सपा का नारा PDA, 70% मुस्लिम-यादव जिलाध्यक्ष:अखिलेश को संगठन में क्यों किसी और पर भरोसा नहीं

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सपा 2022 में यूपी की सत्ता की दौड़ में पिछड़ने के बाद से PDA (पिछड़ा-दलित-मुस्लिम) का नारा दे रही है। 2024 में उसे इस नारे के बलबूते यूपी की 80 लोकसभा सीटों में 37 पर सफलता मिली। उसके साथ गठबंधन में लड़ी कांग्रेस के भी 6 सदस्य जीतने में सफल रहे थे। तब माना गया था कि सपा PDA को संगठन में आत्मसात कर राजनीति में नई लकीर खींचेगी। लेकिन, आज भी सपा के 97 जिलाध्यक्षों/महानगर अध्यक्षों में 70% यादव-मुस्लिम (M-Y) हैं। सपा संगठन में M-Y समीकरण से आगे बढ़कर क्यों भरोसा नहीं जता पा रही? संगठन में एक भी ठाकुर को जगह नहीं देने का क्या मतलब है? सपा ने आखिर कितने सवर्णों पर भरोसा जताया है? पढ़िए ये रिपोर्ट… सपा के 97 जिलाध्यक्षों/महानगर अध्यक्षों में 2 पद खाली
प्रदेश के 18 मंडलों में सपा के कुल 97 जिलाध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष हैं। प्रयागराज में सपा ने गंगापार, यमुनापार और प्रयागराज नगर के तौर पर तीन अध्यक्ष बनाए हैं। इनमें 2 मुस्लिम, तो एक यादव हैं। इसके अलावा गोरखपुर, अयोध्या, लखनऊ, बरेली, मुरादाबाद, रामनगर, शाहजहांपुर, आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा, अलीगढ़, कानपुर, फर्रुखाबाद, झांसी, वाराणसी, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर में जिलाध्यक्ष और नगर या महानगर अध्यक्ष बनाया है। 97 पदों में अभी बिजनौर और रामपुर नगर के पद खाली हैं। सपा के जिलाध्यक्षों में आखिरी बार बड़ा फेरबदल 7 अप्रैल, 2023 को हुआ था। तब प्रदेश की कमान नरेश उत्तम पटेल के हाथों में थी। 2024 लोकसभा में सपा ने नरेश उत्तम पटेल को लोकसभा का प्रत्याशी बनाया, तो कमान ओबीसी के अति पिछड़े चेहरे श्यामलाल पाल को सौंप दी। इसकी एक वजह बसपा के इस वर्ग से बनाए गए विश्वनाथ पाल को भी बताया गया। सपा को डर था कि विश्वनाथ पाल की वजह से पाल (गड़रिया समाज) कहीं सपा से दूर न चले जाएं। हालांकि, श्यामलाल पाल को अध्यक्ष बने 2 साल होने को हैं, लेकिन अभी तक वे इक्का-दुक्का ही फेरबदल कर पाए हैं। विधानसभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर जिलाध्यक्षों के फेरबदल किए जाने की संभावना थी। लेकिन, एसआईआर के चलते ये भी पेंडिंग बताया जा रहा है। सपा जिलाध्यक्षों में 44 प्रतिशत यादव प्रदेश में यादव की आबादी भले ही 8-9 प्रतिशत के बीच मानी जाती हो, लेकिन सपा ने अपने इस कोर वोटबैंक की संगठन में खूब चिंता की है। मौजूदा 95 जिलाध्यक्षों में 44 प्रतिशत मतलब 42 यादव हैं। दूसरे नंबर पर मुस्लिम हैं। 24 स्थानों पर मुस्लिम जिलाध्यक्ष हैं। प्रदेश में भले ही दलित आबादी 20-21 प्रतिशत हो, लेकिन सपा में सिर्फ 3 दलितों को जिलाध्यक्ष बनाया गया है। मुलायम सिंह के समय में सपा में ठाकुरों का दबदबा हुआ करता था। लेकिन, मौजूदा समय में एक भी ठाकुर जिलाध्यक्ष या नगर अध्यक्ष नहीं है। 95 जिलाध्यक्षों में सिर्फ 7 जगह सामान्य वर्ग के लोगों को कमान सौंपी है। इसमें भी 2 ब्राह्मण, 2 बनिया और 1-1 त्यागी, बंगाली कायस्थ हैं। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल सपा के PDA के नारे पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं- किसी भी दल का चाल, चरित्र और चेहरा उसके सत्ता में रहते हुए दिखता है। 