मोदी की मिमिक्री पर सस्पेंड,मंत्री-कलेक्टर के खिलाफ बोलने पर जिलाबदर:MP का कानून…मांग उठाई-विरोध किया तो कार्रवाई; किसान को जेल, नेता ‘तड़ीपार’

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मुझे सात जिलों से बाहर कर दिया गया है। मैं चुना हुआ जनप्रतिनिधि हूं। ऐसे में गांव का विकास कैसे करूंगा। मेरे खिलाफ दबाव में जिलाबदर की कार्रवाई की गई है। यह आरोप राजगढ़ के सुल्तानिया ग्राम पंचायत के सरपंच जीतेंद्र हथिया ने लगाया है। कलेक्टर गिरीश मिश्रा ने 13 मई को उन्हें एक साल के लिए राजगढ़ समेत सात जिलों से जिलाबदर करने के आदेश दिए हैं। हथिया का कहना है कि कार्रवाई राज्यमंत्री गौतम टेटवाल के दबाव में हुई, क्योंकि उन्होंने उनके जाति प्रमाण पत्र को लेकर कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, टेटवाल ने आरोपों से इनकार किया है। पिछले कुछ महीनों में मध्यप्रदेश के कई जिलों में विपक्षी नेताओं, किसान आंदोलनकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ जिलाबदर, गिरफ्तारी और मुकदमों जैसी कार्रवाइयां हुई हैं। भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि अधिकांश मामलों में कार्रवाई उन लोगों पर हुई, जिन्होंने आंदोलन किए या व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई। भास्कर ने कानून के जानकारों से समझा कि किन परिस्थितियों में जिलाबदर की कार्रवाई की जा सकती है। पढ़िए रिपोर्ट… जानिए, किन लोगों पर हुई जिलाबदर की कार्रवाई देवास में जिला प्रशासन ने कांग्रेस नेता जितेंद्र सिंह गौड़ को जिलाबदर का नोटिस जारी किया। प्रशासन ने इसके पीछे उनके पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को आधार बताया। हाल के दिनों में गौड़ स्थानीय प्रशासनिक मुद्दों पर सक्रिय रहे और सार्वजनिक रूप से व्यवस्था की आलोचना करते रहे हैं। उनके समर्थकों का आरोप है कि कार्रवाई उनकी राजनीतिक सक्रियता दबाने के लिए की गई। प्रशासन का तर्क: कार्रवाई कानूनी प्रावधानों के तहत
जिला बार एसोसिएशन देवास के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक वर्मा के मुताबिक, जिलाबदर की कार्रवाई तभी उचित मानी जाती है, जब किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हों और उसकी मौजूदगी से समाज को वास्तविक खतरा हो। उनका कहना है कि पुराने और गैर-गंभीर मामलों में ऐसी कार्रवाई कानूनी कसौटी पर कमजोर पड़ सकती है। प्रशासन ने कहा कि कार्रवाई कानूनी प्रावधानों के तहत की गई है और इसका राजनीतिक गतिविधियों से कोई संबंध नहीं है। छतरपुर में सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर की गिरफ्तारी का मामला चर्चा में है। भटनागर केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से प्रभावित आदिवासियों और अन्य परिवारों के मुआवजे व सर्वे अधिकारों को लेकर लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। वन विभाग ने उन पर पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में बिना अनुमति प्रवेश का आरोप लगाते हुए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई की। परिजन ने लगाया अपहरण का आरोप
