एमपी के खंडवा जिले को सबसे ज्यादा जल संरचनाओं के निर्माण और संरक्षण के उत्कृष्ट कामों के लिए जो पहला पुरस्कार मिला है, दरअसल वो इस साल का सबसे बड़ा सरकारी झूठ है। प्रशासन ने जिन तालाबों, डक वैल और स्टॉप डैम के निर्माण का दावा किया वो हकीकत में जमीन पर मौजूद ही नहीं है। दैनिक भास्कर ने जब इस पूरे मामले की पड़ताल की तो पाया कि राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के लिए खंडवा जिला प्रशासन ने न केवल पोर्टल पर फर्जी आंकड़े अपलोड किए बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर फर्जी फोटो बनाकर बताया कि काम पूरा हो चुका है। भास्कर ने जब खंडवा कलेक्टर से इस फर्जीवाड़े को लेकर बात की तो उन्होंने कहा कि शिकायत हो तो मामले की जांच करा लेंगे। बता दें कि 11 नवंबर को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जल पुरस्कार का ऐलान किया था। जिसमें खंडवा जिले को सबसे ज्यादा जल संरचनाओं के निर्माण और संरक्षण के लिए पहला पुरस्कार दिया गया। खंडवा कलेक्टर ऋषभ गुप्ता और जिला पंचायत सीईओ नागार्जुन गौड़ा ने 18 नवंबर को दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से ये पुरस्कार हासिल किया था। खास बात ये है कि खंडवा के इस दावे पर लोकसभा में सांसदों ने भी सवाल उठाए हैं। जलशक्ति मंत्रालय से सवाल पूछा है कि खंडवा में किस तरह से जल संरचनाओं का काम किया है और इसकी कैसे मॉनिटरिंग हो रही है? आखिर किस तरह से खंडवा प्रशासन ने आंकड़ों में हेराफेरी कर ये पुरस्कार हासिल किया और कैसे इसकी पोल खुली? पढ़िए रिपोर्ट खंडवा जिला प्रशासन का दावा
जब 6वें नेशनल वाटर अवॉर्ड का ऐलान हुआ और खंडवा को जल संचय और जन भागीदारी पहल में पहला स्थान मिला, तो कलेक्टर ऋषभ गुप्ता ने खुद की पीठ थपथपाते हुए बताया था कि खंडवा जिले ने जल संरक्षण के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया है, इसके लिए खंडवा जिले को 2 करोड़ रुपए का पुरस्कार मिला है। प्रशासन की तरफ से बताया कि जल संरक्षण के लिए 1 लाख 29 हजार 46 काम प्रस्तावित किए गए थे। उनमें से केवल 26 काम पूरे नहीं हुए बाकी सारे काम पूरे कर लिए गए हैं। साथ ही खंडवा जिले की ग्राम पंचायत कावेश्वर में जल संरक्षण के लिए जो काम किए गए उसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय पुरस्कार के लिए कावेश्वर पंचायत का चयन किया गया है। इसके लिए 1.50 लाख रुपए का नकद पुरस्कार एवं ट्रॉफी प्रदान की गई। सिलसिलेवार जानिए इस दावे की हकीकत 150 कुओं में डक वैल, हकीकत में 2 फीट के गड्ढे
हमारी पड़ताल हरसूद ब्लॉक की शाहपुरा माल ग्राम पंचायत से शुरू हुई। यहां के रिकॉर्ड में 150 कुओं में डक वैल (सोख्ता गड्ढा) का निर्माण दिखाया गया है। लेकिन मौके पर हमें एक ग्रामीण ओमप्रकाश पवार मिले, जिन्होंने इस योजना की असलियत बयां की। उन्होंने बताया, ‘पंचायत ने जेसीबी से गांवों के कुओं के किनारे नाम मात्र के लिए 1-2 फीट के गड्ढे खुदवाए। इनमें न तो बोल्डर भरे गए, न गिट्टी डाली गई, जो कि एक सोख्ता गड्ढे के लिए अनिवार्य है। 50 से ज्यादा कुएं तो ऐसे हैं, जहां कोई गड्ढा खोदा ही नहीं गया। बस कुएं के पास एक पाइप लगाकर फोटो खींच ली गई और काम पूरा दिखा दिया गया।” बिना काम किए 25 हजार निकाल लिए
टीम गांव के एक अन्य किसान सतीश राजपूत के कुएं पर पहुंची। उनका कुआं सूखा पड़ा हुआ था। सतीश ने बताया, ‘यह कुआं कपिलधारा योजना के तहत खोदा गया था। सरकारी कागजों में इसमें सीमेंट की रिंग डाली जा चुकी हैं, लेकिन आप खुद देख सकते हैं कि यह आज भी कच्चा है। अब इसी कुएं के पास डक वैल भी बना दिया गया है, जबकि यहां सिर्फ एक पाइप लगा है और आसपास कोई गड्ढा नहीं है।” सतीश ने आरोप लगाया कि बिना काम किए सरकारी योजनाओं का पैसा निकाला लिया गया। मैं और मेरे साथ गांव के लोग तीन बार जनसुनवाई में शिकायत करने गए। वहां हमने अधिकारियों को फोटो भी दिखाए। इसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। पटवारी रिपोर्ट बना गए, मगर एक्शन नहीं
