले से ही क्षेत्र में सक्रिय हैं। संगठन के स्तर पर उनके लिए माहौल बनाया जा रहा है। हालांकि, आलम बदी ने अभी हाईकमान से बात नहीं की है। बेटे को सदन तक पहुंचाने की कोशिश
दुर्गा प्रसाद यादव आजमगढ़ सदर सीट से लगातार 9 बार के विधायक रह चुके हैं। उनकी अखिलेश यादव से निकटता जगजाहिर है। उन्होंने अपने बेटे विजय यादव को आजमगढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचाया।
अब विजय पूरी तरह से पॉलिटिक्स में एक्टिव हैं। चर्चा है कि दुर्गा प्रसाद यादव अपनी पारंपरिक ‘आजमगढ़ सदर’ सीट अपने बेटे विजय यादव के लिए छोड़ सकते हैं। बढ़ती उम्र और बदले राजनीतिक परिवेश में वे चाहते हैं कि उनके रहते ही विजय अपनी सीट सुरक्षित कर लें। संभल के सपा विधायक बेटे को चुनाव लड़ाएंगे
संभल के कद्दावर नेता और सपा विधायक नवाब इकबाल महमूद अपने बेटे सुहैल इकबाल महमूद को 2027 के चुनाव के लिए आगे बढ़ाना चाहते हैं। नवाब इकबाल 7 बार विधायक रह चुके हैं। नवाब इकबाल महमूद ने अक्टूबर, 2025 में मुलायम सिंह यादव की पुण्यतिथि पर हुए कार्यक्रम में यह संकेत दिया कि वे अब राजनीति से आराम लेकर अपनी विरासत बेटे सुहैल को सौंपना चाहते हैं। इस दौरान उन्होंने कार्यकर्ताओं से सुझाव मांगे और सुहैल को 2027 के चुनावी मैदान में उतारने की बात कही। जिस पर समर्थकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। इधर, सुहैल इकबाल लंबे समय से अपने पिता के चुनाव प्रबंधन और क्षेत्र की समस्याओं को सुलझाने में सक्रिय रहे हैं। सुहैल हाल के दिनों में तब चर्चा में आए, जब उनका नाम नवंबर, 2024 में हुई संभल हिंसा से जुड़ी जांच में सामने आया। उन्हें इस मामले में SIT के सामने पेश होकर अपना बयान भी दर्ज कराना पड़ा। हालांकि, नवाब इकबाल महमूद इसे एक ‘राजनीतिक साजिश’ करार देते रहे हैं। बेटे के लिए छोटे देंगे अपनी सुरक्षित सीट
अमरोहा के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री महबूब अली अब अपने बेटे परवेज अली को विधानसभा चुनाव के लिए तैयार कर रहे हैं। परवेज अली 2016 से 2022 तक मुरादाबाद-बिजनौर निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी रह चुके हैं। महबूब अली 2002 से लगातार अमरोहा सीट से विधायक हैं। वे सपा सरकार में माध्यमिक शिक्षा और रेशम उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रह चुके हैं। राजनीति में लंबी पारी खेलने के बाद महबूब अली अब चाहते हैं कि परवेज अली सीधे जनता के बीच से चुनकर विधानसभा पहुंचें। माना जा रहा है कि वे 2027 के लिए या तो अपनी सुरक्षित सीट छोड़ सकते हैं या परवेज के लिए आसपास की किसी अनुकूल सीट की पैरवी कर रहे हैं। वो मामले, जहां बेटे खुद अपनी पैरवी कर रहे राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की तैयारी
संतकबीरनगर की राजनीति में स्व. भालचंद्र यादव का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। भालचंद्र यादव दो बार खलीलाबाद (अब संत कबीरनगर) से सांसद रहे थे। उनकी क्षेत्र के पिछड़ा वर्ग और किसान राजनीति पर गहरी पकड़ थी। भालचंद्र का 2019 में निधन हो गया था। उनके बेटे सुबोध यादव 2027 पुराने समर्थकों को इकट्ठा करके सियासी जमीन तैयार कर रहे हैं। 2022 के चुनावों में सुबोध यादव आम आदमी पार्टी (AAP) के टिकट पर खलीलाबाद सीट से चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि, अब वे अपने ‘मूल घर’ यानी सपा के जरिए मुख्यधारा की राजनीति में वापसी की कोशिश में हैं। परिवार की सियासत को आगे बढ़ाने की कोशिश
बागपत के ऐतिहासिक ‘नवाब खानदान’ के वारिस अहमद हमीद अब अपने पिता स्व. कौकब हमीद की सियासी विरासत संभालने की कोशिश कर रहे हैं। अहमद के पिता कौकब हमीद खान 5 बार विधायक रहे और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। उनका प्रभाव केवल मुस्लिम समाज ही नहीं, जाट और अन्य बिरादरियों में भी रहा है। अहमद हमीद ने अब तक दो बार विधानसभा चुनाव लड़ा है। 2017 में वे बसपा के टिकट पर लड़े और दूसरे स्थान पर रहे। 2022 में उन्होंने रालोद (RLD) के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन बहुत कम अंतर से चुनाव हार गए थे। हाल ही में अहमद हमीद ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मुलाकात की। माना जा रहा है कि वे 2027 के लिए सपा के टिकट पर अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे हैं। इसके अलावा कई ऐसे विधायक या सांसद हैं, जिनके पिता सांसद या विधायक रह चुके हैं… —————————- यह खबर भी पढ़ें – अखिलेश संसद में बोले- मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण मिले, अमित शाह का जवाब- सारी टिकटें उन्हें दे दीजिए, हमें कोई आपत्ति नहीं लोकसभा में गुरुवार को महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े 3 बिल पेश किए गए। इसे लेकर सपा सांसदों और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच तीखी बहस हुई। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा- सरकार संविधान के विरोध में काम कर रही है। जब तक मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया जाएगा। तब इसका मतलब नहीं है। पढ़िए पूरी खबर…
बेटे-बेटियों को सेट कराना चाहते हैं 12 सपा नेता:विधानसभा चुनाव के टिकट के लिए पैरवी कर रहे; कई तो अखिलेश से मिले