2024 लोकसभा में PDA के नारे से ही सपा को सफलता मिली थी। खुद अखिलेश यादव विधायक से सांसद बनकर लोकसभा में पहुंचे थे। इससे पहले वे यूपी विधानसभा में नेता विरोधी दल थे। उनके पास तब मौका था कि ये पद किसी PDA को दे सकते थे, लेकिन नहीं दिया। PDA का नारा सिर्फ वोट प्राप्त करने के लिए लगा रहे हैं। अब इनके PDA की पोल खुल चुकी है। अब लोग बसपा की तरफ उम्मीद से देख रहे हैं। 2027 में बसपा की अगुवाई में बहन मायावती 5वीं बार मुख्यमंत्री बनेंगी। सपा को पश्चिम में मुस्लिम, तो पूरब में यादव पर भरोसा सपा ने पश्चिमी यूपी में मुस्लिमों पर सबसे अधिक भरोसा जताया है। पूर्वांचल में यादव सबसे अधिक जिलाध्यक्ष हैं। कुछ मंडल तो ऐसे हैं, जहां सिर्फ M-Y समीकरण ही देखने को मिलता है। इन मंडलों में चित्रकूट, आजमगढ़, बस्ती, लखनऊ शामिल हैं। हालांकि, प्रदेश में दोनों की आबादी सिर्फ 27 प्रतिशत ही है। अगर जातियों के समीकरण के हिसाब से सबसे बैलेंस मंडल की बात करें, तो आगरा और कानपुर मंडल हैं। आगरा मंडल में 7 जिलाध्यक्ष, नगर और महानगर अध्यक्ष के पद हैं। इसमें 2 यादव, 2 मुस्लिम, 1 बनिया, 1 कुशवाहा, 1 शाक्य जिलाध्यक्ष हैं। इसी तरह कानपुर मंडल के 8 जिलाध्यक्षों में 2-2 यादव, मुस्लिम व ब्राह्मण और 1-1 शाक्य व दलित हैं। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी तंज कसते हुए कहते हैं- सपा का PDA मॉडल सिर्फ एक छलावा था। परिवार से बाहर वे किसी को भी कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं देंगे। ऐसा ही संगठन में भी M-Y समीकरण से आगे वो देखते ही नहीं हैं। सपा प्रवक्ता उदयवीर सिंह इसका बचाव करते हुए कहते हैं- किसी भी संगठन को देखना है, तो उसकी प्रदेश कमेटी सहित देखना चाहिए। जिलाध्यक्ष जिले के लोगों की राय से चुने जाते हैं। देखा जाता है कि कौन संगठन को जोड़कर चला सकता है? जरूरत के अनुसार कई जिलों में समय-समय पर फेरबदल किए जाते रहे हैं। PDA का मतलब ये नहीं कि हर जगह इसी समीकरण को देखा जाए। प्रदेश कमेटी में जरूर ये ध्यान रखा जाता है कि समाज के हर वर्ग को जगह मिल सके। सपा यादव-मुस्लिम अनुपात बिगाड़ नहीं सकती
वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश शुक्ल कहते हैं- सपा का बेस ही यादव-मुस्लिम रहा है। ऐसे में कोई पार्टी अपने बेस काडर से दूर नहीं जा सकती। सपा के संगठन में ये दिखना स्वाभाविक भी है। चुनाव में वो जरूर यादव-मुस्लिम को अन्य जातियों के अनुपात में कम टिकट देते हैं। लोकसभा चुनाव में भी ये देखने को मिला था। सपा ने तब भी परिवार से बाहर किसी यादव को प्रत्याशी नहीं बनाया था। उसी तरह मुस्लिमों को भी कम संख्या में टिकट दिए। उसके 4 मुस्लिम सांसद हैं। लेकिन, गैर यादव ओबीसी और दूसरी जातियों को अधिक टिकट दिए थे। लोकसभा में जो PDA का नारा चला था, वो 2027 में चलेगा ही, इसकी कोई गारंटी नहीं। गांवों में जिस तरह से यादव समाज अग्रेसिव नजर आ रहा है, उससे दूसरी जातियों में नाराजगी दिख रही। इसका खामियाजा उसे विधानसभा में उठाना पड़ सकता है। बसपा के साथ दलित एकजुट नजर आ रहे हैं। उसी तरह भाजपा भी टिकट बंटवारे में अति पिछड़ों को बड़ी संख्या में भागीदारी देने की तैयारी में है। ऐसी परिस्थिति में PDA सपा के पक्ष में एकजुट रहेगा, ये मुश्किल नजर आ रहा है। ———————– ये खबर भी पढ़ें- यूपी में लैंड जिहाद, शादी कर आदिवासियों की जमीन हड़पने वालों का स्टिंग में कबूलनामा- मुस्लिमों को बसा रहे मुझ पर रेप का केस दर्ज हो गया… जेल जाना पड़ता… सजा भी हो जाती। इसलिए रेप पीड़िता आदिवासी महिला से कोर्ट मैरिज कर ली। उसके नाम पर जमीनें खरीदीं। अपने लोगों को बसा रहे हैं। पढ़िए पूरी खबर…