शाहपुरा पंचायत में ही हमारी टीम किशोरी लाल के उस खेत में पहुंची, जहां कागजों में एक तालाब का निर्माण दिखाया गया है। जब हम वहां पहुंचे, तो हमें दूर-दूर तक कोई तालाब नजर नहीं आया। उस जगह पर गेहूं की फसल लहलहा रही थी। किसानों ने बताया कि इस फर्जी तालाब की शिकायत मिलने पर पटवारी जांच करने आए थे। उन्होंने भी मौके पर फसल देखकर कहा था कि यहां कोई तालाब नहीं है। वे रिपोर्ट बनाकर ले गए, लेकिन उसके बाद क्या हुआ, किसी को नहीं पता। 4 लाख में केवल सीमेंट की 20 फीट पाल
पिलानी माल पंचायत में भ्रष्टाचार का एक और अनूठा मामला सामने आया। यहां दुगड्डा नाले पर 2008 में राजीव गांधी जल मिशन के तहत एक बंधान (स्टॉप डैम) बनाया गया था। उस समय की जल समिति के अध्यक्ष रहे बुजुर्ग भगवान बताते हैं, “तब इस काम में मुश्किल से 3 लाख रुपए लगे थे और यह आज भी पानी रोक रहा है।” अब पंचायत ने इस पुराने स्टॉप डैम के सामने एक छोटी सी पाल बनाकर और उस पर पुताई करके एक नया पत्थर लगा दिया। इस “नए” काम की लागत 4.23 लाख रुपए दिखाई गई है, जबकि इससे एक लीटर भी अतिरिक्त पानी नहीं रुक रहा है। घोटाले का केंद्र: पुनासा ब्लॉक और 11 फर्जी तालाब
जल संरक्षण के नाम पर सबसे बड़ी धांधली खंडवा के पुनासा ब्लॉक की हरवंशपुरा ग्राम पंचायत में नजर आती है। यहां कागजों में 11 तालाबों का निर्माण दिखाया गया है, लेकिन जमीन पर एक भी मौजूद नहीं है। गांव के कुछ जागरूक युवाओं ने जब सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी निकाली, तो यह पूरा फर्जीवाड़ा सामने आया। पिछले चार महीनों में ये युवा तीन बार खंडवा जाकर कलेक्टर ऋषभ गुप्ता से मिले और शिकायत की, लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने लोकायुक्त में शिकायत दर्ज कराई। लोकायुक्त की जांच के डर से पंचायत ने आनन-फानन में खड़ी फसल के बीच जेसीबी चलवाकर चार जगहों पर कुछ फीट गहरे गड्ढे खोद दिए और उन्हें तालाब बताने की कोशिश की, लेकिन इन गड्ढों में पानी की एक बूंद भी नहीं है। दो केस से समझिए… केस 1: एक सूखे नाले में दो तालाब
हरवंशपुरा के देगांव के पास एक सूखा नाला है। रिकॉर्ड में इस नाले पर दो तालाब दर्ज हैं– एक शिवराम के नाम पर और दूसरा सुरेश के नाम पर। सुरेश के खेत में तालाब के नाम पर सितंबर 2025 में 2.75 लाख रुपए और शिवराम के तालाब के लिए 2.5 लाख रुपए निकाल लिए गए। आज दोनों किसान अपने ही नाम पर हुए इस फर्जीवाड़े की शिकायतें लेकर दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही। केस 2 : शादी में गया किसान, रात में खेत में बन गया तालाब
डोडखेड़ा गांव के किसान तुलसीराम की कहानी तो और भी हैरान करने वाली है। वे बताते हैं, “मेरे खेत में पहले से ही जानवरों को पानी पिलाने के लिए एक छोटा गड्ढा था। मैं परिवार के साथ एक शादी में गया हुआ था। पीछे से पंचायत सचिव जेसीबी लेकर आया और उसी गड्ढे को थोड़ा और बड़ा कर दिया।” जब तुलसीराम वापस लौटे तो उन्हें धमकाया गया, “यह सरकारी तालाब है, इसे पूरने की कोशिश मत करना, वर्ना केस बन जाएगा।” छत का पानी नाली में उतारा और वाटर हार्वेस्टिंग हो गई…
जिले ने पुरस्कार पाने के लिए जो दावे पेश किए उनमें जल शक्ति मंत्रालय की साइट पर ‘कैच द रेन’ के कार्यों के तहत फोटो अपलोड किए हैं। भास्कर ने इन फोटो की पड़ताल की तो सच्चाई सामने आ गई। ओंकारेश्वर के सरकारी कर्मचारियों ने, खासतौर पर शिक्षकों ने डीईओ के कहने पर पोर्टल पर अपने घरों के फोटो अपलोड किए। जो फोटो अपलोड किए गए उसमें महिलाएं अपने घर की छत वाले पाइप के सामने खड़ी है। इनके जरिए बताया गया कि घरों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाया गया है। जबकि हकीकत ये है कि छत का पानी किसी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम में नहीं जा रहा, बल्कि ये एक नाले में जा रहा है। भास्कर ने इनमें से दो महिलाओं की तलाश की जिनके नाम पोर्टल पर 1787 और 1786 नंबर पर फोटो समेत दर्ज थे। एक दुकानदार ने बताया स्कूल टीचर विद्या का पता
