गरम-गरम खाना, किराने का सामान और जरूरत की हर चीज सिर्फ 10 मिनट में आपके दरवाजे पर। 12 दिन पहले यानी 13 जनवरी को ही क्विक कॉमर्स कंपनियों ने इस दावे को अब अपने एप से हटा लिया है। यह बदलाव डिलीवरी बॉयज की हड़ताल और सरकार की दखल के बाद किया गया है। आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने भी खुद एक दिन के लिए डिलीवरी एजेंट बनकर उनके संघर्ष को करीब से महसूस किया था और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया था। क्विक कॉमर्स कंपनियों ने भले ही अपने इस दावे से हाथ खींच लिए हैं, लेकिन इनके लिए काम करने वाले गिग वर्कर्स की लाइफ में मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। भास्कर ने क्विक कॉमर्स कंपनियों के साथ काम करने वाले इन लोगों की कहानी को नजदीक से समझने के लिए पूरा एक दिन इन लोगों के साथ बिताया। साथ ही उन गिग वर्कर्स से बात की जो 10 मिनट डिलीवरी के फेर में हादसों का शिकार चुके हैं। पढ़िए रिपोर्ट पहले जानिए कैसे काम करते हैं गिग वर्कर्स
गिग वर्कर्स किन चुनौतियों से जूझते हैं, इसे समझने के लिए हमारी टीम ने एक डिलीवरी एजेंट के साथ उनकी प्रक्रिया को करीब से देखा। हमने स्टॉप वॉच के जरिए समय मापना शुरू किया। डिलीवरी एजेंट पर लगातार यह दबाव रहता है कि वह जल्द से जल्द वापस स्टोर पहुंचे, ताकि अगला ऑर्डर पकड़ सके, क्योंकि हर ऑर्डर का मतलब कुछ और रुपए हैं। यही रफ्तार और यही दबाव अकसर हादसों को न्योता देता है। गिग वर्कर्स के संघर्ष की 6 कहानियां 1. अफसर बनने का सपना और पार्ट-टाइम डिलीवरी का संघर्ष
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर के रहने वाले रमेश सिंह (बदला हुआ नाम) 2019 में अफसर बनने का सपना लेकर भोपाल आए थे। उन्होंने पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स की डिग्री हासिल की, लेकिन आर्थिक तंगी ने उन्हें डिलीवरी एजेंट बनने पर मजबूर कर दिया। रमेश बताते हैं- मैं किसान परिवार से हूं। घर पर बोझ नहीं बनना चाहता, इसलिए 1 दिसंबर 2025 से पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी के साथ यह काम करता हूं। 2. एक हादसा और टूट गया परिवार का सहारा
बैतूल के रहने वाले जय पवार जोमैटो के लिए काम करते हैं। वह अपने बूढ़े मां-बाप के इकलौते सहारे हैं। एक शाम डिलीवरी देकर लौटते हुए उनके दिमाग में बस यही चल रहा था कि जल्दी से दूसरा ऑर्डर मिल जाए। इस जल्दबाजी में बाइक की रफ्तार कब बढ़ी, उन्हें पता ही नहीं चला। जब ख्यालों से बाहर आए तो सामने डिवाइडर था। बाइक को बचाने की कोशिश में वह खुद हादसे का शिकार हो गए। उनके पैर में गंभीर चोटें आईं। तीन उंगलियां फ्रैक्चर हो गईं। आज वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं। 3. MBA का सपना फाइलों में बंद, हकीकत बाइक पर सवार
सीहोर के पवन सोनी का सपना था कि वह एमबीए कर किसी बड़ी कंपनी में नौकरी करें, लेकिन घर की जिम्मेदारियों ने उनके सपनों पर ब्रेक लगा दिया। 60 वर्षीय पिता ऑटो चलाते हैं, लेकिन उनकी कमाई सीमित है। घर में मां और बहनों की जिम्मेदारी पवन के कंधों पर आ गई। पवन रोज सीहोर से भोपाल अप-डाउन करते हैं और 11-12 घंटे काम करते हैं। वह बताते हैं, ‘दिन अच्छा रहा तो 1000 रुपए तक कमा लेता हूं, लेकिन ज्यादातर दिनों में पेट्रोल का खर्च निकालकर हाथ में 400-500 रुपए ही आते हैं।’ पवन की एक प्रेमिका भी है, जिससे बात भी काम के बीच ही हो पाती है। पहले कंपनी ऑर्डर के इंतजार का भी पैसा देती थी, लेकिन अब वह बंद कर दिया गया है। जब घंटों इंतजार करना काम का हिस्सा है, तो उसका पैसा क्यों नहीं? 4. घर वालों से छिपाकर डिलीवरी, पढ़ाई और कमाई के बीच फंसा भविष्य
बैतूल के दीपक पवार भोपाल के एमवीएम कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहे हैं। उनके परिवार को नहीं पता कि वह एक गिग वर्कर हैं। दीपक बताते हैं, घर से सिर्फ रहने और खाने के पैसे मिलते हैं। अपनी जरूरतों और सपनों को पूरा करने के लिए मैंने यह काम शुरू किया, लेकिन यह पार्ट-टाइम काम अब पढ़ाई पर भारी पड़ रहा है। 5. कंपनी बोली- ‘तुम्हारी छोटी-छोटी समस्याएं सुनेंगे तो काम कब करेंगे?’
