जब इंदौर के लोगों ने पीया था ‘मुर्दे का पानी’:टंकी में लाश गलती रही.. पानी सप्लाई होता रहा, 30 साल पहले का वाकया

Spread the love

इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 14 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग बीमार हो गए। इंदौर के लोग इसी तरह की त्रासदी 30 साल पहले भी देख चुके हैं, जब एक बड़ी आबादी ने मुर्दे का पानी पीया था। इस पानी को पीकर बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े थे। हालांकि, किसी की मौत हुई थी, ये पता नहीं है। जब लोग बीमार पड़े तो नगर निगम ने उस टंकी की जांच कराई जहां से पानी सप्लाई होता था। इस टंकी को खोला गया तो नगर निगम कर्मचारियों की आंखें फटी की फटी रह गई। टंकी में एक इंसानी कंकाल था। जिस समय ये वाकया हुआ उस समय कांग्रेस की परिषद थी और मधुकर वर्मा मेयर थे। बीजेपी के वरिष्ठ नेता सत्यनारायण सत्तन ने इस पूरे घटनाक्रम को नजदीक से देखा था। वे कहते हैं- दोनों ही घटनाओं में एक बात कॉमन है, सिस्टम की नाकामी। आखिर क्या हुआ था तीस साल पहले? वो किसकी लाश थी? क्या उसका पता चला था? पढ़िए रिपोर्ट… अब जानिए क्या था पूरा मामला जब इंदौर के लोगों ने ‘आदमी’ पीया था
पूर्व विधायक सत्यनारायण सत्तन उस घटना को याद करते हुए बताते हैं कि यह 25 से 30 साल पहले की बात है, जब इंदौर नगर निगम पर कांग्रेस का शासन था और मधुकर वर्मा महापौर थे। उस समय शहर के पश्चिम क्षेत्र में पानी की सप्लाई सुभाष चौक स्थित एक बड़ी पानी की टंकी से होती थी। ये टंकी आज भी है। किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि उस टंकी के अंदर एक इंसान की लाश सड़ रही है। वह लाश किसकी थी, उसे किसने और कब टंकी में फेंका, यह ऐसा रहस्य है जो आज तक अनसुलझा है। नगर निगम के कर्मचारी रोज की तरह टंकी में पानी भरते रहे और वही पानी हजारों घरों के नलों तक पहुंचता रहा। लोग अनजाने में उसी पानी को पी रहे थे, उससे खाना बना रहे थे और अपने बच्चों को पिला रहे थे। धीरे-धीरे लाश पानी में गलने लगी। उसका मांस, चमड़ी और रेशे पानी में घुलते गए। टंकी में केवल हड्डियों का ढांचा बचा था
सत्तन बताते हैं कि कुछ समय बाद, इलाके में बीमारियां फैलने लगीं। लोगों को उल्टी-दस्त, पेट दर्द और बुखार की शिकायतें होने लगीं। अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ने लगी, लेकिन कोई भी बीमारी की असली वजह नहीं समझ पा रहा था। जब लोगों के घरों में नलों से आने वाले पानी से असहनीय बदबू आने लगी, तो शिकायतें नगर निगम तक पहुंचीं। जब निगम की टीम ने सुभाष चौक की टंकी का ढक्कन खोला, तो अंदर का मंजर देखकर उनके होश उड़ गए। टंकी के तल में एक नर कंकाल पड़ा था। शरीर का मांस पूरी तरह गल चुका था और पानी में घुलकर लोगों के पेट तक पहुंच चुका था। सिर्फ हड्डियों का ढांचा बचा था, जो उस भयावह लापरवाही की गवाही दे रहा था। यह खबर फैलते ही पूरे शहर में डर और घृणा की लहर दौड़ गई। तब भी सिस्टम की नाकामी और अब भी सिस्टम फेल
सुभाष चौक की घटना और भागीरथपुरा की त्रासदी के बीच लगभग तीन दशकों का फासला है। इस दौरान सरकारें बदलीं, महापौर बदले, राजनीतिक दल सत्ता में आए और गए, लेकिन जो नहीं बदला, वह है व्यवस्था का ढीला रवैया और नागरिकों के प्रति उसकी जवाबदेही की कमी। सत्तन कहते हैं कि दोनों ही मामलों में मूल कारण अफसरशाही की गंभीर लापरवाही है। भागीरथपुरा में नर्मदा लाइन और ड्रेनेज लाइन के मिल जाने से गंदा पानी पीने के पानी में मिल गया। अगर शिकायतों को गंभीरता से लिया जाता और समय पर पानी के सैंपल की जांच की जाती, तो 14 जानें बचाई जा सकती थीं। ठीक उसी तरह, यदि सुभाष चौक की पानी की टंकियों की नियमित सफाई और निगरानी होती, तो शायद वह भयावह घटना कभी घटित ही न होती। भागीरथपुरा इलाका शोक और गुस्से में डूबा
इंदौर का भागीरथपुरा इलाका शोक और गुस्से में डूबा हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दूषित पानी पीने से अब तक 14 लोगों की जान जा चुकी है। यह त्रासदी किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उस प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है, जिसकी शिकायतें स्थानीय निवासी महीनों से कर रहे थे।​​ ​​​​स्वास्थ्य विभाग ने अब तक 7992 घरों का सर्वे किया हैं, जिसमें 2456 लोग संक्रमित या संदिग्ध पाए गए हैं। 200 से अधिक लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा, और फिलहाल 162 मरीजों का इलाज विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा है, जिन्होंने अपनों को खोया है या उन्हें अस्पतालों में जिंदगी के लिए संघर्ष करते देख रहे हैं। हाईकोर्ट का दखल और लोगों ने चेक वापस किए
मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भी हस्तक्षेप किया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार को 2 जनवरी तक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने और सभी पीड़ितों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। इस संकट के बीच, जब प्रदेश सरकार के मंत्री और स्थानीय नेता कैलाश विजयवर्गीय पीड़ितों के परिवारों से मिलने भागीरथपुरा पहुंचे, तो उन्हें जनता के भारी आक्रोश का सामना करना पड़ा। सरकार की ओर से 7 मृतक परिवारों को 2-2 लाख रुपए की आर्थिक सहायता के चेक दिए जाने की कोशिश की गई, लेकिन गम और गुस्से से भरी महिलाओं ने इसे ठुकरा दिया। कांग्रेस बोली- पूरा मोहल्ला बीमार, मंत्री को सत्ता का अहंकार
सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में एक महिला मंत्री से कहती दिख रही है, “हमें आपका चेक नहीं चाहिए। पिछले दो साल से गंदा पानी आ रहा है। हमने भाजपा पार्षद को बार-बार शिकायत की, लेकिन आज तक हमारी समस्या का समाधान नहीं हुआ।” इस घटना को लेकर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “पूरा मोहल्ला बीमार है, लेकिन सत्ता के अहंकार में चूर मंत्री जी ने बहन की बात तक नहीं सुनी और गाड़ी आगे बढ़ा ली।” त्रासदी के बीच मेयर का पुराना बयान वायरल
इस पूरी त्रासदी के बीच इंदौर के वर्तमान महापौर पुष्यमित्र भार्गव का एक पुराना बयान आज की स्थिति पर एक कड़वा व्यंग्य करता है। जून 2024 में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था, “मैं मजाक में कहता रहा हूं कि इंदौर एशिया के सबसे अमीर शहरों में से एक है। यहां एक लीटर पानी की कीमत 21 रुपए है…हम पानी नहीं बल्कि घी पी रहे हैं।” आज जब भागीरथपुरा के लोग दूषित पानी से मर रहे हैं, तो यह “घी” वाला बयान व्यवस्था के उस खोखलेपन को उजागर करता है, जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।अब सवाल पूछे जा रहे हैं कि 21 रुपए प्रति लीटर का पानी क्या इस कदर जहरीला हो गया कि उसने लोगों की जान ले ली। कोई भी दल हो, जनता को साफ पानी नहीं दे सका
इंदौर के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो 1999 में मधुकर वर्मा के बाद भाजपा की परिषद बनी और कैलाश विजयवर्गीय शहर के पहले सीधे निर्वाचित महापौर बने। तब से लेकर आज तक, इंदौर में अधिकांश समय भाजपा का शासन रहा है। भागीरथपुरा की घटना मौजूदा भाजपा शासन के तहत हुई है, जबकि सुभाष चौक का मामला कांग्रेस के कार्यकाल का है। यह स्पष्ट करता है कि यह समस्या किसी एक दल की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की है, जिसमें नागरिकों का जीवन प्राथमिकता नहीं बन पाया है। हर त्रासदी के बाद जांच के आदेश होते हैं, समितियां बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती हैं और कुछ मुआवजे बांटे जाते हैं। लेकिन समय के साथ सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। असली सवाल यह है कि जिम्मेदारों की जवाबदेही कब तय होगी? उन अधिकारियों पर कब कार्रवाई होगी, जिनकी लापरवाही से लोगों की जान चली गई? इंदौर की कहानी इन दो त्रासदियों के माध्यम से एक ही सवाल पूछती है कि क्या हमारी व्यवस्था केवल तभी जागेगी, जब कई घर उजड़ जाएंगे? सुभाष चौक से लेकर भागीरथपुरा तक, इन घटनाओं ने इंदौर के वाटर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को कटघरे में ला खड़ा किया है। ये खबर भी पढ़ें…
पाइपलाइन में लीकेज से पेयजल में मिला दूषित पानी इंदौर के भागीरथपुरा में 14 लोगों की जान दूषित पानी की वजह से ही गई है। इसकी पुष्टि गुरुवार को महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज की लैब रिपोर्ट से हो गई। CMHO डॉ. माधव हसानी ने कहा- सैंपल की जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर पुष्टि हुई है कि दूषित पानी पीने से ही लोग बीमार पड़े और उनकी जान गई। पढ़ें पूरी खबर…