यूपी में पहली बार ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाया जा रहा है। पंचायती राज में ऐसा पहली बार हो रहा है। आमतौर अगर ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव नहीं हो पाते, तो सरकारी अधिकारियों (जैसे एडीओ पंचायत या बीडीओ) को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। चुनावी साल में योगी सरकार ने इस नीति को बदलने का फैसला किया है। सवाल उठ रहे हैं कि पहली बार ग्राम प्रधानों को प्रशासक क्यों बनाया जा रहा है? पहले 3 फायदे समझते हैं… इस फैसले से योगी शासन को क्या फायदे होंगे? ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कमान सौंपने से योगी सरकार को सीधे तौर पर बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक फायदे मिलने जा रहे हैं। बजट खर्च करने की रफ्तार बनी रहेगी
केंद्र और राज्य सरकार की कई बड़ी योजनाएं (जैसे स्वच्छ भारत मिशन, पंचायत भवन निर्माण, जल जीवन मिशन) सीधे ग्राम पंचायतों के खाते के जरिए संचालित होती हैं। आमतौर पर अधिकारी प्रशासक बनने के बाद वित्तीय फैसले लेने में डरते हैं या देरी करते हैं। प्रधानों के पास पावर रहने से गांवों में विकास कार्यों का पैसा तुरंत खर्च होगा। चुनाव आचार संहिता लगने से पहले सरकार ग्रामीण बुनियादी ढांचे के बड़े हिस्से को चमका सकेगी। ग्रामीण स्तर पर ‘एंटी-इंकंबेंसी’ से बचाव
अगर गांवों की कमान अधिकारियों के हाथ में चली जाती, तो जनता के छोटे-छोटे काम (जैसे प्रमाण पत्र, पेंशन, राशन कार्ड) रुक जाते। प्रधानों को पद पर बनाए रखने से ग्रामीण जनता को अपने काम के लिए ब्लॉक के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। इससे सरकार के खिलाफ कोई जन-आक्रोश नहीं पनपेगा। 57,000 प्रधानों के जरिए ‘ग्राउंड नेटवर्क’ मजबूत रखना
उत्तर प्रदेश में 57,695 ग्राम प्रधान ग्रामीण राजनीति की रीढ़ हैं। हर प्रधान का अपने गांव में कम से कम 500 से 1000 वोटर्स पर सीधा प्रभाव होता है। माना जा रहा है कि जब सरकार प्रधानों को कार्यकाल खत्म होने के बाद भी ‘प्रशासक’ बनाकर उनके वित्तीय अधिकार सुरक्षित रखेगी, तो यह बड़ा कैडर सरकार के प्रति वफादार रहेगा। विधानसभा चुनाव में ये प्रधान सत्ताधारी दल के लिए ग्राउंड लेवल पर सबसे बड़े ‘वोट मैनेजर’ की भूमिका निभा सकते हैं। विपक्ष के ‘नौकरशाही राज’ के नैरेटिव की काट
सपा और कांग्रेस अक्सर भाजपा पर आरोप लगाती हैं कि मौजूदा शासन में जनप्रतिनिधियों की नहीं, बल्कि अधिकारियों की चलती है। ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाकर योगी सरकार यह संदेश दे रही है कि वह लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए प्रतिनिधियों पर भरोसा करती है, न कि ‘अफसरशाही’ पर। चुनाव से पहले प्रधान सबसे अहम कड़ी
चुनाव के वक्त किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी प्रधान ही होते हैं। ऐसा माना जाता है कि चुनाव जीतने, वोट प्रतिशत बढ़ाने, बूथ प्रबंधन करने, चुनाव प्रचार करने, रैलियों में भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी प्रधानों के हाथ में ही होती है। अगर किसी कर्मचारी को प्रशासक नियुक्ति किया जाता है, तो ग्राम प्रधान उतने प्रभावी नहीं होते हैं। वह सत्ताधारी दल के लिए मददगार भी साबित नहीं होते। अधिकारी को प्रशासक बनाने से क्या मुश्किलें आती हैं… अध्यक्ष बोले- अधिकारी वित्तीय काम नहीं करते, प्रधान से सहूलियत होगी प्रधान संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने बताया था कि ग्राम पंचायतों में सरकारी कर्मचारी को प्रशासक नियुक्त करने से ग्रामीणों के सामने कई तरह की समस्याएं आती हैं। सरकारी अधिकारी के प्रशासक नियुक्त होने से वित्तीय अनियमितता की आशंका बढ़ती है। 2021 में प्रशासकों ने 4 हजार करोड़ रुपए खर्च किए, लेकिन उसका हिसाब-किताब नहीं मिला। प्रशासक उस ग्राम पंचायत का निवासी नहीं होता। इसलिए बाहरी व्यक्ति को क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने का पता नहीं होता। अगर किसी की बेटी की शादी है, तो ग्राम प्रधान 50 हजार रुपए दे सकते हैं। लेकिन, प्रशासक यह काम नहीं करते। चुनाव के दौरान भी ग्राम प्रधान आपसी समन्वय से शांति व्यवस्था बनाने, मतदान बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं, लेकिन प्रशासक का लोगों से उतना गहरा संबंध नहीं होता है। 2021 में 3 महीने देरी से हुए थे पंचायत चुनाव 2021 में भी पंचायत चुनाव अपने तय समय से करीब 3 महीने देर से हुए थे। दरअसल, 2015 में अक्टूबर से दिसंबर के बीच पंचायत चुनाव कराए गए थे। इसके बाद नवनिर्वाचित ग्राम प्रधानों की पहली बैठक 26 जनवरी, 2016 को हुई थी। इस हिसाब से प्रधानों का कार्यकाल 26 जनवरी, 2021 को खत्म हो रहा था। हालांकि, कोविड महामारी और वोटर लिस्ट वैरिफिकेशन समय पर न होने की वजह से अप्रैल, 2021 में 4 चरणों में पंचायत चुनाव हुए थे। 3 महीने की अवधि के लिए सहायक विकास अधिकारी (ADO) या खंड विकास अधिकारी (BDO) को प्रशासक बनाया गया था। जबकि साल 2000 में पंचायत चुनाव करीब 2 महीने देरी से हुए थे। तब भी अधिकारियों को प्रशासक बनाया गया था। योगी सरकार ने इस बार राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर ग्राम प्रधानों को ही जिम्मेदारी देने की व्यवस्था बनाई है। ———————- यह खबर भी पढ़ें – यूपी में पहली बार पंचायत चुनाव तक प्रधान रहेंगे प्रशासक, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए भी हो सकती है यही व्यवस्था यूपी में पंचायत चुनाव होने तक ग्राम प्रधान ही प्रशासक रहेंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हरी झंडी दे दी है। प्रदेश में पहली बार प्रशासनिक समिति बनाई जाएगी। मतलब- पंचायत चुनाव तक गांवों के विकास कार्यों की जिम्मेदारी मौजूदा प्रधानों के पास ही रहेगी। पंचायती राज विभाग आज, सोमवार देर शाम तक इसका आदेश जारी कर देगा। पढ़िए पूरी खबर…
BJP का संदेश- नौकरशाही पर नहीं, 57,000 प्रधानों पर भरोसा:चुनावी साल में डेवलपमेंट के काम नहीं थमेंगे; ‘ग्राउंड नेटवर्क’ मजबूत होगा
