मेरठ दंगे में बशीर बद्र का घर जला दिया था:तब कहा था- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में

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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में… मेरठ में अपना जला घर देखने के बाद ये लाइनें उर्दू गजल के शहंशाह डॉ. बशीर बद्र ने कही थीं। 1987 के मेरठ दंगों में दंगाइयों ने उनके घर को आग के हवाले कर दिया था। यह डॉ. बशीर बद्र के लिए बेहद तकलीफदेह था। दोबारा शहर लौटने पर उन्होंने शायरी के जरिए अपना दर्द बयां किया था। डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार को 91 साल की उम्र में भोपाल में निधन हो गया। उनकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा यूपी से जुड़ा रहा। वह मूलरूप से अयोध्या के रहने वाले थे। जन्म कानपुर में हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पढ़ाई की। बाद में मेरठ कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर बने और 17 साल तक वहां सेवाएं दीं। फिर दंगे में घर जलने के बाद भोपाल चले गए। कानपुर में जन्म हुआ, पिता पुलिस में थे बशीर बद्र का असली नाम सैयद मुहम्मद बशीर था। उनका जन्म 15 फरवरी, 1935 को कानपुर में हुआ था। पैतृक गांव अयोध्या जिले का मौजा बकिया है। उनके पिता सैयद मुहम्मद नजीर पुलिस विभाग में नौकरी करते थे। बशीर बद्र ने कक्षा-3 तक कानपुर के हलीम मुस्लिम कॉलेज से पढ़ाई की। इसके बाद पिता का तबादला इटावा हो गया। वहां उन्होंने मुहम्मद सिद्दीक इस्लामिया कॉलेज से हाईस्कूल पास किया। तभी पिता का निधन होने से उनकी पढ़ाई रुक गई। घर की जिम्मेदारी उन पर आ गई। उन्हें 85 रुपए महीने की तनख्वाह पर पुलिस की नौकरी करनी पड़ी। इसी दौरान उनकी शादी कमर जहां से हो गई और उनके 3 बच्चे हुए। डॉ. बशीर बद्र को बचपन से ही शायरी का शौक था। 7वीं कक्षा में छपी थी पहली गजल जब बशीर बद्र 7वीं कक्षा में थे, तब उनकी एक गजल नियाज फतहपुरी की पत्रिका ‘निगार’ में छपी। जिससे इटावा के साहित्यिक हलकों में उनकी पहचान बन गई। 20 साल की उम्र तक उनकी गजलें भारत और पाकिस्तान की कई बड़ी पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। इसके बाद उन्होंने फिर से पढ़ाई करने का फैसला किया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए, एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल की। पीएचडी के दौरान उनके शोध निर्देशक प्रोफेसर आल-ए-अहमद सुरूर थे। उनका शोध विषय था- ‘आजादी के बाद उर्दू गजल का आलोचनात्मक अध्ययन’। बीए करने के बाद उन्होंने 1967 में पुलिस की नौकरी छोड़ दी। इसके बाद वे यूनिवर्सिटी की छात्रवृत्ति और मुशायरों से मिलने वाली आमदनी से घर चलाते रहे। 1974 में पीएचडी पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अस्थाई रूप से पढ़ाया। बशीर बद्र नौचंदी मेले में शायरी पढ़ते थे डॉ. बशीर बद्र के साथ मंच साझा करने वाले मेरठ के कवि पॉपुलर मेरठी भी उनके निधन पर काफी भावुक हो गए। वह बताते हैं- नौचंदी मेले में साल-1985 से हर साल पटेल मंडप में होने वाले सांस्कृतिक समारोह में बशीर साहब जरूर शायरी पढ़ते थे। फैज साहब, निदा फाजली जैसे नामचीन शायर उस दौर में नौचंदी मेले की शान हुआ करते थे। तब बशीर साहब का मंच पर अपना जलवा होता था। हमने उनके साथ कई विदेश यात्राएं की हैं, वहां मुशायरे किए हैं। आज उनका यूं जाना लग रहा है कि मेरा बड़ा भाई चला गया। बशीर बद्र को साहित्य में उनके योगदान के लिए 1999 में पद्मश्री से नवाजा गया था। उसी साल उन्हें प्रसिद्ध काव्य संग्रह ‘आस’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। पहली पत्नी का मोहल्ले वालों ने अंतिम संस्कार किया था AMU में पढ़ाने के बाद में उनकी नियुक्ति मेरठ कॉलेज में हो गई। फिर वह मेरठ के शास्त्रीनगर की विकास कॉलोनी के डी-ब्लॉक में 120 नंबर मकान में रहने लगे। मई, 1984 में जब वे एक मुशायरे के सिलसिले में पाकिस्तान गए थे, तभी उनकी पत्नी कमर जहां का निधन हो गया था। उनका अंतिम संस्कार मोहल्लेवालों ने किया था। इसके बाद 1986 में उन्होंने भोपाल की डॉक्टर राहत सुल्तान से दूसरी शादी की। मेरठ दंगों में जला घर, फिर भोपाल में बस गए मेरठ में अप्रैल, 1987 से ही दंगे शुरू हो गए थे, जो 3 महीने तक चलते रहे। इसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे। हिंसा की शुरुआत होते ही बशीर बद्र अपने किसी रिश्तेदार के यहां चले गए थे। घर में उनका छोटा बेटा बीनू था। घटना के दिन अचानक कॉलोनी के दक्षिण छोर से कुछ लोगों की भीड़ उनके घर में घुस आई। सुबह का समय था, इसलिए अधिकतर लोग अपने घरों के अंदर थे। बीनू उस समय घर के बाहर पार्क में था। भीड़ ने बशीर बद्र के घर पर हमला बोला दिया। घर के अंदर जमकर तोड़फोड़ की, फिर आग लगा दी। इसी दौरान कॉलोनी के लोग इकट्ठा हो गए। बशीर बद्र का घर बचाने के लिए उनके पड़ोसी उपद्रवियों से भिड़ गए और उनको वहां से भगा दिया था। बाद में जब शहर के हालात सामान्य हुए, तब बशीर बद्र परिवार के साथ वापस आए। लेकिन, वह घटना से बहुत आहत थे। एक साल तक यहां रहे, फिर 1988 में घर बेचकर भोपाल चले गए। घर जलने पर उन्होंने लिखा था- बड़े शौक से मेरा घर जला, कोई आंच तुझपे न आएगी।
ये जुबां किसी ने खरीद ली, ये कलम किसी का गुलाम है। बेखबर कुर्सियां आंख मलती रहीं।
बस्तियां बेगुनाहों की जलती रहीं। किसने जलाईं बस्तियां बाजार क्यों लुटे।
मैं चांद पर गया था, मुझे कुछ पता नहीं। ————————– ये खबर भी पढ़ें- शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन, याददाश्त चली गई थी, मुशायरे की याद आने पर इरशाद-इरशाद कहने लगते थे उर्दू ग़ज़ल के शहंशाह डॉ. बशीर बद्र (91) नहीं रहे। त्याग और बलिदान के पर्व को उन्होंने फानी दुनिया को अलविदा कहा। उर्दू अदब की रूह में समाए डॉ बशीर बद्र तक़रीबन 14 बरस से डिमेंशिया की गिरफ़्त में हैं, जिससे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई, मगर उनके शेर आज भी दिलों में धड़कते हैं। पढ़ें पूरी खबर