धनराज कटकवार भी जोमैटो के लिए काम करते हैं और पांच लोगों के परिवार का पेट पालते हैं। एक दिन एमपी नगर से ऑर्डर ले जाते वक्त उनका एक्सीडेंट हो गया। कंधे और हाथ में गंभीर चोट आई। साल भर पहले खरीदी गई गाड़ी भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। धनराज बताते हैं, ‘कंपनी ने मेरी कोई मदद नहीं की। न इलाज का पैसा दिया, न गाड़ी ठीक कराई। कोई हालचाल पूछने तक नहीं आया।’ मैंने जब अपने इंचार्ज को कहा तो जवाब मिला तुम्हारी इन छोटी-छोटी समस्याओं को सुनेंगे तो काम कब करेंगे।
6. समाज के ताने और घर की जिम्मेदारी के बीच दौड़ती कैब
यह संघर्ष सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं है। भोपाल की श्रद्धा (बदला हुआ नाम) एक कैब ड्राइवर हैं। पति भी ड्राइवर हैं और उन्होंने ही श्रद्धा को गाड़ी चलाना सिखाया। श्रद्धा कहती हैं, “घर का खर्च चलाने के लिए यह काम शुरू किया, लेकिन मेहनत के हिसाब से पैसे नहीं मिलते।” शुरुआती दिनों में उन्हें समाज के तानों का भी सामना करना पड़ा। कई बार लोग महिला ड्राइवर देखकर राइड कैंसल कर देते हैं। वह अपने दो बच्चों को स्कूल छोड़ने के बाद और शाम को उनके घर आने से पहले कैब चलाती हैं, ताकि परिवार को भी समय दे सकें। दिन-रात मेहनत करने के बावजूद, महीने के अंत में वह और उनके पति बस किसी तरह घर की जरूरतें ही पूरी कर पाते हैं। गिग वर्कर्स की हड़ताल की 5 वजह थीं डिलीवरी पार्टनर्स और राइडर्स की हड़ताल के पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही कई शिकायतें थीं। यूनियन नेताओं और एक्सपर्ट्स के मुताबिक मुख्य कारण ये थे: 1. सोशल सिक्योरिटी और वेलफेयर फंड का अभाव
गिग वर्कर्स की सबसे बड़ी मांग सामाजिक सुरक्षा थी। सरकारी नियमों के बावजूद कई राज्यों में अभी तक इन वर्कर्स को पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या पीएफ (PF) जैसी सुविधाएं नहीं मिल रही । 2. गिरती हुई कमाई और इंसेंटिव में कटौती
शुरुआत में कंपनियां डिलीवरी पार्टनर्स को ज्यादा इंसेंटिव देती थीं। उनमें अब कटौती की गई । पहले प्रति ऑर्डर ₹40 से ₹60 मिलते थे। अब यह घटकर ₹15 से ₹25 के बीच रह गया है। 3. खराब वर्किंग कंडीशन और 10-मिनट डिलीवरी का दबाव
क्विक कॉमर्स एप्स जैसे ब्लिंकिट, जेप्टो में 10-12 मिनट में डिलीवरी करने का दबाव रहता है। वर्कर्स का आरोप है कि इस चक्कर में उनके एक्सीडेंट होने का खतरा बढ़ गया । 4. मनमाने तरीके से आईडी (ID) ब्लॉक करना
गिग वर्कर्स की एक बड़ी शिकायत यह है कि कंपनियां बिना किसी पूर्व सूचना या ठोस कारण के उनकी आईडी ब्लॉक कर देती हैं। इससे उनका रोजगार अचानक छिन जाता है। 5. गिग वर्कर का कानूनी दर्जा
फिलहाल इन वर्कर्स को कंपनियों का ‘पार्टनर’ कहा जाता है, ‘कर्मचारी’ नहीं। हड़ताल के जरिए ये मांग की गई कि उन्हें औपचारिक कर्मचारी माना जाए। सरकार ने जारी किया सोशल सिक्योरिटी का नया ड्राफ्ट इस बढ़ते दबाव के बीच एक उम्मीद की किरण भी दिखी है। केंद्र सरकार ने देश के लगभग 1.27 करोड़ गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए नए नियमों का ड्राफ्ट जारी किया है। ये नियम ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020’ के तहत हैं। 1 साल में 90 दिन काम करना जरूरी हर गिग वर्कर इन फायदों का हकदार नहीं होगा। इसके लिए सरकार ने कुछ शर्तें रखी हैं: क्या-क्या फायदे मिलेंगे: अलग सोशल सिक्योरिटी फंड बनेगा सरकार कंपनियों से कंट्रीब्यूशन लेकर एक विशेष ‘सोशल सिक्योरिटी फंड’ बनाएगी। इससे वर्कर्स को ये फायदे मिलेंगे:
गिग वर्कर्स को नहीं मिलता काम का पूरा पैसा:आवाज उठाने पर आईडी ‘टर्मिनेट’, पेट्रोल खर्च भी खुद से; अब कमाई 5-7 रुपए किमी
