‘ब्लाइंड-बाबू’ कार चलाते हैं…जो चल नहीं सकता,वो दौड़ रहा:MP में दिव्यांग कोटे के फर्जीवाड़े का खुलासा; मंत्री से लेकर सरकारी स्कूलों तक में लगे कर्मचारी

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मध्य प्रदेश में ऐसे सरकारी कर्मचारी हैं, जिन्होंने कागजों पर खुद को ‘दिव्यांग’ बताकर आरक्षण और नौकरी हासिल की, लेकिन असल जिंदगी में वे पूरी तरह फिट हैं। दैनिक भास्कर की पड़ताल में तीन मामले सामने आए हैं। इनमें दृष्टिबाधित कोटे से भर्ती बाबू कार चलाता मिला, जबकि पैरों से लाचार बताए गए शिक्षक रैलियों में दौड़ लगाते नजर आए। दृष्टिबाधित कोटे से भर्ती बाबू इस समय पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह के स्टाफ में शामिल है। उसकी दिव्यांगता को लेकर पहले भी शिकायतें हुईं, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। समाज कल्याण विभाग ने दो महीने पहले दिव्यांग कोटे से पदस्थ कर्मचारियों के प्रमाण पत्रों की जांच के आदेश दिए थे, लेकिन अब तक कार्रवाई नहीं हुई। विभाग के अफसरों का दावा है कि मप्र में दिव्यांग कोटे से भर्ती 80 फीसदी कर्मचारियों के सर्टिफिकेट फर्जी हैं। पढ़िए रिपोर्ट…
मामला 1: मंत्री के ‘ब्लाइंड बाबू’ की ड्राइविंग राजधानी भोपाल का यह मामला सबसे चौंकाने वाला है। सामान्य प्रशासन विभाग में सहायक ग्रेड-3 के पद पर पदस्थ अलकेश खाकरे पिछले 11 सालों से सरकारी सेवा में हैं। उनकी भर्ती 2014 में ‘ब्लाइंड कोटे’ के तहत सीधी भर्ती से हुई थी। पिछले चार साल से वे प्रतिनियुक्ति पर पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह के बंगले पर तैनात हैं। भास्कर की पड़ताल
नियमों के अनुसार 40% से अधिक दृष्टिदोष वाला व्यक्ति बिना सहायक के सामान्य काम नहीं कर सकता। लेकिन अलकेश की दिनचर्या अलग तस्वीर दिखाती है। भास्कर की टीम ने तुलसी नगर स्थित उनके सरकारी क्वार्टर पर नजर रखी। वहां अलकेश अपनी कार (MP 04 YK 6924) खुद चलाते हुए निकले। वे शिवाजी नगर होते हुए दुर्गा पेट्रोल पंप चौराहे पहुंचे और वहां से चार इमली स्थित मंत्री बंगले B-10 तक कार चलाकर गए। बंगले पर पहुंचने के बाद वे पैदल पहली मंजिल स्थित दफ्तर पहुंचे और दिनभर क्लेरिकल काम करते रहे। शिकायतें पहले भी हुईं, लेकिन रसूख के चलते फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी गईं। एक्सपर्ट बोले- सामान्य काम भी मुश्किल सीनियर आई स्पेशलिस्ट डॉ. राहुल अग्रवाल के अनुसार, 40% दृष्टिदोष वाला व्यक्ति सामान्य काम आंखों से देखकर नहीं कर सकता और उसे सहायक की जरूरत होती है। ऐसे व्यक्ति के लिए कार चलाना मुश्किल और जोखिम भरा है। उन्होंने ऐसे कर्मचारियों की हर साल मेडिकल जांच कराने की सलाह दी। मामला 2: रील बनाने के शौकीन ‘लाचार’ शिक्षक दूसरा मामला निवाड़ी जिले का है। यहां प्राथमिक विद्यालय, ब्याटा वार्ड नंबर-14 में पदस्थ शिक्षक राकेश तिवारी कागजों में ‘अस्थिबाधित’ हैं। उनके पास 2023-24 का प्रमाण पत्र है, जिसमें उन्हें 43% अस्थिबाधित दिव्यांग बताया गया