अखिलेश ने पूर्वांचल में राजभर-निषाद को साधा:अब वेस्ट यूपी में जाट और जाटव को साथ लाने की तैयारी; वोट बढ़ाने वाला नेता खोज रही

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समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी जातीय समीकरण की रणनीति को नया मोड़ दे रही है। पार्टी ने राजभर समाज की नेता सीमा राजभर को महिला सभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष और फूलन देवी की बहन रुक्मणी देवी निषाद को महिला सभा का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पूर्वांचल को साधने की कोशिश की है। अब सपा की निगाह पश्चिमी यूपी पर है। यह इलाका हमेशा से सपा की कमजोर कड़ी रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा यहां के 12 जिलों में एक भी सीट जीत नहीं पाई थी। जबकि, राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के साथ उसका गठबंधन था। यादव-मुस्लिम समीकरण भी यहां कुछ खास कमाल नहीं कर पाता। आखिर क्या है इसकी वजह, पढ़िए इस रिपोर्ट में… पहले जानिए सपा पश्चिमी यूपी में कमजोर क्यों… सीनियर जर्नलिस्ट राजेंद्र कुमार बताते हैं- पश्चिमी यूपी में करीब 15% जाट और 20% दलित हैं। भाजपा-रालोद गठबंधन जाटों पर पकड़ रखता है, जबकि बसपा और चंद्रशेखर जाटव-दलित पर मजबूत है। इसके अलावा 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा भी एक अहम वजह है। इसने जाट, गुर्जर, जाटव और मुस्लिम के बीच लंबी खाई पैदा की थी। मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण भी यहां खास असर नहीं दिखा पाता। जाट-गुर्जर-दलित समीकरण भाजपा के पक्ष में रहता है। इस बार सपा PDA फॉर्मूले के तहत गुर्जर, मुस्लिम, गैर-जाटव दलितों को जोड़ते हुए जाट-जाटव वोटबैंक में सेंधमारी करना चाहती है। खासकर ऐसे जिलों में, जहां भाजपा मजबूत है। यही वजह है कि सपा जाट और दलित समाज के ऐसे नेताओं की तलाश कर रही है, जो उसके लिए वोट बढ़वा सकें। 2022 में पश्चिम यूपी के 12 जिलों में सपा का खाता तक नहीं खुला सीनियर जर्नलिस्ट राजेंद्र कुमार बताते हैं- पश्चिमी यूपी में जाट और जाटव समाज सपा से दूर रहता आया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन की वजह से जाट सपा के साथ आए थे। तब पश्चिनी यूपी की 136 में 35 सीट सपा और 8 रालोद ने जीती थीं। बिना किसी गठबंधन के भाजपा करीब 69% यानी 93 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। बुलंदशहर, हापुड़, आगरा, मथुरा, एटा जैसे 12 जिलों में सपा का खाता तक नहीं खुला था। 2024 के लोकसभा चुनाव में रालोद के भाजपा के साथ जाने पर भाजपा की स्थित और मजबूत हो गई। पश्चिमी यूपी की 27 लोकसभा सीटों में से भाजपा-रालोद 15 और सपा 10 सीटें जीत पाई थी। इसी तरह जाटव (दलित) भी कभी सपा के साथ नहीं रहा। इस वोट पर हमेशा से मायावती का दबदबा रहा है। बसपा के कमजोर होने और चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी के मजबूत होने पर ये उसकी ओर शिफ्ट हो गया। वहीं, नॉन-जाटव दलितों का कुछ हिस्सा भाजपा की तरफ आ गया। लोकसभा चुनाव में सपा ने अयोध्या की तरह ही मेरठ की सामान्य सीट पर भी दलित उम्मीदवार को टिकट दिया था। अयोध्या में सपा को जीत मिली थी, लेकिन मेरठ सीट करीब 10 हजार वोटों से हार गई थी। अब विधानसभा चुनाव में सपा एक बार फिर पश्चिमी यूपी में ऐसा प्रयोग कर सकती है। हालांकि, अब मायावती मजबूत हो रही हैं। दलितों को अपने पाले में करने के लिए सभी पार्टियां दांव चल रही हैं। इसलिए सपा को ऐसे जाटव नेता की तलाश है, जो पूरे पश्चिमी यूपी में होल्ड रखता हो। अगर ऐसा नेता न भी मिले, तो कम से कम जिले में पहचान रखने वाले नेता को पार्टी में लाने की कोशिश की जा रही है। पूर्वांचल में सपा को 26 सीटों का फायदा पश्चिमी यूपी की अपेक्षा पूर्वांचल में सपा की स्थिति मजबूत दिखती है। इलाके की 102 विधानसभा सीटों में से सपा को 31 सीटें मिली थींं। तब ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा भी अखिलेश यादव के साथ थी। पार्टी ने 6 सीटें जीती थीं। भाजपा ने भले ही 53 सीटें जीती थीं, लेकिन गाजीपुर और आजमगढ़ में उसका खाता तक नहीं खुला था। 