जमानत मिलने के बाद दूसरे मामले में भी उनके खिलाफ कार्रवाई हुई। परिजन का आरोप है कि गिरफ्तारी के बाद कुछ समय तक उनके ठिकाने की जानकारी नहीं दी गई, जबकि प्रशासन ने इसे नियमित कानूनी प्रक्रिया बताया। प्रशासन का कहना है कि संरक्षित वन क्षेत्र में बिना अनुमति प्रवेश कानून का उल्लंघन है, चाहे व्यक्ति कोई भी हो। भटनागर के साथियों का दावा है कि वह विस्थापितों की समस्याओं का जायजा लेने गए थे और कार्रवाई का उद्देश्य उनके आंदोलन को कमजोर करना है। उज्जैन में किसान नेता अशोक जाट खाद की कमी और सोयाबीन के न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे। प्रशासन ने उनके नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों को शांति व्यवस्था के लिए खतरा बताते हुए मुकदमे दर्ज किए और जिलाबदर की कार्रवाई की। जाट और उनके समर्थकों का कहना है कि किसानों की जायज मांगों को आपराधिक रूप देना उचित नहीं है। प्रशासन का दावा है कि प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था प्रभावित हुई, जिसके आधार पर कार्रवाई की गई। खंडवा कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में एक किसान और उसके बेटे ने जमीन के रास्ते से जुड़े विवाद को लेकर गंभीर आरोप लगाए। हंगामे की स्थिति बनने पर प्रशासन ने दोनों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया। घटना के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। रिहाई के बाद किसान श्याम कुमरावत ने कहा कि वे केवल अपना अधिकार मांग रहे थे। प्रशासन का कहना है कि जनसुनवाई में अनुशासन भंग होने पर कार्रवाई जरूरी थी। यह आरोप सुल्तानिया ग्राम पंचायत के सरपंच जितेंद्र हथिया ने लगाया है। हथिया के अनुसार, वे विधानसभा चुनाव 2023 में सारंगपुर सीट से दावेदारी कर रहे थे, जिससे राज्यमंत्री गौतम टेटवाल नाराज थे। उनका आरोप है कि टेटवाल ने प्रशासन से मिलीभगत कर उनके खिलाफ कई मामले दर्ज करवाए, जबकि अब तक कोई आरोप साबित नहीं हुआ है। हथिया का कहना है कि उन्होंने जनता से जुड़े मुद्दों और सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण के खिलाफ आवाज उठाई थी, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई हुई। उन्होंने सवाल उठाया कि जिलाबदर की अवधि में वे गांव की समस्याओं का समाधान कैसे करेंगे। राज्यमंत्री गौतम टेटवाल ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ये आरोप दुर्भावना से प्रेरित हैं। असहमति की आवाज दबाना ठीक नहीं
आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता डॉ. आनंद राय का कहना है कि मध्यप्रदेश में जब भी आंदोलनकारियों ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई या आदिवासी क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण का विरोध किया, तब उनके खिलाफ रासुका और जिलाबदर जैसी प्रतिबंधात्मक कार्रवाइयां की गईं। उन्होंने आदिवासी युवक विलेश खराड़ी का उदाहरण देते हुए कहा कि बस हादसे में दो युवकों की मौत के विरोध के बाद उनके खिलाफ रासुका लगाई गई और वे पिछले दो वर्षों से जेल में हैं। बीजेपी का तर्क- कार्रवाई नियमानुसार
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी समेत कई नेताओं ने इन कार्रवाइयों को ‘पुलिस राज’ और ‘अघोषित आपातकाल’ बताया है। उनका आरोप है कि विपक्षी कार्यकर्ताओं पर सख्त कार्रवाई की जाती है, जबकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं से जुड़े मामलों में प्रशासन उदासीन रहता है। बीजेपी प्रवक्ता कल्पेश ठाकुर ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि रासुका या जिलाबदर जैसी कार्रवाई अचानक नहीं होती, बल्कि बड़े घटनाक्रमों और दर्ज मामलों के आधार पर की जाती है। एक्सपर्ट बोले- सोच समझकर हो कानून का इस्तेमाल
हाई कोर्ट अधिवक्ता तनुज दीक्षित का कहना है कि जिलाबदर एक असाधारण प्रशासनिक शक्ति है, न कि सामान्य अधिकार। उनके मुताबिक, यदि इसका इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से या विरोध प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ किया जाए, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।