है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इस स्थिति में व्यक्ति पैरों का इस्तेमाल कर सामान्य रूप से चलने-फिरने में असमर्थ होता है। हकीकत: मोटरसाइकिल से स्कूल जाते हैं राकेश आसानी से पैदल चलते-फिरते हैं और दोपहिया वाहन भी चलाते हैं और सोशल मीडिया पर रील भी बनाते हैं। उन्हें राजनीतिक रैलियों में तेजी से चलते देखा गया। भास्कर की टीम की पड़ताल में उनकी फुर्ती देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि वे पैरों से लाचार हैं। मामला 3: 43 फीसदी दिव्यांगता, फिर भी सक्रिय जिंदगी निवाड़ी जिले के एक अन्य शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला में पदस्थ शिक्षक रोहित शुक्ला का मामला भी ऐसा ही है। उनके पास 24 जून 2024 का प्रमाण पत्र है, जिसमें उन्हें 40% से अधिक दिव्यांग बताया गया है। मगर, रोहित शुक्ला मोटरसाइकिल चलाकर स्कूल जाते हैं। सामान्य व्यक्ति की तरह कामकाज करते हैं। इसी दिव्यांगता के आधार पर उन्हें सरकारी नौकरी मिली है। एक्सपर्ट बोले: 40 फीसदी दिव्यांगता वाला चल नहीं सकता एनएचएम के पूर्व डायरेक्टर डॉ. पंकज शुक्ला के अनुसार, लोकोमोटर डिसेबिलिटी हड्डियों, जोड़ों या मांसपेशियों की ऐसी अक्षमता है, जो मूवमेंट को बाधित करती है। 40% से अधिक दिव्यांगता वाला व्यक्ति आमतौर पर बिना सहारे या कठिनाई के चल नहीं सकता। यह सामान्य तौर पर देखने पर भी नजर आती है। यदि कोई व्यक्ति सामान्य तरीके से चल रहा है और प्रभावित अंग का पूरा उपयोग कर रहा है, तो स्थिति संदेहास्पद है। उन्होंने कहा कि सरकार को जॉइनिंग के समय संभागीय कमेटी से जांच करानी चाहिए। अफसर बोले- शिकायत मिलेगी तो कार्रवाई करेंगे निवाड़ी के जिला शिक्षा अधिकारी उन्मेश श्रीवास्तव ने कहा, दिव्यांग शिक्षकों को लेकर शिकायतें मिली हैं। हम नियमानुसार इसकी जांच कराएंगे। सामान्य प्रशासन विभाग के उपसचिव शैलेंद्र सिंह ने कहा, दृष्टिबाधित बाबू के मामले में फिलहाल कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। मामला सामने आने पर निश्चित रूप से जांच की जाएगी। समाज कल्याण विभाग का दावा: दिव्यांग कोटे से भर्ती 80 प्रतिशत कर्मचारी अपात्र सामाजिक न्याय विभाग ने 6 मार्च को स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिखकर फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्रों के सत्यापन और पुन: परीक्षण के निर्देश दिए थे। लेकिन दो महीने बाद भी कार्रवाई नहीं दिखी। हाल ही में फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र से नौकरी पाने वाले श्रम निरीक्षक नवनीत कुमार पांडेय को बर्खास्त किया गया है। इंदौर के श्रम आयुक्त संदीप जीआर ने नवनीत को तत्काल सेवा से पृथक करने और वेतन व अन्य भुगतानों की रिकवरी के निर्देश दिए हैं। विभाग का कहना है कि यह एक उदाहरण है और प्रदेश में ऐसे कई मामले हैं। निशक्तजन कल्याण विभाग के आयुक्त डॉ. अजय खेमरिया ने कहा, “मैं रिकार्ड पर कह सकता हूं कि प्रदेश में दिव्यांग सर्टिफिकेट से नौकरी हासिल करने वाले 80 प्रतिशत कर्मचारी अपात्र हैं।”