2024 के लोकसभा चुनाव तक ओमप्रकाश राजभर भाजपा के साथ आ गए थे। फिर भी सपा की स्थित काफी मजबूत रही थी। सपा ने कुल 21 लोकसभा सीटों में से 12 अकेले जीत ली थीं। इनके तहत 56 विधानसभा सीटें आती हैं। मतलब, सपा ने 2 साल के भीतर 26 सीटों पर बढ़त बना ली थी। वहीं, भाजपा ने 8 लोकसभा सीट जीती थीं। इनके तहत 41 विधानसभा सीटें आती हैं। मतलब, 2 साल में ही भाजपा 12 सीटों पर पिछड़ चुकी थी। यही वजह है कि सपा पूर्वांचल में अपनी स्थिति और मजबूत करने में जुटी है। इलाके में बड़ा राजनीतिक असर रखने वाली निषाद पार्टी और सुभासपा इस वक्त भाजपा के साथ हैं। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इसकी काट निकालने के लिए सपा ने सीमा राजभर को महिला सभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष और फूलन देवी की बहन रुक्मणी देवी निषाद को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। हालांकि, दोनों बड़े चेहरे नहीं हैं। फिर भी उन्हें पार्टी में अहम पद देकर सपा पिछड़े वर्ग की महिलाओं आगे बढ़ाने का संदेश देना चाह रही है। बिना गठबंधन पश्चिमी यूपी सपा के लिए बड़ी चुनौती अपने जातीय समीकरण के जरिए सपा की निगाह पश्चिमी यूपी की 136 सीटों पर है। 2022 में उसे रालोद का साथ मिला था। इस बार चुनौती अपने बल पर सीटें हासिल करने की है। यही वजह है, सपा पश्चिमी यूपी के दादरी से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कर चुकी है। पश्चिमी यूपी में जाट के अलावा एक और अहम वोटबैंक ‘गुर्जर’ समाज है। इसको साथ लाने के लिए सपा ने 29 मार्च को दादरी में ‘समाजवादी समता भाईचारा रैली’ की थी। पश्चिमी यूपी की अहमियत को देखते हुए सपा 25 अप्रैल को गाजियाबाद में ‘विजन इंडिया’ प्रोग्राम कर रही है। यह सपा का देशव्यापी युवा संपर्क अभियान है। अखिलेश यादव ने इसे 2027 चुनाव से पहले पार्टी का रोडमैप लोगों के सामने रखने के लिए शुरू किया है। मई के आखिर में नोएडा में भी इसी तरह का प्रोग्राम करने का प्लान है। चंद्रशेखर का साथ मिला तो बदल सकती है तस्वीर पश्चिमी यूपी की राजनीति को करीब से जानने वाले सीनियर जर्नलिस्ट रवींद्र सिंह राणा कहते हैं- अगर सपा चंद्रशेखर से गठबंधन कर लेती है, तो उसे काफी फायदा मिल सकता है। इसकी वजह यह है कि जाटवों का बड़ा वोटबैंक आज चंद्रशेखर के साथ है। बतौर जाट नेता सपा के पास हरेंद्र मलिक, पंकज मलिक और समरपाल सिंह हैं। अखिलेश यादव ने हाल के दिनों में युवा नेताओं को तरजीह देने की जो रणनीति अपनाई है, वो भी कारगर होती दिख रही है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कुछ दिन पर मेरठ के युवा जाट नेता सम्राट मलिक की जैकेट की तारीफ की। कुछ दिन बाद सम्राट वैसी ही जैकेट सिलवाकर लखनऊ पहुंच गए। अखिलेश ने उसे भी सार्वजनिक किया। इससे एक अलग तरह का मैसेज कम्युनिटी के साथ-साथ यूथ में भी गया। ———————— ये खबर भी पढ़ें… सपा का नारा PDA, 70% मुस्लिम-यादव जिलाध्यक्ष, अखिलेश को संगठन में क्यों किसी और पर भरोसा नहीं सपा को 2024 में PDA (पिछड़ा-दलित-मुस्लिम) के बलबूते यूपी की 80 में 37 लोकसभा सीटों पर सफलता मिली। माना गया कि सपा PDA को संगठन में आत्मसात कर राजनीति में नई लकीर खींचेगी। लेकिन, आज भी सपा के 97 जिलाध्यक्षों/महानगर अध्यक्षों में 70% यादव-मुस्लिम (MY) हैं। पूरी खबर पढ़ें…