सुहागिन महिलाओं ने अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख की कामना के साथ दिनभर व्रत रखा। शाम ढलते ही माता तुलसी का श्रृंगार किया गया — चुनरी, कांच की चूड़ियाँ, नारियल, दीपक और फूलों से सजे तुलसी चौरे की भव्य छटा देखते ही बनती थी।
बलरामपुर के स्थानीय मारवाड़ी समाज के सहयोग से कई स्थानों पर तुलसी-शालिग्राम विवाह का आयोजन विशेष श्रद्धा और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। परिवारजनों सहित आसपास के श्रद्धालु इस धार्मिक आयोजन के साक्षी बने।
महिलाओं ने दिनभर उपवास रखकर सायंकाल तुलसी-शालिग्राम विवाह की विधिवत पूजा की। आरती के समय शंखनाद, घंटियों की ध्वनि और जय जय तुलसी माता तथा ओम नमो भगवते वासुदेवाय के उच्चारण से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। रंग-बिरंगी लाइटों और दीपों से सजे आंगन में आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत प्रवाह महसूस हुआ।
पौराणिक महत्व
मान्यता है कि देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार माह की योगनिद्रा से जागते हैं और इसी दिन से शुभ कार्यों की शुरुआत मानी जाती है। तुलसी विवाह का यह पर्व न केवल भगवान विष्णु और माता तुलसी के पवित्र मिलन का प्रतीक है, बल्कि यह प्रेम, भक्ति और धर्म के प्रति समर्पण की भावना को भी अभिव्यक्त करता है। इस दिन किया गया पूजन परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और मंगल का वरदान देता है।