भास्कर रिपोर्टर ओंकारेश्वर के वार्ड नंबर 14 पहुंचा। यहां दुकानदार और लोगों को तस्वीर दिखाकर महिला की तलाश शुरू की। पुराने बस स्टैंड के पास एक दुकान चलाने वाले ने बताया कि ये विद्या मैडम है। यह अग्रवाल धर्मशाला के पीछे रहती हैं। जब हम विद्या मैडम के घर पहुंचे तो वह घर पर मौजूद थीं। उनसे पोर्टल के फोटो के बारे में पूछा तो वह बोली- हमें सर( डीईओ) ने फोटो अपलोड करने के लिए कहा था। ये फोटो दो महीने पहले अपलोड की थी। उनसे फिर पूछा कि छत के पाइप से पानी कहां जा रहा है? क्या कोई वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाया है तो उन्होंने साफ कहा कि ये पानी नाली में जाता है। कोई वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाया है। घर बनाते समय लगाया पाइप, पानी नाले में
इसी तरह पोर्टल पर 1730 वें नंबर पर दर्ज फोटो की तलाश की तो ये शिक्षिका रमावती कनेन का मकान था। यहां भी घर की छत से लगा पाइप वाटर हार्वेस्टिंग डक्ट के बजाय सीधे नाले में खुला हुआ था। पूछने पर रमावती मैडम ने स्वीकारा कि, मैंने ही साहब के कहने पर फोटो अपलोड की थी। यह पाइप तो घर बनाते समय ही लगाया था अभी कुछ नहीं किया। इस पाइप का पानी कहां जाता है? ये पूछने पर वह बोली- पानी नाली में जाता है। ऐसे खुली प्रशासन के दावों की पोल
खंडवा जिला प्रशासन ने इन कामों के आधार पर पुरस्कार तो ले लिया, लेकिन जब इन दावों को साबित करने के लिए सबूतों की बात आई, तो प्रशासन की पोल खुल गई। दरअसल, केंद्र सरकार के ‘जल संचयन जन भागीदारी पोर्टल’ पर इन कामों की जियो-टैग की हुई तस्वीरें अपलोड करना जरूरी है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। प्रशासन ने 1.29 लाख कामों के मुकाबले, जिले से मात्र 1714 तस्वीरें ही अपलोड कीं, यानी कुल कामों का महज 1.3%। हैरानी की बात यह है कि इस 1% सबूत में भी भारी गोलमाल है। दैनिक भास्कर ने जब इन तस्वीरों की जांच की, तो पाया कि अधिकांश में जियो-टैगिंग नहीं थी। इससे भी बड़ा खुलासा यह हुआ कि वाटर हार्वेस्टिंग के दावे के साथ अपलोड की गई दर्जनों तस्वीरें AI (Artificial Intelligence) के जरिए बनाई गई थीं। इन तस्वीरों पर AI जेनरेशन का वॉटरमार्क साफ-साफ देखा जा सकता है, जो यह साबित करता है कि मौके पर काम करने के बजाय, कंप्यूटर पर तस्वीरें बनाकर पोर्टल पर अपलोड कर दी गईं। जवाबदेही से बचता प्रशासन
इस पूरी जमीनी पड़ताल के बाद, दैनिक भास्कर ने प्रशासन का पक्ष जानने के लिए जिला कलेक्टर ऋषभ गुप्ता से संपर्क किया। उन्होंने दौरे पर होने की बात कहकर मिलने से इनकार कर दिया। जब रिपोर्टर ने अगले दिन फिर फोन किया, तो उन्होंने कॉल नहीं उठाया। इसके बाद, हमारी टीम ने ग्राउंड जीरो मेंं सामने आए सभी तथ्यों और सबूतों का उल्लेख करते हुए उन्हें व्हॉट्सएप पर संदेश भेजा। उन्होंने इसका जवाब देते हुए लिखा, कार्य पूर्णता पर Geotagged फोटो लगाना होता है, तो इस प्रकार के कार्य पोर्टल पर पूर्ण नहीं किए जा सकते और हमेशा लंबित रूप में दर्शित रहेंगे। अतः कभी ना कभी तो पकड़े जाएंगे या कार्य पूर्ण करना पड़ेगा। यदि किसी प्रकरण में कार्य से अधिक राशि आहरित हुई है, तो हम उसकी जांच करवा लेंगे।
साल 2025 के सबसे बड़े सरकारी झूठ की पड़ताल:राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने खंडवा कलेक्टर-सीईओ ने पोर्टल पर अपलोड किए फर्जी आंकड़े-तस्वीरें, जमीन पर कुछ नहीं
